Why stopping war is not easy : ऑस्ट्रेलियाई लेखक जियोफ्रि ब्लेने ने अपनी मशहूर और क्लासिक किताब 'द कॉजेज ऑफ वार' में लिखा है कि हमला हो सकता है, ऐसे 'सपने और गलतफहमी' की आशंका में बीते समय में कई युद्ध लड़े गए। हमला करते समय देशों ने सोचा कि यह जल्दी खत्म हो जाएगा, यह सस्ता होगा और उन्हें एक बड़ी जीत मिल जाएगी लेकिन उनकी यह सोच गलत साबित हुई। मिसाल के तौर पर साल 1792 में ऑस्ट्रिया, हंगरी, प्रशा और फ्रांस सभी लड़ाई के मैदान में पहुंच गए। इन्होंने सोचा कि एक या ज्यादा से ज्यादा दो लड़ाई के बाद वे जीत जाएंगे और युद्ध खत्म हो जाएगा। फ्रांस ने सोचा कि उसकी हालिया क्रांति से प्रभावित होकर कई देश उसके साथ आ जाएंगे जबकि राजशाही वाले देश ये मानकर चले कि उनकी पेशेवर सेना के आगे फ्रांस टिक नहीं पाएगा लेकिन हुआ इसके उल्टा। यह युद्ध खिंचता चला गया, धीरे-धीरे इस संघर्ष में उस समय की ताकतें एक-एक कर युद्ध में शामिल होती चली गईं और दुनिया के ज्यादातर इलाकों में यह युद्ध फैल गया। यह युद्ध करीब 5 सालों तक चला।
युद्ध की शुरुआत करना आसान होता है, खत्म करना मुश्किल।
प्रथम विश्व युद्ध : 'क्रिसमस तक युद्ध खत्म हो जाएगा'
इसी तरह अगस्त 1914 (प्रथम विश्व युद्ध) में यूरोप के देश जर्मनी के साथ युद्ध में कूद पड़े। उन्होंने अपने सैनिकों को बताया कि क्रिसमस आते-आते यह यद्ध खत्म हो जाएगा, और सभी अपने घर लौट जाएंगे लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि सैनिकों के लिए यह क्रिसमस 1914 में नहीं बल्कि 1918 में आएगा। इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने भी कुछ इसी तरह सोचा था। उन्हें लगा था कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान कमजोर पड़ गया है। इराक का हमला इस समय वह झेल नहीं पाएगा और ईरान को वह आसानी से फतह कर लेंगे लेकिन सद्दाम हुसैन की रणनीति गलत साबित हुई। इराक को मुंहतोड़ जवाब देते हुए ईरान इस युद्ध को आठ साल तक लड़ता रहा। इन आठ सालों में दोनों तरफ हजारों की संख्या में लोग मारे गए और दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तहस-नहश हो गई।
'सिक्स डे वार' ने रख दी लंबे संघर्ष की नींव
पिछले दशकों में चलाए गए ऐसे कई सैन्य अभियान जिनके बारे में माना जाता था कि ये युद्ध दो चार दिनों में या कुछ हफ्ते या अधिकतम महीने भर में खत्म हो जाएंगे, वे गलत साबित हुए। युद्ध में उतरना दलदल में उतरने जैसा है, आप इसमें से निकलने के लिए जितना पैर बढ़ाएंगे या उठाएंगे, आप उसमें और धंसते चले जाएंगे। 1967 का 'सिक्स डे वार' भी इसी तरह का है, यह एक सप्ताह से भी कम समय तक चला लेकिन इसने इजरायल और उसके पड़ोसी देशों के बीच राजनीतिक समस्या का अंत नहीं किया बल्कि इसने युद्ध का एक और बड़ा मोर्चा खोल दिया। 1969 में इजिप्ट, जॉर्डन, पैलेस्टाइन लिबरेनशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) और इजरायल के बीच भयंकर युद्ध शुरू हुआ और यह करीब एक साल तक चला। 1973 में जिसे अक्टूबर वार के नाम से जाना जाता है, इसने भी फिलिस्तीन समस्या का अंत नहीं किया बल्कि इस युद्ध ने समस्या को और जटिल और तीव्र बना दिया।
वर्षों तक चलते हैं युद्ध।
अफगानिस्तान में 20 साल तक उलझा रहा US
आगे की अगर बात करें तों 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला होने के बाद अमेरिका, नाटो के साथ अफगानिस्तान में जा धमका। तालिबान के खिलाफ 20 साल तक लड़ता रहा। अमेरिकी हमलों में हजारों की संख्या में अफगानिस्तानी मारे गए और विस्थापित हुए। रिपोर्टों में कहा गया है कि तालिबान के खिलाफ अभियानों में करीब साढ़े तीन हजार सैनिकों की मौत हुई, जबकि 24 सौ के करीब अमेरिकी सैनिक मारे गए और लगभग 20 हजार सैनिक घायल भी हुए। अफगानिस्तान में रहते हुए अमेरिका ने अरबों नहीं, ट्रिलियन डॉलर खर्च किए लेकिन अंत में हुआ क्या, जिस तालिबान के खिलाफ लड़े, 20 साल बाद उसे ही सत्ता सौंपकर चुपके से निकल गए। यही नहीं 2003 में इराक पर हमले और सद्दाम हुसैन के खात्मे से अमेरिका को क्या हासिल हुआ, वेपन ऑफ मॉस डिस्ट्रक्शन नहीं मिला लेकिन सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया। इस लड़ाई में 4 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गए। इराक आज भी अराजकता और मिलिशिया गुटों का शिकार है।
