ग्रीनलैंड पर क्यों नरम पड़ गए ट्रंप के तेवर, क्या EU के विरोध ने बदल दी US राष्ट्रपति की सोच
दावोस सम्मेलन में ट्रंप क्या बोलेंगे इस पर दुनिया भर की नजरें थीं लेकिन यहां ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नरमी के संकेत दिए और फिर बाद में टैरिफ की बात से भी पलट गए। ट्रंप ने कहा कि 'ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए वह बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे।' ट्रंप का यह बयान ग्रीनलैंड, डेनमार्क सहित यूरोप के देशों के लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया।
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Jan 22, 2026, 06:35 PM IST
Trump stance on Greenland : ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते दिनों जो बयानबाजी की, उससे यूरोप का माहौल पूरी तरह गर्म हो गया था। यूरोप के देशों की तरफ से भी जवाब दिया जाने लगा जिससे यूएस और यूरोप में टकराव के हालात बनते जा रहे थे। मामला 'तू-तू मैं-मैं' की तरफ बढ़ रहा था। सैन्य कार्रवाई से ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने और इसका विरोध करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की ट्रंप की घोषणा के बाद यूरोप के देशों ने भी तय कर लिया था कि वे इसका मुकाबला करेंगे। जरूरत पड़ी तो वे अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाएंगे और उसके उत्पादों को यूरोप में दाखिल होने से रोक देंगे। यानी जवाब कार्रवाई का मंच यहां भी तैयार हो रहा था। यूरोप के तेवरों के बाद ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व आर्थिक मंच की बैठक में शामिल होने के लिए जब दावोस पहुंचेंगे तो वे ग्रीनलैंड पर अपने रुख पर कायम रहेंगे या उससे भी आगे बढ़कर कुछ दावा कर सकते हैं।
ग्रीनलैंड पर नरमी, टैरिफ पर यू-टर्न
दावोस सम्मेलन में ट्रंप क्या बोलेंगे इस पर दुनिया भर की नजरें थीं लेकिन यहां ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नरमी के संकेत दिए और फिर बाद में टैरिफ की बात से भी पलट गए। ट्रंप ने कहा कि 'ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए वह बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे।' ट्रंप का यह बयान ग्रीनलैंड, डेनमार्क सहित यूरोप के देशों के लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया। ट्रंप ने बाद में कहा कि वह ग्रीनलैंड टैरिफ भी नहीं लगाएंगे। दरअसल, उनकी ग्रीनलैंड योजना का जब यूरोप के देश विरोध करने लगे तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि विरोध करने वाले देशों पर वह टैरिफ लगा देंगे। समझा जा रहा था कि दावोस के संबोधन में ट्रंप ग्रीनलैंड पर अपने आक्रामक तेवर को जारी रखते हुए यूरोपीय देशों को सख्त संदेश दे सकते हैं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह बोले तो जरूर लेकिन वह ग्रीनलैंड, नाटो और अन्य विषयों पर अपनी बात जायज ठहराने के लिए लंबी-चौड़ी सफाई पेश की।
दावोस में ग्रीनलैंड पर क्या कहा
दावोस पहुंचने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति अपने इसी बयान पर कायम थे कि ग्रीनलैंड से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है। इसे हासिल करने के लिए यदि सैन्य बल की जरूरत पड़ी तो वह इसका प्रयोग भी करेंगे। इस बीच, ग्रीनलैंड में पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस पर मिलिट्री एयरकाफ्ट के पहुंचने से बल प्रयोग की आशंका तेज हो गई थी। व्हाइट हाउस ने भी कहा था कि बल प्रयोग का विकल्प खुला है।
विश्व आर्थिक मंच की बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप।
ट्रंप ने अपने सुर नरम जरूर किए हैं लेकिन ग्रीनलैंड पर उन्होंने अपना दावा छोड़ा नहीं है। वह ग्रीनलैंड को उत्तर अमेरिका का हिस्सा मानते हैं और कहते हैं यूएस के अधीन आए बिना यह असुरक्षित है। वह ग्रीनलैंड को अपना इलाका मानकर चल रहे हैं। ट्रंप ने यह भी कहा है कि इस योजना का विरोध करने वालों को वह याद रखेंगे। यह एक तरह से उनकी चेतावनी है।
नया बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहते होंगे ट्रंप
ग्रीनलैंड पर ट्रंप के इस नरम रुख पर एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह स्थायी नहीं है, ट्रंप के स्वभाव को देखते हुए यह कभी भी बदल सकता है। वह दावोस में थे, वहां यूरोप और मीडिया था। पहले से तनावपूर्ण चल रहे माहौल को वह और तल्ख बनाने से बचना चाहते होंगे। इसलिए उन्होंने अपने बयान से कोई नया बखेड़ा खड़ा नहीं किया। यह अलग बात है कि बातों ही बातों में यूक्रेन पीस डील का जिक्र करते हुए उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को 'मूर्ख' कह दिया। इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर यूरोप को भी सुनाया। ट्रंप ने कहा कि यूरोप के कई हिस्सों की हालत ऐसी हो गई है कि उन्हें पहचाना नहीं जा सकता। कई लोग मानते हैं कि ट्रंप उस 'बिगड़ैल बच्चे' की तरह हैं जो अपने से कमजोर बच्चे को डराते और धमकाते हैं लेकिन अपने से तगड़े को देखकर सहम जाते हैं या पीछे हट जाते हैं।
यूरोपीय देशों की एकजुटता से बढ़ा दबाव
यूरोप ने जब एकजुटता दिखाई और जवाबी टैरिफ लगाने की बात कही तो वह कहीं न कहीं सकपका गए। कारोबारी पेशे से जुड़े लोग कहते हैं कि यूरोप का टैरिफ या उसके सामानों पर रोक ट्रंप को बहुत भारी पड़ जाएगा। साल 2024 में यूएस और यूरोप के बीच करीब 1.6 ट्रिलियन पाउंड का व्यापार हुआ। कारोबार के लिहाज से यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। दूसरा, अमेरिका और यूरोप अब तक मिलकर दुनिया को चलाते आए हैं। बहु-ध्रुवीय दुनिया होने से उनके रुतबे, धौंस में तो कमी आई है लेकिन विश्व की ज्यादातर संस्थाओं पर आज भी एक तरह से उनका ही कब्जा है। ट्रंप अपने सबसे करीबी पड़ोसी कनाडा से रिश्ते बिगाड़ चुके हैं।
दावोस में ट्रंप।
एक साथ सभी से दुश्मनी मोल लेना समझदारी नहीं
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो के पकड़ कर ले जाने के बाद कैरिबियाई देश सशंकित हैं। ट्रंप लैटिन अमेरिकी देशों कोलंबिया, मैक्सिको, ब्राजील सहित अन्य देशों को धमका चुके हैं। अब यूरोप के पीछे पड़े हैं। कहने का मतलब है कि आप भले ही सुपरपावर हों लेकिन आप सभी से एक साथ दुश्मनी नहीं मोल ले सकते। आप ऐसा करते हैं तो इस समझदारी नहीं, नासमझी और 'मूर्खता' कहा जाएगा। हो सकता है कि ट्रंप अपने खिलाफ बढ़ते रोष और तल्खी को कुछ समय के लिए शांत करना चाहते हों, हालांकि, उनके बारे में कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। ट्रंप मौजूदा दौर के सबसे 'चंचल' नेता हैं।
