School Junk Food: दोपहर में स्कूल की छुट्टी होती है। बच्चे बैग लेकर गेट से बाहर निकलते हैं और सामने समोसे, वड़ा पाव, चिप्स, टॉफी, आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक की दुकान दिखाई देती है। किसी बच्चे के पास पॉकेट मनी है तो किसी का दोस्त चिप्स का पैकेट खरीद लेता है। देखते ही देखते चार-पांच बच्चे मिलकर उसे खाने लगते हैं।
पहली नजर में इसमें बहुत बड़ी परेशानी नजर नहीं आती। बच्चा दिनभर स्कूल में रहा है, उसे भूख लगी है और उसने दस-बीस रुपये की कोई चीज खा ली। लेकिन जब यह कभी-कभार नहीं, बल्कि रोज की आदत बन जाए तो बात केवल एक समोसे या चिप्स के पैकेट तक सीमित नहीं रहती। यह उस माहौल का सवाल बन जाता है, जिसमें बच्चा हर दिन जंक खा रहा है।
बच्चों के जंक खानपान की आदतों पर कंट्रोल रखने के लिउ महाराष्ट्र सरकार ने स्कूलों और उनके 50 मीटर के दायरे में ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाले खाने की बिक्री, मुफ्त बांटने और प्रचार करने पर रोक लगाने का फैसला लिया है। नियम तोड़ने पर स्कूल प्रबंधन और प्रिंसिपल के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। इस फैसले के बाद यह सवाल चर्चा में है कि क्या स्कूल के बाहर मिलने वाले स्नैक्स भी बच्चों में बढ़ते मोटापे और खराब सेहत की एक बड़ी वजह बन रहे हैं?
बच्चों में बढ़ता मोटापा क्यों चिंता की बात है
बच्चों में मोटापा अब किसी एक शहर या देश की समस्या नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2022 में दुनिया के 5 से 19 साल के 39 करोड़ से ज्यादा बच्चे और किशोर ओवरवेट थे। साल 1990 में इस उम्र के करीब 8 प्रतिशत बच्चे ओवरवेट थे। वहीं 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गया।
साल 2025 में जारी यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 5 से 19 साल का हर पांचवां बच्चा या किशोर ओवरवेट है। करीब 18.8 करोड़ बच्चे मोटापे के साथ जी रहे हैं। वहीं भारत में भी तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली है। यूनिसेफ के मुताबिक, NFHS के आंकड़ों में किशोर लड़कियों में ओवरवेट और मोटापा 2.4 प्रतिशत से बढ़कर 5.4 प्रतिशत हो गया। किशोर लड़कों में यह आंकड़ा 1.7 प्रतिशत से बढ़कर 6.6 प्रतिशत तक पहुंच गया। भारत के Comprehensive National Nutrition Survey के आंकड़ों पर हुई एक स्टडी में 5 से 9 साल के बच्चों में ओवरवेट और मोटापे की कुल दर करीब 4.18 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
बच्चों में मोटापे को लेकर चौंकाने वाले हैं आंकड़े
भले ही यह प्रतिशत आंकड़ों में कम दिखाई देता है, लेकिन भारत में बच्चों की बड़ी आबादी को देखते हुए इसकी संख्या को मामूली नहीं कहा जा सकता है।
वजन ज्यादा, फिर भी शरीर में पोषण कम
अक्सर हमें लगता है कि जिस बच्चे का वजन ज्यादा है, उसे भरपूर खाना और पोषण मिल रहा होगा। यह जरूरी नहीं है। दरअसल, कई बच्चों को कैलोरी तो जरूरत से ज्यादा मिल रही होती है, लेकिन उनके खाने में प्रोटीन, आयरन, विटामिन, फल, सब्जियां और साबुत अनाज बहुत कम होते हैं।
यानी बच्चा देखने में स्वस्थ या ज्यादा वजन वाला लग सकता है, लेकिन उसके शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।
