Ahmedabad Plane Crash: सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद में 12 जून को हुए एअर इंडिया फ्लाइट AI171 हादसे की जांच को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को नोटिस जारी किया। इस याचिका में कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी। अदालत ने सिविल एविएशन मंत्रालय, डीजीसीए और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) से जवाब मांगा है।
अहमदाबाद में हुआ था एयर इंडिया का प्लेन क्रैश। (Photo- PTI)
हालांकि कोर्ट ने ये भी साफ किया कि यह नोटिस केवल स्वतंत्र, निष्पक्ष और शीघ्र जांच सुनिश्चित करने के सीमित उद्देश्य से जारी किया गया है। इस हादसे में यात्रियों, चालक दल और जमीन पर मौजूद लोगों सहित 265 लोगों की मौत हुई थी। अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
क्या है याचिकाकर्ता की मांग?
यह याचिका विमानन सुरक्षा संगठन सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन ने दाखिल की है, जिसका नेतृत्व कैप्टन अमित सिंह कर रहे हैं। संस्था ने कहा है कि एएआईबी की प्रारंभिक रिपोर्ट अधूरी है और इसमें कई अहम जानकारियों को छुपाया गया है। रिपोर्ट में हादसे की जिम्मेदारी सीधे पायलट पर डाल दी गई है, जबकि वास्तविक तकनीकी पहलुओं को सामने नहीं लाया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि जांच में पारदर्शिता नहीं है और यह यात्रियों की सुरक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि दुर्घटना को सौ दिन से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन अब तक केवल प्रारंभिक रिपोर्ट ही सामने आई है। इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि हादसा क्यों हुआ और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए क्या सावधानियां जरूरी हैं। भूषण ने कहा कि इस लापरवाही का नतीजा यह है कि आज भी बोइंग विमानों में यात्रा करने वाले यात्री खतरे में सफर कर रहे हैं।
उन्होंने कोर्ट में ये भी कहा कि जांच के लिए पांच सदस्यीय दल बनाया गया है, जिनमें से तीन सदस्य डीजीसीए से जुड़े हैं। यह स्थिति गंभीर हितों के टकराव को दर्शाती है, क्योंकि डीजीसीए की भूमिका खुद भी जांच के दायरे में हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि निष्पक्ष जांच की मांग तो समझ में आती है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि इतनी अधिक जानकारी सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों बताई जा रही है। उन्होंने कहा कि गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है ताकि अधूरी सूचनाओं के आधार पर अफवाहें और गलत धारणाएं न फैलें।
कोर्ट ने यह भी माना कि जांच स्वतंत्र विशेषज्ञों के हवाले की जानी चाहिए और इसे समयबद्ध तरीके से पूरा करना आवश्यक है, ताकि पीड़ित परिवारों और यात्रियों के सामने सच्चाई साफ हो सके।
