पाकिस्तान और चीन द्वारा हाल ही में 'पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग' (Pakistan-China Boundary Joint Commission) को औपचारिक रूप से सक्रिय करने की घोषणा ने दक्षिण एशिया के कूटनीतिक माहौल में नया उबाल ला दिया है। इस कदम पर भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ा एतराज जताते हुए साफ कर दिया है कि इस तथाकथित आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि भारत पाकिस्तान और चीन के बीच किसी भी साझा सीमा को मान्यता नहीं देता। यह मुद्दा सिर्फ नक्शों की लड़ाई नहीं है, बल्कि भारत के लिए त्रि-आयामी रणनीतिक और सुरक्षा चुनौती है। आइए गहराई से समझते हैं कि शक्सगाम घाटी से लेकर CPEC और लद्दाख की सुरक्षा तक यह घटनाक्रम भारत के लिए इतना संवेदनशील क्यों है।
1963 का गैर-कानूनी 'पाकिस्तान-चीन सीमा समझौता'
इस पूरे विवाद का इतिहास 2 मार्च 1963 से जुड़ा हुआ है। तब पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन को दे दी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के तुरंत बाद, पाकिस्तान ने अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK/गिलगित-बाल्टिस्तान) की शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) का लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर इलाका गैर-कानूनी तरीके से चीन को सौंप दिया था।
क्या है भारत का रुख?
भारत इस पूरे क्षेत्र को लद्दाख और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत का अभिन्न अंग मानता है। भारत का स्पष्ट रुख है कि पाकिस्तान को भारतीय भूभाग पर कोई भी संधि या समझौता करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। 1963 के समझौते के आर्टिकल 6 में स्पष्ट लिखा था कि जब कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा के लिए सुलझ जाएगा, तब संप्रभु देश चीन के साथ सीमाओं पर फिर से बातचीत करेगा। लेकिन पाकिस्तान और चीन अब इसे स्थायी सीमा मानकर द्विपक्षीय प्रबंधन ढांचा तैयार कर रहे हैं।
CPEC और अवैध इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) चीन की महत्वाकांक्षी योजना 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। PoK से गुजरने पर भारत आपत्ति जताता रहा है। CPEC का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान (PoK) से होकर गुजरता है। भारत शुरुआत से ही संप्रभुता के उल्लंघन के कारण इसका विरोध करता आ रहा है। नए संयुक्त सीमा आयोग की आड़ में चीन और पाकिस्तान CPEC के तहत बन रहे सड़कों, सुरंगों, फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को संस्थागत रूप दे रहे हैं। इससे इस क्षेत्र में चीनी मौजूदगी और निर्माण कार्यों को स्थायी वैधता देने की कोशिश की जा रही है।
शक्सगाम घाटी का सैन्य महत्व: सियाचिन पर खतरा
शक्सगाम घाटी का भूगोल भारत के सैन्य संतुलन के लिहाज से बेहद खतरनाक मोड़ पर स्थित है। सियाचिन ग्लेशियर के ठीक उत्तर में शक्सगाम घाटी विश्व के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर और दौलत बेग ओल्डी के ठीक उत्तर में स्थित है। अगर चीन शक्सगाम घाटी में सैन्य बुनियादी ढांचे (जैसे ऑल-वेदर सड़कें और एयरस्ट्रिप) का निर्माण करता है, तो वह पूर्व में अक्साई चिन और पश्चिम में गिलगित-बाल्टिस्तान में अपनी स्थिति को सीधे जोड़ सकता है। इससे भारतीय सेना के लिए उत्तर-पूर्वी लद्दाख और सियाचिन में दोहरे मोर्चे से सीधी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
भारत के लिए 'टू-फ्रंट थ्रेट' और Geo Political संदेश
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीन द्वारा इस आयोग को चालू करने का समय और उद्देश्य पूरी तरह रणनीतिक है। 2019 में अनुच्छेद 370 के हटने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद, चीन और पाकिस्तान भारत के बढ़ते कानूनी नियंत्रण को चुनौती देने के लिए एक साथ लामबंद हो रहे हैं। जब भारत अपनी पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान) और पूर्वी/उत्तरी सीमा (चीन एलएसी) पर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में इस्लामाबाद और बीजिंग का यह सीमा तंत्र भारत को यह संदेश देना चाहता है कि चीन कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तानी नजरिए से ही देखता रहेगा।
भारत का सख्त जवाब और चुनौतियां
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में दोहराया है कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को वैध बनाने का कोई भी प्रयास भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकता। भारत ने मांग की है कि पाकिस्तान उसके अवैध कब्जे वाले इलाकों को तुरंत खाली करे। बहरहाल, यह नया कदम साबित करता है कि सीमा विवाद सुलझाने की राजनयिक बातचीत के बावजूद चीन अपनी विस्तारवादी रणनीति और पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के घेराव की नीति पर मजबूती से काम कर रहा है। भारत के लिए यह बेहद चिंताजनक है और उसे सावधानी से अपनी रणनीति बनानी होगी।