ऐसा तब होता है जब बच्चे के खाने का बड़ा हिस्सा चिप्स, बिस्कुट, फ्रेंच फ्राइज, इंस्टेंट नूडल्स, कोला और दूसरी पैकेट वाली चीजों से आने लगे। इनसे पेट भर सकता है और कैलोरी भी काफी मिल सकती है, लेकिन शरीर को ताकत और ग्रोथ देने वाली चीजों की आपूर्ति इससे नहीं होती है।
स्कूल की छुट्टी के बाद के 15 मिनट क्यों अहम हैं
डॉ. मनीष मन्नान, Head of Department, Pediatrics and Neonatology, Paras Health, Gurugram के मुताबिक, स्कूल के बाद के 15 से 20 मिनट में बच्चों को सबसे ज्यादा भूख लगती है। यही वह समय है जब स्कूल गेट के आसपास कुरकुरे, नमकीन, मीठे और सस्ते स्नैक्स आसानी से मिल जाते हैं।
बच्चा भूखा है, उसके पास ज्यादा समय नहीं है और सामने ऐसी चीज रखी है जिसे तुरंत खरीदा और खाया जा सकता है। आकर्षक पैकेट, चटपटा स्वाद और दोस्तों को खाते देखकर पैदा हुई इच्छा उसके लिए मना करना और मुश्किल बना देती है।
डॉ. मन्नान कहते हैं, ‘बच्चे इन्हें जल्दी पसंद करने लगते हैं और धीरे-धीरे ये चीजें घर के पौष्टिक खाने की जगह लेने लगती हैं। आजकल ऐसे कई बच्चे देखने को मिल रहे हैं जिनका वजन सामान्य या ज्यादा हो सकता है, लेकिन फिर भी उनके शरीर को सही पोषण नहीं मिल रहा होता। इसकी वजह यह है कि उनकी रोज की ज्यादातर कैलोरी प्रोटीन, फल, सब्जियों और साबुत अनाज की जगह बहुत ज्यादा प्रोसेस किए गए स्नैक्स से आती है।’
पेट भरता है पर पोषण नहीं देता है जंक
सीधी-सी बात है कि सवाल केवल यह नहीं कि बच्चे ने स्कूल के बाहर क्या खाया। यह भी देखना जरूरी है कि उस स्नैक को खाने के बाद उसने घर की दाल, रोटी, सब्जी, दही या फल कितना खाया।
रोज का छोटा पैकेट कैसे बड़ी आदत बन जाता है
चिप्स, नमकीन, बिस्कुट और दूसरी पैकेट वाली चीजों में अक्सर नमक, चीनी और फैट का ऐसा मेल होता है, जो बच्चों को बहुत स्वादिष्ट लगता है। इन्हें नियमित खाने पर बच्चे को घर का सामान्य खाना फीका लग सकता है।
धीरे-धीरे दाल से ज्यादा चिप्स, फल से ज्यादा टॉफी और दूध से ज्यादा मीठा पेय पसंद आने लगता है। इसके बाद एक पूरा चक्र बन जाता है।
बच्चा स्कूल से निकलकर तली हुई या पैकेट वाली चीज खाता है। घर पहुंचकर खाना कम खाता है। शाम को दोबारा भूख लगने पर बिस्कुट, नूडल्स या नमकीन मांगता है। इसके बाद टीवी या मोबाइल के सामने बैठ जाता है और खेलना-कूदना भी कम हो जाता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बचपन का मोटापा केवल समोसा या चिप्स खाने से नहीं होता। डॉ. मन्नान के अनुसार, परिवार की खाने की आदतें, शरीर की बनावट, नींद की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम, खेलकूद की कमी, तनाव और आसपास मिलने वाला खाना, ये सभी कारण मिलकर वजन बढ़ा सकते हैं। स्कूल के बाहर रोज मिलने वाला जंक फूड इसी कड़ी का एक अहम हिस्सा है।
मोटापे के साथ फैटी लिवर और कैविटी का भी खतरा
डॉ. अमित प्रकाश सिंह, Consultant–Internal Medicine, CK Birla Hospital, Delhi के मुताबिक महाराष्ट्र सरकार का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है। स्कूलों के आसपास मिलने वाली बहुत-सी चीजों में चीनी, फैट और नमक ज्यादा होता है, जबकि उनमें शरीर के काम आने वाला पोषण बहुत कम होता है।
