Times Now Navbharat
live-tv
Premium

पाकिस्तान के 15 टुकड़े क्यों करना चाहते हैं आसिम मुनीर? सुशासन का बहाना या सत्ता पर कब्जा, जानिए क्या है उनका प्लान

पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर देश के 4 प्रांतों को तोड़कर 12-15 नए सूबे बनाना चाहते हैं। जानिए सुशासन के नाम पर सत्ता मजबूत करने का ये खेल क्या है, किन फायदों की ओर ताकते हुए ये फैसला लिया गया है और इसमें क्या चुनौतियां हैं।

Image
4 सूबे तोड़कर 15 नए प्रांत बनाने की मंशा (AI Image)
Authored by: निशांत तिवारी
Updated Oct 10, 2026, 16:06 IST
Follow on Google News

साम्यवाद के पिता कार्ल मार्क्स से जोड़कर एक बहुत प्रसिद्ध कथन है, "इतिहास खुद को दोहराता है, "पहले एक त्रासदी के रूप में, और फिर एक मजाक के रूप में। इस कथन का इस्तेमाल जब भी होता है, तो इसमें ये बात निहित होती है कि व्यक्ति ऐतिहासिक घटनाओं से शायद ही कभी सीखता है। जब गलती पहली बार दोहराई जाती है, तो यह एक त्रासदी होती है, एक दुखद याद दिलाती है कि अगली बार सीखकर बेहतर करने की उम्मीद अभी बाकी है। हालांकि, जब यह दूसरी बार दोहराई जाती है, तो यह त्रासदी और दुर्भाग्यपूर्ण होने के बजाय और भी मजाकिया हो जाती है।

दशकों पहले भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ अब वही इतिहास खुद को दोहराता दिख रहा है, लेकिन इस बार पाकिस्तान को भीतर से ही विभाजित करने की योजना किसी बाहरी ताकत की नहीं, बल्कि खुद वहां के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की है।

पाकिस्तान का नक्शा बदलने की कवायद

ब्रिटिश मैगजीन 'द इकोनॉमिस्ट' (The Economist) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, आसिम मुनीर पाकिस्तान के मौजूदा चार प्रांतों, पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान को विभाजित करके कम से कम 12 से 15 नए सूबे या फिर 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने का खाका तैयार कर रहे हैं। अब आधिकारिक तौर पर इसके पीछे 'प्रशासनिक सुधार और सुशासन' की दलील दी जा रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस योजना के पीछे असली मकसद देश के राजनीतिक संतुलन को बिगाड़कर सैन्य मुख्यालय (GHQ रावलपिंडी) और आसिम मुनीर के हाथों में सत्ता की डोर को पूरी तरह से मजबूत करना है।

कागज पर क्या है मुनीर का तर्क?

कागजी तौर पर पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन के पक्ष में कई मजबूत तर्क हैं। इसमें पहला कारण है, पंजाब का विशाल आकार। पाकिस्तान के अकेले पंजाब प्रांत की आबादी 12.8 करोड़ से अधिक है, जो देश की कुल आबादी के आधे से भी ज्यादा है। वहीं दूसरी तरफ, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन वहां की आबादी महज 1.5 करोड़ है। पंजाब के ग्रामीण इलाकों में एक चौथाई से भी कम लोगों के पास पीने का साफ पानी उपलब्ध है। छोटे-मोटे सरकारी काम के लिए लोगों को घंटों सफर करना पड़ता है। आसिम मुनीर और उनकी समर्थित सरकार का कहना है कि अत्यधिक केंद्रीकृत और विशाल सूबों के कारण जनता तक स्वास्थ्य, शिक्षा और पीने का पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं और इसी वजह से देश का आर्थिक ढांचा ढह रहा है।

'नक्शा बदलने' के पीछे का असली खेल

हालांकि, सुशासन का तर्क केवल एक मुखौटा नजर आता है। इस विभाजन के पीछे आसिम मुनीर के तीन मुख्य छिपे हुए मकसद माने जा रहे हैं:

