Times Network India Health Summit 2025: टाइम्स नेटवर्क इंडिया हेल्थ समिट 2025 में एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाला सेशन हुआ हुआ, जिसमें हेल्थ एक्सपर्ट्स ने फर्जी और घटिया क्वालिटी वाली दवाओं के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई।
नकली दवाओं की पहचान नामुमकिन
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि इन नकली दवाओं की पहचान करना आम लोगों के लिए तो दूर, कई बार फार्मासिस्ट के लिए भी लगभग असंभव है। इससे न सिर्फ मरीजों की सेहत पर, बल्कि उनके जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है।
पैनल ने सरकार से अपील की कि वह इस संकट से निपटने के लिए और सख्त कानून, गुणवत्ता नियंत्रण की मजबूत व्यवस्था और दवा सप्लाई चेन में पारदर्शिता सुनिश्चित करे।
‘कॉम्बैटिंग स्प्यूरियस एंड सबस्टैंडर्ड ड्रग्स इन इंडिया’
इंडिया हेल्थ समिट के इस सेशल की पैनल में शामिल थे,
- दुर्गा प्रसाद सतपति, एक्ज़ीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट, इंटास फार्मासूटिकल्स
- डॉ. रोहित गुटगुतिया, मेडिकल डायरेक्टर, नोना आईवीएफ फर्टिलिटी
- डॉ. प्रतीक दास, मेडिकल डायरेक्टर एवं चीफ, कोलकाता किडनी इंस्टीट्यूट
पैनल ने बताया कि देश में नकली दवाओं के कारण कई लोगों की जानें जा चुकी हैं - हाल में राजस्थान और मध्य प्रदेश में कम से कम 11 बच्चों की मौत इसका ताजा उदाहरण हैं।
नकली दवाओं की पहचान लगभग नामुमकिन
डॉ. सतपति ने साफ कहा, 'फर्जी दवाओं की पहचान करना लगभग नामुमकिन है। जो लोग इस धंधे में हैं, वे दवाओं की हूबहू नकल बना लेते हैं। कई बार तो उनकी पैकिंग असली दवा से भी बेहतर लगती है।'
उन्होंने बताया कि ये समस्या केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। यहां तक कि विकसित देशों में भी लोग अनजाने में नकली दवाएं ले रहे हैं, जिससे उनकी जान को खतरा बढ़ जाता है।
ऐंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का भी बड़ा कारण बन रहीं नकली दवाएं
डॉ. रोहित गुटगुतिया ने बताया, 'जब डॉक्टर किसी मरीज को दवा देता है और वह दवा घटिया क्वालिटी की होती है, तो बीमारी ठीक नहीं होती, बल्कि बैक्टीरिया और मजबूत हो जाता है। धीरे-धीरे यह ऐंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस की समस्या को बढ़ा देता है।'
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मरीज ही नहीं, डॉक्टरों के लिए भी चुनौती बन गया है, क्योंकि एक बार जब बैक्टीरिया दवाओं के असर से बचना सीख लेता है, तो इलाज और मुश्किल हो जाता है।
क्यों खतरनाक हैं फर्जी दवाएं
नकली दवाएं दिखने में बिल्कुल असली जैसी लगती हैं, लेकिन उनमें असली सक्रिय तत्व (active ingredient) या तो बहुत कम होता है या बिल्कुल नहीं होता। कई बार इनमें पारा (Mercury), आर्सेनिक (Arsenic), चूहे मारने की दवा (Rat poison) या सीमेंट तक मिला होता है। ऐसे पदार्थ शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
WHO के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले देशों में हर 10 में से 1 दवा नकली या घटिया क्वालिटी की होती है। यह सीधे तौर पर वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
नियामक संस्थाओं को मिलकर काम करने की जरूरत
डॉ. प्रतीक दास ने कहा, 'नियम तो बने हुए हैं, लेकिन उन पर सख्ती से अमल की जरूरत है। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर नियामक संस्थाओं को साथ मिलकर काम करना होगा।' उन्होंने यह भी कहा कि जांच, गुणवत्ता नियंत्रण और ट्रैकिंग सिस्टम को डिजिटल और पारदर्शी बनाना जरूरी है, ताकि नकली दवाएं बाजार तक पहुंच ही न पाएं।
फर्जी दवाओं का बढ़ता कारोबार
भारत जैसे बड़े बाजार में जहां लाखों लोग रोजाना दवाएं लेते हैं, वहां नकली दवाओं का फैलाव एक जन स्वास्थ्य आपदा जैसा है। ये दवाएं न सिर्फ मरीजों को राहत नहीं देतीं, बल्कि कई बार नई बीमारियों का कारण बन जाती हैं।
क्या करना जरूरी है
- सरकारी निगरानी और सख्त कानूनों की जरूरत
- दवा कंपनियों के लिए सख्त गुणवत्ता जांच
- जनता को जागरूक करना कि वे दवा हमेशा अधिकृत मेडिकल स्टोर या विश्वसनीय ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ही खरीदें
- डॉक्टर और फार्मासिस्ट्स को भी सतर्क रहने की जरूरत
इंडिया हेल्थ समिट 2025 में हुई यह चर्चा एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। फर्जी दवाएं केवल एक आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि ये इंसानी जान से जुड़ी त्रासदी हैं।
जब तक सख्त नियंत्रण, पारदर्शी सप्लाई चेन और जनता में जागरूकता नहीं बढ़ती — तब तक इस खतरे को रोकना मुश्किल रहेगा।