अगर बच्चे ऐसी चीजें नियमित रूप से खाते हैं तो उनका वजन बढ़ सकता है। इसके साथ फैटी लिवर, दांतों में सड़न और कैविटी जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है। लंबे समय तक खराब खानपान और बढ़ते वजन के कारण शरीर में इंसुलिन ठीक से काम करना कम कर सकता है। आगे चलकर इससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।
आज का जंक फूड कल की बड़ी बीमारी बन सकता है
डॉ. मनीष मन्नान के मुताबिक ज्यादा चीनी और नमक वाले स्नैक्स नियमित खाने वाले बच्चों में दिनभर एनर्जी की कमी, पढ़ाई में ध्यान लगाने में परेशानी और चिड़चिड़ापन भी देखा जा सकता है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि बचपन में बनी ये गलत आदतें बड़े होने के बाद भी बनी रह सकती हैं।
खुले में बिकने वाला खाना भी बढ़ा सकता है परेशानी
स्कूल के बाहर मिलने वाले खाने में केवल नमक, चीनी और फैट ही चिंता की वजह नहीं हैं। उसके बनने और रखे जाने का तरीका भी देखना जरूरी है।
कई जगह समोसे, पकौड़े और दूसरी चीजें बार-बार एक ही तेल में तली जाती हैं। खुले में रखी चीजों पर धूल और मक्खियां बैठ सकती हैं। गंदे पानी, खराब सामान या साफ-सफाई की कमी के कारण बच्चों को पेट का संक्रमण, उल्टी-दस्त और दूसरी परेशानियां हो सकती हैं।
हर ठेला या छोटी दुकान गंदी हो, यह कहना सही नहीं होगा। लेकिन बच्चों के लिए खाना बेचने वाली जगहों पर साफ-सफाई और खाने की क्वालिटी की जांच जरूरी है।
क्या बच्चों के लिए समोसा-चिप्स बिल्कुल बंद कर देना चाहिए
इसका जवाब है, नहीं। बच्चों को यह कहना कि वे जिंदगीभर समोसा, चिप्स, मिठाई या आइसक्रीम कभी न खाएं, व्यावहारिक नहीं है। जरूरी यह समझाना है कि कौन-सी चीज रोज खाई जा सकती है और कौन-सी कभी-कभार।
अगर बच्चा महीने में एक-दो बार परिवार के साथ समोसा खाता है, बाकी दिनों में संतुलित खाना खाता है और खेलता-कूदता भी है, तो यह उस बच्चे से अलग स्थिति है जो रोज स्कूल के बाहर तला हुआ स्नैक, चिप्स और मीठा पेय ले रहा है।
असल समस्या किसी एक चीज में नहीं, बल्कि उसे कितनी मात्रा में और कितनी बार खाया जा रहा है, इसमें छिपी है। यह भी देखना होगा कि जंक फूड के कारण पौष्टिक खाना कम तो नहीं हो रहा।
इस मुद्दे पर बच्चे को शर्मिंदा करना भी ठीक नहीं है। तुम मोटे हो रहे हो, इतना खाना बंद करो या उसके शरीर पर बार-बार कमेंट करना नुकसान पहुंचा सकता है। बेहतर होगा कि बच्चे से उसके वजन की बजाय उसकी ताकत, एनर्जी, खेल, नींद, पढ़ाई और सेहत की बात करें।
क्या 50 मीटर की रोक से समस्या खत्म हो जाएगी
महाराष्ट्र सरकार का फैसला जरूरी है, क्योंकि यह खाने का पूरा जिम्मा बच्चे पर नहीं डालता। सात या दस साल के बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह तेज भूख, दोस्तों के दबाव और सामने रखे चटपटे खाने के बीच हर बार सबसे हेल्दी विकल्प ही चुनेगा।
जब स्कूल के आसपास अनहेल्दी चीजें आसानी से नहीं मिलेंगी, तो बच्चों के उन्हें अचानक खरीदने की संभावना भी कम होगी। लेकिन केवल दुकान को 50 मीटर दूर कर देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