1. बड़े राजनीतिक दलों के वर्चस्व को खत्म करना

पाकिस्तान के चारों प्रांत लंबे समय से वहां की राजनीतिक पार्टियों के मजबूत गढ़ रहे हैं। पंजाब पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का पारिवारिक किला रहा है। कमोबेश यही हाल सिंध का है, सिंध पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का इलाका माना जाता है। वहीं, खैबर पख्तूनख्वा इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का सबसे मजबूत गढ़ है। यदि ये बड़े सूबे टूटकर 12-15 टुकड़ों में बंट जाते हैं, तो इन राजनीतिक दलों की जनधार और प्रभाव कमजोर हो जाएंगे। छोटे-छोटे राज्यों में बंटी राजनीति को नियंत्रित करना सैन्य प्रतिष्ठान के लिए बेहद आसान हो जाएगा।

2. केंद्र और फौज के हाथों में वित्तीय शक्ति समेटना

मौजूदा 18वें संविधान संशोधन के बाद राज्यों को अधिक वित्तीय अधिकार मिले हुए हैं। छोटे राज्य बनने से उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होगी और वे वित्तीय बजट और अनुदान के लिए पूरी तरह से इस्लामाबाद (केंद्र) और रावलपिंडी (फौज) के मोहताज हो जाएंगे।

3. सिविल सरकार के समानांतर सत्ता कायम करना

सैन्य तानाशाही के दौर में भी पंजाब और सिंध जैसी राज्य सरकारों ने केंद्र की तानाशाही के खिलाफ एक संतुलनकारी ताकत का काम किया था। प्रांतीय स्वायत्तता खत्म होने से फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के पास आसिम शक्तियां केंद्रित हो जाएंगी।

खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान के समर्थन में प्रदर्शन

खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान के समर्थन में प्रदर्शन

मुनीर के रास्ते की 3 सबसे बड़ी चुनौतियां

आसिम मुनीर की इस योजना को धरातल पर उतारना आसान नहीं होगा। उनके सामने तीन सबसे बड़ी बाधाएं खड़ी हैं।

संवैधानिक अड़चन: पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 239(4) के तहत किसी भी राज्य की सीमा बदलने के लिए उस राज्य की विधानसभा से दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास कराना अनिवार्य है। इसके बाद संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। सिंध और खैबर पख्तूनख्वा की असेंबली का ऐसा प्रस्ताव पास करना मुश्किल लग रहा है।

जातीय और क्षेत्रीय हिंसा का खतरा: सिंध में प्रांतीय सीमाओं से छेड़छाड़ को सिंधी भाषा और संस्कृति पर हमला माना जाता है। बलूचिस्तान पहले से ही अलगाववादी हिंसा की आग में जल रहा है। सीमाएं बदलने से जातीय दंगे भड़कने की पूरी आशंका है।

इमरान खान का बढ़ता विरोध: खैबर पख्तूनख्वा में इमरान खान के समर्थक लगातार सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में मुनीर के इस फैसले से देश में गृहयुद्ध जैसे हालात बन सकते हैं।

क्या 'मजाहिया तौर पर' दोहराया जाएगा इतिहास

कराची और लाहौर के आम नागरिकों का एक वर्ग भले ही यह मानता हो कि छोटे राज्य बनने से प्रशासनिक काम आसान होंगे और भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, लेकिन पाकिस्तान के वर्तमान आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के बीच यह फैसला एक बड़ा विस्फोट साबित हो सकता है। देखना होगा कि आसिम मुनीर इस बंटवारे के दांव से पाकिस्तान पर अपना एकछत्र राज कायम कर पाते हैं या फिर यह फैसला पाकिस्तान को पूरी तरह अराजकता की खाई में धकेल देता है और वास्तव में मार्क्स वाला कथन फिर सही साबित होगा।

End of Article