PNS Ghazi पाकिस्तान की एक पनडुब्बी यानी सब-मरीन थी, जिसकी 'कब्र' आज भी बंगाल की खाड़ी में समुद्र की गहराईयों में मौजूद है। पाकिस्तान को यह पनडुब्बी अमेरिका से मिली थी। अमेरिका में इस पनडुब्बी का नाम डियाब्लो था। 31 मार्च 1945 को यह सब-मरीन अमेरिकी नेवी में कमीशन हुई थी। साल 1963 में अमेरिका ने इस पनडुब्बी को शैतानी दिमाग वाले पाकिस्तान को लीज पर दे दिया। पाकिस्तान ने इस पनडुब्बी को अपनी नेवी में शामिल करते हुए इसका नाम पीएनएस गाजी (PNS Ghazi) रख दिया। बता दें कि ट्रेंच क्लास की इस सब मरीन के पहले नाम यानी डियाब्लो का मतलब भी स्पैनिश में शैतान ही होता है। लेकिन PNS गाजी इतनी बड़ी सब-मरीन थी, उसकी क्षमताएं इतनी ज्यादा थी कि वह न तो 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में और न ही 1971 के युद्ध में INS विक्रांत का पता लगा पायी। जबकि दोनों ही युद्धों में उसे भारत की शान INS विक्रांत का पता लगाकर उसे तबाह करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
शिकारी बनकर आयी पाकिस्तानी सब-मरीन, खुद ही शिकार बन गई
95 मीटर लंबी PNS गाजी का वजन समुद्र की सतह पर 1570 टन और पानी में 2453 टन था। इसके इंसिग्निया में एक शैतान को समुद्र में टॉरपीडो लेकर दौड़ते हुए दिखाया गया था। 1 दिसंबर 1944 को लान्च हुई इस सब मरीन को मार्च 1945 में डियाब्लो के नाम से पोर्ट्समाउथ नेवी यार्ड में कमीशन किया गया था। इसके बाद यह पर्ल हार्बर होते हुए अपनी पहली गश्त पर निकली थी। दूसरे विश्व युद्ध के अंतिम दिनों तक यह कई मिशनों पर तैनात रही और 1946 में अमेरिका के पूर्वी तट पर सक्रिय रही। अमेरिका के लिए कई साल तक सेवाएं देने के बाद डियाब्लो को 1 जून 1964 को डि-कमीशन करके पाकिस्तान को लीज पर दे दिया गया।
दक्षिण एशिया की पहली पनडुब्बी
जैसा कि आप जानते हैं, पाकिस्तान आने के बाद डियाब्लो का नाम PNS विक्रांत कर दिया गया था। यह दक्षिण एशिया की किसी भी नेवी द्वारा संचालित पहली पनडुब्बी थी। जब तक यह सब-मरीन पाकिस्तान को मिली, तब तक इसके कई सिस्टम पुराने पड़ चुके थे और उन्हें डाउनग्रेड भी कर दिया गया था। लेकिन पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ अपना सबसे बड़ा हथियार मान बैठा और भारत के लिए रणीनीतिक चुनौती के रूप में पेश भी किया।
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में PNS गाजी
इस बीच 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया। PNS गाजी मिलने से फूले नहीं समा रहे पाकिस्तान ने भारतीय युद्धपोतों, खासतौर पर भारत की शान INS विक्रांत को निशाना बनाने के लिए PNS गाजी को तैनात कर दिया। PNS गाजी ने पूरी कोशिश की, लेकिन वह INS विक्रांत का पता नहीं लगा पायी। इस युद्ध के दौरान PNS गाजी ने भारत के युद्धपोत INS ब्रह्मपुत्र पर तीन टॉरपीडो दागने का दावा किया, लेकिन की भी नुकसान की पुष्टि नहीं हुई।
1971 में विक्रांत को डुबोने निकला PNS गाजी
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले 1970 में PNS गाजी को तुर्की के गोलचुक शिपयार्ड में बड़े अपडेट मिले। 1971 के युद्ध से पहले ही पाकिस्तान की हालत लगातार बिगड़ने लगी थी। एक तरफ भारत की मदद के पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी ने पाक सेना की नाक में दम कर रखा था, दूसरी तरफ INS विक्रांत के डर से वह समुद्र में भी कुछ नहीं कर पा रहा था। आखिर पाकिस्तान ने PNS गाजी को एक लंबी और जोखिम भरी यात्रा के लिए भारत के पूर्वी तट की ओर रवाना कर दिया। पुराने पड़ चुके उपकरणों वाली PNS गाजी को दो अहम मिशन दिए गए थे। एक था INS विक्रांत को डुबोना और दूसरा बंगाल की खाड़ी में माइंस बिछाना। क्योंकि बंगाल की खाड़ी में भारत की मौजूदगी के कारण पाकिस्तानी सेना समुद्र के रास्ते पूर्वी पाकिस्तान नहीं पहुंच पा रही थी।
1971 में भारतीय नौसेना ने INS विक्रांत को विशाखापटनम में मौजूद पूर्वी नौसेना कमांड में तैनात कर दिया था। PNS गाजी पुराना जरूर था, लेकिन तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बुरी तरह से पिट रहे पाकिस्तान के लिए यही एकमात्र उम्मीद की किरण बचा था। 14 नवंबर 1971 को PNS गाजी ने अरब सागर से बंगाल की खाड़ी के लिए अपनी 4800 किमी की यात्रा शुरू की। PNS गाजी के कमांडर जफर मुहम्मद पहली बार नेवी सब-मरीन को कमांड कर रहे थे। उनके साथ सबमरीन में 10 अन्य ऑफिसर और 82 सेलर्स भी थे।
और डूब गया PNS गाजी
PNS गाजी ने भारत के विमान वाहक पोत INS विक्रांत की खोज मद्रास के आसपास की, जहां के बारे में उसके ऑफिसर्स को जानकारी थी कि INS विक्रांत तैनात था। लेकिन PNS गाजी के पास जो जानकारी थी, वह 10 दिन पुरानी थी और अब INS विक्रांत अंडमान निकोबार के आसपास कहीं था। PNS गाजी ने विशाखापटनम जाकर माइंस बिछाने का फैसला किया। PNS गाजी के ऑफिसर्स को भरोसा था कि वह INS विक्रांत को जल्द ही ढूंढ़ लेंगे नहीं तो भारतीय नौसेना के कुछ युद्धपोतों को नुकसान पहुंचाकर उसकी ताकत कम कर देंगे। भारतीय नौसेना को 1 दिसंबर को ही पता चल गया था कि PNS गाजी श्रीलंका के तट के आसपास पहुंच चुका है। 3 दिसंबर को INS राजपूत ईंधन लेने के बाद अपने नेवीगेशनल इक्विपमेंट को बंद करके आगे बढ़ा। कुछ ही समय बाद INS राजपूत को पानी की सतह के नीचे कुछ दिखा और उसने उसी तरफ दो हमले किए तो जोरदार धमाके सुनाई दिए। इसके बाद INS राजपूत ने कई और बम उस दिशा में दागे। 4 और 5 दिसंबर 1971 की रात PNS गाजी बंगाल की खाड़ी में दफन हो गया। सब-मरीन के साथ इसमें मौजूद 82 सेलर्स, 10 अफसर और कमांडर जफर मुहम्मद भी डूब गए। भारतीय नौसेना ने 9 दिसंबर को PNS गाजी के बारे में जानकारी दी।
