यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और रणनीतिक बुनियादी ढांचों पर किए जा रहे हमलों के बाद मध्य पूर्व फिर सुलग उठा है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने रक्षा समझौतों, जिसे रणनीतिक रूप से 'मक्का पैक्ट' की तर्ज पर देखा जाता है, उसके बावजूद पाकिस्तान इस संघर्ष में सैन्य रूप से कूदने से बच रहा है। तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने हाल ही में समझौता किया है जिसके तहत किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। इसे लेकर पाकिस्तान ने लंबे-चौड़े बयान दिए थे, लेकिन अब जब उसकी अग्निपरीक्षा आया, पाकिस्तान ने रुख साफ नहीं किया है। आखिर ऐसी क्या वजहें हैं कि सऊदी का सबसे पुराना सैन्य साझेदार होने और नया रक्षा समझौता करने के बाद भी पाकिस्तान केवल बयानबाजी तक सीमित है? क्यों नहीं उसने अब तक हूती विद्रोहियों को लेकर सख्त रुख दिखाया है?
क्या है पाकिस्तान और सऊदी का रक्षा समझौत?
1982 के द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान की सेना दशकों से सऊदी अरब की प्रादेशिक अखंडता और पवित्र स्थलों (मक्का और मदीना) की सुरक्षा के लिए वहां तैनात रही है। इस नए पैक्ट का मुख्य आधार यह है कि सऊदी अरब की संप्रभुता पर कोई भी सीधा खतरा पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा। हाल के वर्षों में तुर्की-सऊदी-पाक त्रिकोणीय सुरक्षा वार्ता से भी इस गठबंधन को मजबूत करने की कोशिश हुई थी।
'मक्का पैक्ट' के बावजूद क्यों खामोश है पाकिस्तान? सऊदी अरब के लगातार दबाव के बाद भी पाकिस्तान का यमन या हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध मैदान में न उतरने के पीछे 4 सबसे बड़े कारण हैं।
ईरान के साथ 900 किमी लंबी सीमा का डर
हूती विद्रोहियों को सीधा समर्थन और हथियार ईरान से मिलते हैं। पाकिस्तान और ईरान आपस में लगभग 900 किलोमीटर लंबी (बलूचिस्तान) सीमा साझा करते हैं। अगर पाकिस्तान यमन में हूतियों पर हमला करता है, तो ईरान इसे सीधे अपने खिलाफ एक 'एक्ट ऑफ वॉर' मानेगा। पाकिस्तान अपनी पश्चिमी सीमा पर भारत और अफगानिस्तान (तालिबान) के बाद ईरान के रूप में तीसरा सक्रिय मोर्चा खोलने का जोखिम किसी कीमत पर नहीं ले सकता।
संसद का सर्वसम्मत फैसला (2015 का प्रस्ताव)
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने दूरी बनाई है। 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य गठबंधन बनाया था, तब पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर यमन युद्ध में तटस्थ रहने का फैसला किया था। पाकिस्तानी सेना आज भी उसी संसदीय नीति के तहत बंधी हुई है।
देश के अंदर शिया-सुन्नी हिंसा का बड़ा खतरा
पाकिस्तान में लगभग 15% से 20% आबादी शिया मुसलमानों की है। यमन युद्ध पूरी तरह से शिया (हूती) बनाम सुन्नी (सऊदी सत्ता) का रूप ले चुका है। अगर पाकिस्तानी सेना सुन्नी ब्लॉक का साथ देकर हूतियों पर हमला करती है, तो पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
घर में टीटीपी (TTP) और चरमराता बजट
आंतरिक सुरक्षा संकट: पाकिस्तानी सेना इस वक्त अपने ही देश में 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के रोजमर्रा के आतंकी हमलों से पस्त है। उसकी अपनी सेना और संसाधन देश के भीतर ही फंसे हुए हैं। इसके अलावा पाकिस्तान भयंकर आर्थिक कंगाली और आईएमएफ (IMF) के कर्जों पर चल रहा है। किसी भी विदेशी युद्ध में शामिल होने का वित्तीय बोझ झेलने की स्थिति में इस्लामाबाद नहीं है।
क्या है पाकिस्तान का रुख?
सऊदी अरब को नाराज भी नहीं करना है और युद्ध में भी नहीं उतरना है—इसके लिए पाकिस्तान 'कैलकुलेटेड न्यूट्रैलिटी' यानी सधे हुए संतुलन का रास्ता अपना रहा है। पाकिस्तान ने अपनी सेना की टुकड़ियों को सऊदी अरब के अंदर केवल रक्षात्मक और ट्रेनिंग भूमिका में रखा है। उन्हें यमन सीमा पर जाकर हमला करने की सख्त मनाही है। जब भी हूती हमला होता है, पाकिस्तान विदेश मंत्रालय एक औपचारिक बयान जारी कर हमले की निंदा करता है और सऊदी की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराता है, लेकिन व्यावहारिक कदम उठाने से साफ पीछे हट जाता है। ऐसा ही बयान आसिफ ख्वाजा ने भी दिया है और कहा है कि वह सऊदी के साथ मजबूती से खड़ा है।
पाकिस्तान की मजबूरी
'मक्का पैक्ट' और मुस्लिम बिरादरी के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, पाकिस्तान इस समय अपनी इतिहास की सबसे कमजोर स्थिति में है। ईरान का खौफ, देश के भीतर शिया-सुन्नी हिंसा की आशंका और आर्थिक बदहाली ने पाकिस्तान के पर कतर दिए हैं। सऊदी अरब से मिलने वाली अरबों डॉलर की वित्तीय मदद और रियायती तेल के बदले पाकिस्तान उसे सैन्य सुरक्षा का भरोसा तो देता है, लेकिन ईरान से दुश्मनी और अपने देश के भीतर गृहयुद्ध के खौफ की वजह से वह हूती हमलों पर चुप रहने और दूर से तमाशा देखने को मजबूर है।
बड़े-बड़े दावों की पोल खुली
'मक्का पैक्ट' और मुस्लिम बिरादरी के बड़े-बड़े दावों की पोल अब खुलकर सामने आ चुकी है। हकीकत यह है कि पाकिस्तान केवल तभी तक एक मजबूत सैन्य सहयोगी दिखता है जब तक उसे सऊदी से रियाल, डिफर्ड पेमेंट पर सस्ता क्रूड ऑयल और वित्तीय पैकेज मिलते रहें। जैसे ही जमीन पर अपनी फौज उतारने या ईरान से सीधे पंगा लेने की नौबत आती है, पाकिस्तान अपने हाथ खड़े कर देता है। आंतरिक गृहयुद्ध का डर, जर्जर आर्थिक हालत और तीन-तीन मोर्चों पर दुश्मनी का खौफ पाकिस्तान के कदम रोक देता है और इसे वह अपनी कोरी बयानबाजी से ढांपता है। सऊदी अरब भी अब इस कड़वी सच्चाई को भांप चुका है। यही वजह है कि रियाद अब अपनी सुरक्षा के लिए केवल पाकिस्तान के भरोसे रहने के बजाय खुद को अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे अमरीकी THAAD और पैट्रियट) से लैस कर रहा है और चीन-तुर्की जैसे नए विकल्पों की तलाश में है।