हिमालय की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित जोजिला दर्रा दशकों से भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण और रणनीतिक मार्गों में गिना जाता रहा है। हर साल भारी बर्फबारी के कारण यह दर्रा लगभग छह महीने तक बंद रहता है,जिससे लद्दाख,कारगिल और द्रास का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से प्रभावित हो जाता है, लेकिन अब इसका स्थायी समाधान हो गया है। आज जोजिला सुरंग परियोजना में एक अहम पड़ाव हासिल कर लिया गया। इसमें केंद्रीय सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में एक विस्फोट के बाद अंतिम'ब्रेकथ्रू'हासिल कर लिया गया। जिसके बाद अब इस परियोजना के अगले और अंतिम चरण के लिए काम और तेज गति से हो सकेगा। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर जोजिला सुरंग परियोजना क्या है, इसका इतिहास क्या है और इसका निर्माण होने के बाद क्या बदलेगा? साथ ही इस सुरंग की खासियतें क्या हैं और इसका सामरिक महत्व कितना है? आइए जानते हैं...
क्या होता है 'ब्रेकथ्रू'
आज जोजिला सुरंग परियोजना के तहत जोजिला दर्रे से ठीक नीचे सुरंग के भीतर अंतिम 2.5 मीटर की दूरी को सफलतापूर्वक भेद दिया गया है। सुरंग के निर्माण कार्य में 'ब्रेकथ्रू'उस स्थिति को कहते हैं, जब सुरंग की खुदाई दोनों दिशाओं से पूरी हो जाती है और सुरंग दोनों ओर आर-पार के लिए खुल जाती है।
क्या है जोजिला सुरंग परियोजना?
बता दें कि यह सुरंग समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट की ऊंचाई पर हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में बनाई जा रही है। यह बालटाल (सोनमर्ग के पास, जम्मू-कश्मीर) को लद्दाख के द्रास-कारगिल क्षेत्र स्थित मिनीमर्ग से जोड़ेगी।
20 साल पुराना सपना
जोजिला सुरंग की अवधारणा पहली बार 2005 में सामने आई थी। इसके बाद 2013 में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई और इसे कैबिनेट ने मंजूरी दी। हालांकि तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक कारणों से परियोजना लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी। फिर 2017 में आईएल एंड एफएस ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क्स लिमिटेड को इसके निर्माण का ठेका दिया गया। 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेह में इसकी आधारशिला रखी थी। हालांकि 2019 नें निर्माण कार्य कर रही कंपनी आईएल एंड एफएस ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क्स लिमिटेड वित्तीय संकट में फंस गई और परियोजना रुक गई। बाद में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के हस्तक्षेप के बाद परियोजना का पुनर्गठन किया गया। तब 2020 में इसका ठेका मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को सौंपा गया। जिसके बाद वह इस पर काम कर रही है।
कितनी लागत से तैयार हो रही जोजिला टनल
जोजिला सुरंग परियोजना की लागत समय के साथ बढ़ी है। 2013 में केंद्र सरकार ने इसके लिए 6,809 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी थी। 2017 में निर्माण का पहला ठेका आईएल एंड एफएस को 4,899 करोड़ रुपये में मिला, लेकिन कंपनी के दिवालिया होने से काम रुक गया। इसके बाद 2020 में मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) को 4,509 करोड़ रुपये की बोली पर नया ठेका दिया गया। अब निर्माण में देरी,महंगाई और रखरखाव लागत को जोड़ने के बाद परियोजना की कुल अनुमानित लागत बढ़कर 8,308 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है।
क्या होगा सबसे बड़ा फायदा?
सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण कश्मीर-लद्दाख नेशनल हाईवे लगभग 6 महीने तक बंद रहता है। ऐसे में यहां अधिकांश समय जोखिम भरा बना रहता है।सुरंग बनने के बाद वाहनों को ऊंचे और खतरनाक पहाड़ी दर्रे से होकर नहीं गुजरना पड़ेगा। इसके बजाय वे सीधे सुरंग के भीतर से सुरक्षित यात्रा कर सकेंगे।
3.5 घंटे से घटकर 15 मिनट में तय होगी दूरी
अभी श्रीनगर से लेह जाने वाले यात्रियों को जोजिला दर्रे को पार करने में कई घंटे लगते हैं। वहीं जब खराब मौसम हो तो यह यात्रा और भी कठिन हो जाती है। ऐसे में जब यह सुरंग पूरी तरह चालू हो जाएगी तो जोजिला पार करने का समय 3.5 घंटे से घटकर लगभग 15 मिनट रह जाएगा। इसके अलावा, पूरे साल सड़क संपर्क बना रहेगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों अहम?
जोजिला सुरंग का महत्व सिर्फ यातायात भर का नहीं है, बल्कि इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामरिक महत्व है। दरअसल, लद्दाख भारत का सबसे संवेदनशील सीमा क्षेत्र है,जहां चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा और सीमा संबंधी चुनौतियां मौजूद हैं। 1999 के कारगिल संघर्ष और उसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पैदा हुआ तनाव (खास तौर पर 2020 का गतिरोध) के कारण इस क्षेत्र का महत्व और भी बढ़ गया।
ऐसे में सर्दियों के दौरान सड़क संपर्क प्रभावित होने के कारण सैन्य रसद और आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है। अब जब जोजिला सुरंग पूरी तरह चालू हो जाएगी तो सेना को हर मौसम में लद्दाख से निर्बाध संपर्क मिलेगा। जिसके कारण हथियार, ईंधन और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति आसान होगी। इसके अलावा, किसी भी आपातकालीन हालातों में सीमावर्ती क्षेत्रों में त्वरित सैन्य तैनाती संभव होगी।
गौरतलब है कि यह सुरंग लद्दाख तक पहुंचने के लिए कई रणनीतिक मार्ग बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है। इनमें हिमाचल प्रदेश को जोड़ने वाला रोहतांग कॉरिडोर, जांस्कर क्षेत्र से होकर प्रस्तावित संपर्क मार्ग और जम्मू-कश्मीर को जोड़ने वाला जोजिला मार्ग शामिल हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बड़ा लाभ
कारगिल, द्रास और लेह क्षेत्र के लोगों की यह मांग करीब तीन दशक पुरानी रही है। सर्दियों में सड़क बंद होने से व्यापार,पर्यटन और रोजमर्रा की आपूर्ति प्रभावित होती है।सुरंग के पूरा होने पर पर्यटन को नई गति मिलेगी। कृषि और हस्तशिल्प उत्पादों की बाजार तक पहुंच बढ़ेगी। रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं तक पहुंच आसान होगी।
सुरक्षा के आधुनिक इंतजामों से लैस
जोजिला सुरंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर के आधुनिक सुरक्षा मानकों के अनुरूप विकसित किया जा रहा है, ताकि यात्रियों को हर मौसम में सुरक्षित और निर्बाध यात्रा का अनुभव मिल सके। सुरंग में आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। इसके तहत हर 750 मीटर की दूरी पर आपातकालीन पार्किंग (ले-बाय) की सुविधा होगी, जबकि सुरंग के दोनों ओर फुटपाथ बनाए जाएंगे। किसी भी आपदा या दुर्घटना की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराने के लिए हर 125 मीटर पर आपातकालीन कॉल बॉक्स और अग्निशमन हाइड्रेंट लगाए जाएंगे। इसके अलावा फायर अलार्म सिस्टम, स्वचालित अग्नि पहचान एवं शमन प्रणाली और पोर्टेबल अग्निशामक उपकरण भी उपलब्ध रहेंगे। सुरंग की निगरानी के लिए अत्याधुनिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, जिनकी फीड केंद्रीय नियंत्रण कक्ष तक पहुंचेगी। पूरे मार्ग में आधुनिक प्रकाश व्यवस्था, यातायात नियंत्रण प्रणाली और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम भी स्थापित किए जाएंगे, जिससे सुरंग के भीतर वाहनों की आवाजाही सुरक्षित, व्यवस्थित और सुचारु बनी रहेगी।