SC on Cyber Crime: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला ने रविवार को कहा कि बालिकाओं के ऑनलाइन दुनिया में पीड़ित होने का अधिक खतरा है और वर्तमान जांच पद्धतियां साइबर क्षेत्र में होने वाले जटिल अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अनुकूल नहीं हैं।
न्यायमूर्ति पारदीवाला बोले- वर्तमान जांच पद्धतियां साइबर क्षेत्र में अपराधों से निपटने के अनुकूल नहीं। (ANI)
न्यायमूर्ति पारदीवाला 'यूनिसेफ इंडिया' के सहयोग से उच्चतम न्यायालय की किशोर न्याय समिति (जेजेसी) द्वारा आयोजित 'बालिकाओं की सुरक्षा: भारत में उनके लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण की ओर' विषय पर राष्ट्रीय वार्षिक परामर्श कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
'यह पहला कार्यक्रम है जिसमें मैं शामिल हो रहा'
उन्होंने कहा, 'मैं पिछले साढ़े तीन साल से उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के तौर पर कार्यरत हूं। यह पहला कार्यक्रम है जिसमें मैं शामिल हो रहा हूं। इसका कारण सरल है... मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिन विषयों पर हम चर्चा कर रहे हैं, उन पर परामर्श, जमानत कैसे दी जाए, कब जमानत दी जाए, कब नहीं दी जाए, अमुक व्यक्ति का भविष्य, अमुक व्यक्ति के सामने आने वाली चुनौतियां आदि जैसे विषयों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।'
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, 'मैं कम बोलने वाला व्यक्ति हूं और जब मैं कोई बात सीधे तौर पर कहना चाहता हूं, तो मैं शब्दों को तोड़-मरोड़कर कहने में विश्वास नहीं करता। मैं अपनी बात सीधे और सारगर्भित ढंग से कहना चाहता हूं। सिर्फ बात करना ही काफी नहीं है।'
'सहानुभूति रखने वाले लोगों की टीम की जरूरत'
उन्होंने कहा कि ऐसे सैकड़ों परामर्श दिए जा सकते हैं, सैकड़ों पुस्तिकाएं जारी की जा सकती हैं, लेकिन ऐसी कवायद अपने आप में पर्याप्त और पूर्ण नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'सिर्फ फैसले ही काफी नहीं होंगे। समय की मांग है कि हम जमीनी स्तर पर काम करें। हमें करुणा और सहानुभूति रखने वाले लोगों की टीम की जरूरत है।'
'बच्चों की अनदेखी...'
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 'हमारे सामूहिक प्रयास एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्रता प्राप्त करने के काफी बाद शुरू हुए।' उन्होंने कहा, 'ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि बच्चे मतदाता वर्ग का हिस्सा नहीं हैं और इसलिए नीति निर्माताओं द्वारा अक्सर उनकी अनदेखी की जाती है।'
तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल विश्व से संबंधित मुद्दे पर न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि साइबर अपराध पर आयोजित सत्र में इंटरनेट द्वारा प्रस्तुत जोखिमों और अवसरों दोनों पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा, 'ऑनलाइन दुनिया में भी बच्चियों के उत्पीड़न का खतरा ज्यादा है। अपराधी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध करने के लिए डिजिटल दुनिया का फायदा उठाते हैं। हमारी वर्तमान जांच-पड़ताल की पद्धतियां साइबर क्षेत्र में होने वाले जटिल अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं।'
'ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान की जाए'
उन्होंने कहा, 'इसलिए, हमने बच्चों, विशेषकर लड़कियों को ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करने के लिए अधिक कठोर कानूनी सुरक्षा उपायों, उन्नत कानून प्रवर्तन तथा प्रौद्योगिकी के अधिक प्रभावी उपयोग की आवश्यकता को पहचाना, ताकि उन्हें सीखने और बढ़ने में सक्षम बनाया जा सके।'
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और कड़वा सच है कि संविधान के 75 वर्ष बाद भी देश बच्चों, विशेषकर बालिकाओं के अधिकारों के संबंध में सुधार के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र ने अतीत में गलतियां की होंगी और भविष्य में भी गलतियां होने की आशंका है, लेकिन वह संविधान द्वारा निर्धारित मार्ग पर चलने तथा लोकतांत्रिक तरीकों से सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प है।
'अनेक चुनौतियां हैं...'
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, 'बालिकाओं के लिए सहायक और अनुकूल वातावरण बनाने के उद्देश्य से अनेक कानून और योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन हमें इस कटु वास्तविकता को भी स्वीकार करना होगा कि इन कानूनों के क्रियान्वयन में अनेक चुनौतियां हैं, जो समाज में गहरी जड़ें जमाए बैठी प्रवृत्तियों और मानदंडों से उत्पन्न होती हैं, जिनसे समाज मुक्त होने को तैयार नहीं है।'
