कानून, अदालत और सत्ता इन तीनों के रिश्तों पर अक्सर गंभीर बहस होती है। लेकिन रविवार शाम दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में यही दुनिया हल्के व्यंग्य, अदालतों के किस्सों और संस्थागत संतुलन की बातों के बीच दिखाई दी। मौका था भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो पुस्तकों The Bench, The Bar and the Bizarre और The Lawful and the Awful के विमोचन का। कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, गृह मंत्री अमित शाह, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता और राजनीतिक हस्तियां मौजूद रहीं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दो किताबों के विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए अमित शाह।
तुषार मेहता ने अपने संबोधन में साफ किया कि उन्होंने जानबूझकर भारतीय अदालतों, भारतीय न्यायाधीशों और देश के कानूनी घटनाक्रमों को अपनी किताबों से बाहर रखा है। उनका कहना था कि वह अभी भारत में प्रैक्टिस कर रहे हैं और आने वाले वर्षों तक यहीं वकालत जारी रखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने विदेशी न्याय व्यवस्थाओं और अदालतों के वास्तविक किस्सों को आधार बनाया।
“लॉफुल” और “ऑफुल” के बीच की रेखा बहुत पतली: तुषार मेहता
उन्होंने कहा कि ये किताबें न तो कानून की कोई गंभीर टीका-टिप्पणी हैं और न ही किसी तरह का अकादमिक लेखन। उनके मुताबिक, यह अदालतों की दुनिया के ऐसे वास्तविक प्रसंगों का संग्रह है, जिनमें हास्य, विडंबना और मानवीय व्यवहार की झलक मिलती है। मेहता ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह आमतौर पर न्यायाधीशों के सामने अदालत में पेश होते हैं, साहित्यिक मंचों पर नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि कानून की दुनिया में “लॉफुल” और “ऑफुल” के बीच की रेखा कई बार बेहद पतली हो जाती है और उनकी किताबें उसी दुनिया की हल्की-फुल्की परतें खोलती हैं।
कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा गृह मंत्री अमित शाह के भाषण की रही। शाह ने शुरुआत में ही यह कहते हुए माहौल हल्का कर दिया कि उन्हें सुबह किसी ने सलाह दी थी कि उनके भाषण को केवल एक दोस्त के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि सरकार और न्यायपालिका के रिश्तों के संदर्भ में समझा जाएगा। शाह ने कहा कि वह यहां किसी विवाद को जन्म देने नहीं आए हैं और मीडिया को इस कार्यक्रम से कोई “कंट्रोवर्शियल” बयान नहीं मिलने वाला।
तुषार मेहता मेरे तीन दशक पुराने दोस्त: अमित शाह
उन्होंने कहा कि उनके पास अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए कई मंच हैं, लेकिन यह अवसर तुषार मेहता के साहित्यिक प्रयास का है। अमित शाह ने तुषार मेहता को अपना तीन दशक पुराना मित्र बताते हुए कहा कि कानून के गंभीर पेशे में रहने के बावजूद उनमें साहित्य, उर्दू शायरी और हास्य के प्रति गहरी रुचि हमेशा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मेहता के संदेश और शेर हमेशा प्रासंगिक होते हैं।
हालांकि शाह ने मंच से एक हल्का तंज भी किया। उन्होंने कहा कि तुषार मेहता ने यह तो कहा कि वह भारतीय अदालतों पर इसलिए नहीं लिख रहे क्योंकि यहां प्रैक्टिस करते हैं, लेकिन साहस आधा-अधूरा रह गया क्योंकि उन्होंने भारतीय अदालतों और न्यायाधीशों पर लिखने से परहेज किया। शाह ने मुस्कुराते हुए कहा कि अब यह तय करना लोगों पर है कि उनकी यह टिप्पणी अदालतों पर है या तुषार मेहता पर।
कार्यपालिका और न्यायपालिका: टकराने के लिए नहीं, संतुलन के लिए
अपने भाषण में शाह ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्तों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि 76 वर्षों में संस्थाओं के बीच संतुलन और मर्यादा कायम रही। उनके मुताबिक, संविधान ने न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक-दूसरे से टकराने के लिए नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने के लिए बनाया है। शाह ने कहा कि जनता का यह भरोसा लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है कि यदि उसके अधिकारों का हनन होगा तो अदालतों के दरवाजे खुले मिलेंगे।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि व्यवस्था में कुछ “लूपहोल्स” हैं, जिन्हें न्यायपालिका और कार्यपालिका को मिलकर दूर करना होगा। शाह ने कहा कि संस्थागत संतुलन और पारस्परिक सम्मान ही लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।
CJI जस्टिस सूर्यकांत ने भी ली चुटकी
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी अपने संबोधन में हास्य और व्यंग्य का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि तुषार मेहता की किताबें अदालतों की दुनिया को डर और औपचारिकता से निकालकर मानवीय अनुभवों की दुनिया में ले जाती हैं। उनके मुताबिक, किताबें यह दिखाती हैं कि कानून केवल आदेशों और आपत्तियों का विषय नहीं है, बल्कि अदालतों के भीतर मानवीय व्यवहार, हास्य और विचित्र परिस्थितियां भी लगातार मौजूद रहती हैं।
सीजेआई ने मजाक में कहा कि उन्हें सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि तुषार मेहता ने इतनी व्यस्त संवैधानिक जिम्मेदारियों के बीच दो किताबें लिखने का समय कैसे निकाला। उन्होंने कहा कि या तो मेहता ने "भगवान से दिन का 25वां घंटा" हासिल कर लिया है या फिर कोर्ट नंबर-1( मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट) में लंबी सुनवाई के दौरान हास्य लेखन शुरू कर दिया।
जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि संभवतः भारतीय अदालतों और न्यायाधीशों को किताबों से बाहर रखना संपादकीय निर्णय कम और सर्वाइवल इंस्टिंक्ट ज्यादा था। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि अगर तुषार मेहता भारतीय न्यायाधीशों की आदतों और अदालतों के प्रसंगों पर लिखते तो उनकी अगली मेंशनिंग ही खारिज हो जाती।
सीजेआई ने यहां तक कहा कि तुषार मेहता को अपनी “तीसरी किताब” भारतीय अदालतों और कानूनी दुनिया पर लिखनी चाहिए, क्योंकि यहां हास्य और विचित्र घटनाओं की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की अदालतों का अकेला कानूनी गलियारा ही पूरी लाइब्रेरी भरने लायक किस्से दे सकता है।
कार्यक्रम के दौरान अदालतों और कानून की गंभीर दुनिया को हल्के अंदाज में देखने की कोशिश जरूर दिखी, लेकिन मंच से निकले संदेश कहीं अधिक व्यापक थे। एक तरफ कार्यपालिका और न्यायपालिका के रिश्तों पर सार्वजनिक विमर्श की झलक थी, तो दूसरी ओर यह स्वीकारोक्ति भी कि लोकतंत्र की स्थिरता संस्थागत मर्यादा और संतुलन पर ही टिकी रहती है।
