अदालत के सामने कथित तौर पर गलत तथ्य पेश करने के मामले में CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त कदम उठाया है। अदालत ने इस मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। जस्टिस मधु जैन ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में आरोपों की जांच आगे बढ़ाने के लिए प्रथमदृष्टया पर्याप्त आधार मौजूद है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में अलग से प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं है, क्योंकि संबंधित फाइल नोटिंग, जवाब के अलग-अलग ड्राफ्ट और हस्ताक्षरित जवाब की पहले ही जांच की जा चुकी है।
दिल्ली हाईकोर्ट
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्रवाई शुरू करने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सीबीआई अधिकारियों सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ लिखित शिकायत तैयार की जाए। इसे चार सप्ताह के भीतर तीस हजारी स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सेंट्रल) की अदालत में भेजने को कहा गया है।
क्या है मामला?
यह मामला आईआरएस अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल से संबंधित है। सीबीआई ने उनसे जब्त किए गए दस्तावेजों को वापस करने से जुड़े मामले में 2 अगस्त 2016 को अदालत में अपना जवाब दाखिल किया था। इसमें कहा गया था कि आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है और दस्तावेज भविष्य की कानूनी कार्यवाही में जरूरी हो सकते हैं।
अग्रवाल ने बाद में सीआरपीसी की धारा 340 के तहत आवेदन दाखिल कर आरोप लगाया कि सीबीआई का यह दावा गलत था, क्योंकि उस समय मंत्रालय के साथ कोई पत्राचार चल नहीं रहा था।
ड्राफ्ट में बदली गई थी अहम जानकारी
हाईकोर्ट ने सीबीआई के जवाब से जुड़े पुराने ड्राफ्ट और फाइल नोटिंग की जांच की। रिकॉर्ड के मुताबिक, 19 जुलाई 2016 को DoPT ने विशेष अनुमति याचिका दायर करने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बजाय प्रस्ताव पर दोबारा विचार या वरिष्ठ कानूनी राय लेने की बात थी।कोर्ट ने पाया कि शुरुआती ड्राफ्ट में यह तथ्य मौजूद था, लेकिन बाद के ड्राफ्ट में इसे हटा दिया गया और हाथ से यह लिखा गया कि प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है। अदालत ने कहा कि इस बदलाव से कोर्ट के सामने पेश की जाने वाली तथ्यात्मक स्थिति बदल गई।
कोर्ट के अनुसार, 2 अगस्त 2016 तक CBI और DoPT के बीच कोई वास्तविक पत्राचार नहीं हुआ था। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर छह अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है। हाईकोर्ट ने शिकायत संबंधी कार्यवाही बहाल करने और मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश दिया है।