चाल साल से जारी है रूस-यूक्रेन युद्ध
हाल के वर्षों के युद्ध की अगर बात करें तो 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। रूस ने क्या सोचकर यूक्रेन पर हमला किया कि यूक्रेन एक कमजोर देश है, उसकी सैन्य ताकत के आगे वह टिक नहीं पाएगा। दो चार सप्ताह में वह यूक्रेन को जीत लेगा, युद्ध खत्म हो जाएगा लेकिन क्या ऐसा हुआ, बिल्कुल नहीं। चार साल से युद्ध चल रहा है। दोनों तरफ लाखों की संख्या में लोग मारे गए और विस्थापित हुए। यह युद्ध आज भी चल रहा है, कब खत्म होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। बात यह है कि हर युद्ध कभी न कभी खत्म होता है। अभी जो युद्ध और संघर्ष चल रहे हैं, वे भी खत्म होंगे लेकिन युद्ध में जितने पक्ष और हित शामिल होते हैं, युद्ध खत्म कराना उतना ही जटिल और मुश्किल होता है। रूस यूक्रेन, इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध में कई देश और उनके हित शामिल हैं।
युद्ध दलदल जैसे होते हैं।
युद्ध रोक पाना किसी एक के हाथ में नहीं
यूक्रेन पर रूस ने यही सोचकर हमला किया कि वह अकेला है, ज्यादा से ज्यादा तीन चार सप्ताह में वह उसे हरा देगा। लेकिन यूक्रेन के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देश खड़े हो गए और इस युद्ध का दायरा बढ़ गया। ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला यह सोचकर किया कि अयातुल्ला खामनेई सहित पूरा शीर्ष नेतृत्व खत्म होते ही ईरान की जनता सड़कों पर आ जाएगी, विद्रोह कर देगी। इससे रीजीम चेंज हो जाएगा लेकिन अमेरिका-इजरायल ने जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ, ईरान लड़ रहा है। उसने अपने हमलों से पूरे पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में 'आग' लगा दी है। बता यह है कि कोई कितना भी ताकतवर क्यों न हों, एक बार लड़ाई शुरू हो जाने के बाद आप इसे अपने हिसाब से नहीं रुकवा सकते। युद्ध शुरू करना आपके हाथ में है लेकिन इसे रोक पाना आपके हाथ में नहीं है।
युद्ध चालू रखने में 'विक्ट्री डिजीज' की भी भूमिका
जंग की शुरुआत करने के लिए आपको बस अपनी सेना को आदेश देना होता है और सेना हमला कर देती है, कुछ समय बाद आप यदि युद्ध रोकना भी चाहते हैं तो यह सामने वाले पर निर्भर करता है कि वह लड़ाई रोकना चाहता है कि नहीं, इसके लिए यदि वह तैयार नहीं है तो आपको युद्ध जारी रखना पड़ेगा। आप नहीं लड़ेंगे तो हथियार डालने होंगे, सरेंडर करना होगा। कहने का मतलब है कि एक युद्ध में जितनी अधिक पक्ष होंगे, उस युद्ध को खत्म करना उतना ही मुश्किल होता है। कोई भी पक्ष अपने को हारते हुए नहीं दिखना चाहता, हर नुकसान पर वह बदले की कार्रवाई करता है, वार और पलटवार का दौर चलता रहता है। युद्ध चालू रखने में 'विक्ट्री डिजीज' की भी भूमिका होती है। युद्ध या संघर्ष में शुरुआती सफलता पाने वाले देश अक्सर अति-आत्मविश्वास, अहंकार के शिकार हो जाते हैं।
आसान नहीं होता युद्ध खत्म करना।
युद्ध को लंबा खींचते हैं भरोसे की कमी और नफरत
दुश्मन को कमजोर समझने और वास्तविकताओं को नजरंदाज करने की उनकी चूक युद्ध को और लंबा करती जाती है। युद्ध के न रुकने की एक बड़ी वजह भरोसे की कमी और एक-दूसरे के खिलाफ नफरत भी है। युद्ध में उलझे देश एक दूसरे पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाते, नफरत की भावना अविश्वास की खाई को और चौड़ी करती जाती है। किसी सीजफायर या शांति समझौते पर पहुंचने को लेकर उनमें मन में आशंका रहती है। यही नहीं, युद्धरत देश अपने लोगों और दुनिया के सामने खुद को हारा हुआ नहीं दिखाना चाहते। देश की जनता यदि युद्ध जारी रखना चाहती है तो सरकारों के लिए इसे रोकना और भी चुनौतीपूर्ण एवं मुश्किल होता है। कई बार दोनों पक्ष एक-दूसरे को अपने लिए 'अस्तित्व के खतरे' के रूप में देखते हैं। वे मानकर चलते हैं कि दुश्मन देश रहा तो एक दिन उनका वजूद मिट जाएगा।
