मॉडर्न लाइफस्टाइल की भागमभाग ने बहुत से लोगों की नींद को बुरी तरह से डिस्टर्ब किया है। कुछ लोगों की आदत में देर रात में सोना और देरी से उठना शुमार है तो कुछ लोगों को जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत है। बहुत से लोग यह सोचते हैं कि अगर वे रात को हर दिन एक तय समय पर सोने चले जाएं, तो उनका स्लीप रूटीन बिल्कुल दुरुस्त है।
डेली अलग-अलग समय पर जागने से क्या होता है?(Photo: iStock)
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भले आप एक फिक्स टाइम पर सो जाएं, लेकिन क्या आप फिक्स टाइम पर जगते भी हैं? ज्यादातर हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार सुबह उठने का समय डेली बदलने से शरीर और दिमाग को भारी नुकसान पहुंच सकता है। आइए समझते हैं इसके संभावति नुकसान क्या हो सकते हैं:
सर्केडियन रिदम का डिसबैलेंस होना
हमारे शरीर में एक प्राकृतिक 24 घंटे की जैविक घड़ी होती है, जिसे सर्केडियन रिदम कहते हैं। यह घड़ी तय करती है कि हमें कब सोना है, कब जागना है और शरीर के हॉर्मोन्स कब रिलीज होंगे। जब हम सुबह अलग-अलग समय पर उठते हैं, तो यह घड़ी पूरी तरह भ्रमित हो जाती है। नतीजा ये कि आपकी बॉडी नेचुरल बैलेंस खोने लगती है।
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सोशल जेटलैग का शिकार होना
जब आप हफ्ते के पांच दिन सुबह जल्दी उठते हैं और छुट्टी के दिन दो-तीन घंटे अतिरिक्त सोते हैं, तो शरीर को ऐसा लगता है जैसे आपने किसी दूसरे टाइम जोन में यात्रा की हो। इसे मेडिकल भाषा में सोशल जेटलैग कहा जाता है। इस वजह से सोमवार की सुबह आपको सबसे ज्यादा थकान, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन महसूस होता है, क्योंकि शरीर समझ ही नहीं पाता कि उसे किस समय के हिसाब से काम करना है।
दिनभर थकान, सुस्ती और ब्रेन फॉग
कई बार लोगों को लगता है कि वीकेंड पर ज्यादा देर तक सोने से उनकी पूरे हफ्ते की नींद का बैकलाग पूरा हो जाएगा। हालांकि, सच्चाई इसके ठीक उलट है। अलग-अलग समय पर जागने से आपकी स्लीप क्वालिटी गिर जाती है। इससे आप उठने के बाद भी तरोताजा महसूस नहीं करते। दिनभर सुस्ती, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और ब्रेन फॉग का सामना करना पड़ता है।
मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र पर बुरा असर
हमारी पाचन क्रिया का सीधा संबंध हमारी नींद के पैटर्न से होता है। उठने का समय अनिश्चित होने से भूख लगने का समय और मेटाबॉलिज्म की गति प्रभावित होती है। इससे पाचन संबंधी समस्याएं जैसे एसिडिटी, गैस और कब्ज हो सकती हैं। इतना ही नहीं, अनियंत्रित स्लीप शेड्यूल से इंसुलिन का स्तर गड़बड़ा जाता है, जिससे वजन बढ़ने और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा काफी बढ़ जाता है।
हॉर्मोनल डिसबैलेंस और मूड स्विंग्स
सुबह सही समय पर धूप और प्राकृतिक रोशनी मिलना हमारे दिमाग में सेरोटोनिन (खुशी और सुकून देने वाला हॉर्मोन) और कोर्टिसोल (ऊर्जा देने वाला स्ट्रेस हॉर्मोन) को सही तरीके से रिलीज करने में मदद करता है। जब आप कभी 6 बजे तो कभी 9 बजे उठते हैं, तो हॉर्मोन्स का स्राव बिगड़ जाता है। इससे दिनभर चिड़चिड़ापन, घबराहट और मूड स्विंग्स की समस्या बनी रहती है।
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दिल की सेहत के लिए बढ़ता जोखिम
रिसर्च से पता चलता है कि जिन लोगों के जागने का समय लगातार बदलता रहता है, उनमें हाई ब्लड प्रेशर और दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा अधिक होता है। जब शरीर की जैविक घड़ी स्थिर नहीं रहती, तो दिल की धड़कन और रक्तचाप का स्तर भी प्रभावित होता है, जो लंबे समय में दिल की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित होता है।
मजबूत इम्युनिटी और ऊर्जा के लिए अपनाएं यह आदत
अगर आप सचमुच ऊर्जावान और सेहतमंद रहना चाहते हैं, तो सोने के समय से भी ज्यादा महत्वपूर्ण अपने उठने का समय निश्चित करना है। रोज एक ही समय पर जागने की आदत डालें, चाहे सोमवार हो या रविवार। जब आप हर दिन एक ही समय पर उठते हैं, तो रात को अपने आप सही समय पर नींद आने लगती है और आपकी इम्युनिटी मजबूत होती है।