अगर स्कूल की कैंटीन में वही अनहेल्दी चीजें बिकती रहें, बच्चा खाली टिफिन लेकर आए या छुट्टी के बाद उसके पास खाने के लिए कुछ अच्छा न हो, तो वह थोड़ी दूर जाकर वही स्नैक खरीद सकता है।
इसलिए रोक लगाने के साथ बच्चों को हेल्दी, स्वादिष्ट और कम कीमत वाले विकल्प देना भी जरूरी है। बच्चे को भूखा छोड़कर उससे सही खाना चुनने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
स्कूल क्या कर सकते हैं बच्चों के जंक फूड खाने की आदत पर
स्कूल कैंटीन में भुना चना, मखाना, कॉर्न चाट, इडली, ढोकला, पोहा, वेजिटेबल सैंडविच, पनीर रोल, दही, छाछ और मौसमी फल जैसे विकल्प रखे जा सकते हैं। ये चीजें केवल हेल्दी ही नहीं, बल्कि बच्चों की पसंद के हिसाब से स्वादिष्ट भी बनाई जा सकती हैं।
डॉ. मन्नान बताते हैं कि कैंटीन के मेन्यू की समय-समय पर किसी न्यूट्रिशन एक्सपर्ट से जांच कराई जानी चाहिए। ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाली चीजों की बिक्री कम करने के साथ बच्चों के लिए साफ पानी और ताजा खाना भी उपलब्ध होना चाहिए।
बच्चों को पैकेट पर लिखा फूड लेबल पढ़ना सिखाया जा सकता है। उन्हें आसान तरीके से बताया जाए कि किसी चीज में चीनी या नमक कितना है और एक बार में कितना खाना ठीक है। इसके साथ स्कूल में खेल और दूसरी शारीरिक गतिविधियों के लिए भी पूरा समय मिलना चाहिए।
माता-पिता क्या कर सकते हैं बच्चों को जंक फूड खाने से रोकने के लिए
छुट्टी के समय के लिए छोटा स्नैक रखें: बच्चे के टिफिन में एक छोटा स्नैक अलग से रखें, जिसे वह स्कूल की छुट्टी से पहले या बस में खा सके। फल के साथ कुछ मेवे, पनीर सैंडविच, चीला रोल, भुना चना, मखाना या घर का पोहा दिया जा सकता है।
- पॉकेट मनी का नियम बनाएं: बच्चे को रोज पैसे देने की बजाय तय करें कि वह सप्ताह में कितनी बार बाहर की चीज खरीद सकता है। नियम बनाते समय बच्चे की राय भी लें।
- घर पहुंचते ही कुछ तैयार रखें: यदि घर का खाना तैयार होने में समय लगता है तो दही, फल, दूध, पनीर, मूंग चीला या बेसन का छोटा स्नैक तैयार रखा जा सकता है।
- खुद भी वही आदत अपनाएं: अगर माता-पिता रोज चाय के साथ नमकीन खाएं और टीवी देखते हुए चिप्स का पैकेट खोलें, लेकिन बच्चे से फल खाने को कहें, तो बात का असर कम होगा।
- बच्चे के वजन पर बार-बार कमेंट न करें: केवल देखकर बच्चे को मोटा या कमजोर न मानें। उसकी लंबाई और वजन को उम्र के हिसाब से डॉक्टर के ग्रोथ चार्ट पर जांचना चाहिए। वजन तेजी से बढ़ रहा हो, गर्दन पर कालापन दिखाई दे, थोड़ी मेहनत में सांस फूलने लगे या बच्चा बहुत सुस्त रहे तो बच्चों के डॉक्टर से सलाह लें।
बच्चों को बदलने से पहले उनके आसपास का माहौल बदलें
स्कूल गेट से भूखा बाहर निकलने वाला बच्चा उस समय कैलोरी, फैट या शुगर के बारे में नहीं सोचता। उसे बस सामने रखा चटपटा और आसानी से मिलने वाला खाना दिखाई देता है। इसलिए बचपन के मोटापे को केवल बच्चे की गलती या माता-पिता की लापरवाही बताना सही नहीं होगा।
सरकार नियम बनाए, स्कूल बेहतर विकल्प दें, दुकानदार साफ और सुरक्षित खाना बेचें और परिवार घर में अच्छी आदतें बनाए, तभी लंबे समय तक बदलाव दिखाई देगा।
