Rajendra Chola I empire: तमिलनाडु के गंगईकोंडा चोलपुरम में चोल सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती के उपलक्ष्य में रविवार को आदि तिरुवथिरई उत्सव का आयोजन किया गया। यह समारोह राजेंद्र चोल-प्रथम की समुद्री विजय यात्रा के 1,000 वर्ष पूरे होने और मंदिर स्थापना की स्मृति में मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अवसर पर शामिल हुए, उन्होंने रोड शो किया और उनके सम्मान में एक विशेष स्मृति सिक्का भी जारी किया। चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के पुत्र राजेंद्र चोल-प्रथम की गिनती दक्षिण भारत के चोल वंश के महान सम्राट के रूप में होती है। इन्होंने लगभग 1014 से 1044 ईस्वी तक शासन किया। इन्हें चोल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली और विजयी शासकों में गिना जाता है। इन्होंने अपने पिता की विजय परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चोल साम्राज्य को उसके चरम पर पहुंचाया।
दक्षिण पूर्व एशिया तक फैला था चोल साम्राज्य। तस्वीर-AI
'चोल द ग्रेट': दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलाया भारत का प्रभाव
राजेंद्र चोल प्रथम को 'चोल द ग्रेट' कहा जाता है, जिन्होंने मध्यकालीन प्रारंभिक काल में दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों को विजय किया। उनके शासनकाल में भारतीय संस्कृति ने समुद्र पार कर दूर-दराज के दक्षिण-पूर्व एशियाई तटों तक पहुंच बनाई। उन्होंने आज के इंडोनेशिया, म्यांमार, वियतनाम, श्रीलंका, मालदीव, थाईलैंड, सिंगापुर, कंबोडिया और निकोबार द्वीपों के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। चोल साम्राज्य अपने चरम पर एक विशाल समुद्री शक्ति बन गया था।
इन देशों पर था चोल साम्राज्य का राज
- इंडोनेशिया
- म्यांमार
- वियतनाम
- श्रीलंका
- मालदीव
- थाईलैंड
- सिंगापुर
- कंबोडिया
- निकोबार द्वीप
अरब और अफ्रीकी क्षेत्रों से व्यापारिक संबंध बनाए
राजेंद्र चोल ने चोल साम्राज्य की सीमाओं को अलेक्जेंडर महान और रोमन साम्राज्य जैसे शासकों की तरह अपने देश की चौहद्दी को सॉन्ग राजवंश के चीन तक बढ़ाया। यह कंबोडिया के खमेर साम्राज्य (जिसने अंगकोर वाट जैसे विशाल हिंदू मंदिर बनाए) से उनके संबंधों के माध्यम से संभव हुआ। राजेंद्र चोल की श्रीविजय (आज का इंडोनेशिया) पर प्रसिद्ध समुद्री विजय ने चोल साम्राज्य के राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव को सुदूर पूर्व तक पहुंचा दिया। उन्होंने अरब और अफ्रीकी क्षेत्रों से भी व्यापारिक संबंध बनाए और एक व्यापक वाणिज्यिक नेटवर्क स्थापित किया।
तंजावुर में भव्य बृहदीश्वर मंदिर बनवाया
चोल सिर्फ योद्धा या प्रशासक ही नहीं, बल्कि महान निर्माता भी थे। उनके पिता, राजा राजराजा चोल प्रथम ने 1010 ईस्वी में तंजावुर में भव्य बृहदीश्वर मंदिर बनवाया, जो उस समय का सबसे समृद्ध और प्रभावशाली धार्मिक स्थल था। यह मंदिर प्रशासन और सामाजिक कल्याण गतिविधियों का भी केंद्र था। इतिहासकार एस.आर. बालासुब्रह्मण्यम के अनुसार, राजराजा ने 38,000 से अधिक स्वर्ण मुद्राएं मंदिर को दान कीं जो उस समय के कई यूरोपीय राजदरबारों से अधिक था। उनके द्वारा प्राप्त किए गए रत्नों और चांदी समेत कुल दान लगभग 95,500 स्वर्ण मुद्राओं तक पहुंच गया।
चोलों का उदय
भारतीय इतिहास में दक्षिण भारत की दो चोल वंशों का वर्णन मिलता है, एक प्राचीन काल में (दूसरी-तीसरी सदी ईसा पूर्व) और दूसरा, साम्राज्यवादी चोल, जिनमें राजेंद्र प्रथम आते हैं। बाद के चोलों की स्थापना विजयालय चोल ने की थी, जिन्होंने 848 ईस्वी में तंजावुर को मुथरैयरों से छीनकर नई राजधानी बनाई। आदित्य प्रथम के नेतृत्व में चोलों ने पल्लवों के साथ मिलकर पांड्यों को हराया और कन्नड़ क्षेत्र में भी विस्तार किया। बाद में उन्होंने राष्ट्रकूटों जैसे शक्तिशाली उत्तर भारतीय राजवंशों से भी संघर्ष किया। राजराजा चोल प्रथम के शासन में शिव के नटराज स्वरूप की प्रतिष्ठा को विशेष मान्यता मिली। यह स्वरूप तमिल भक्ति आंदोलन की देन था, जिसे चोल राजाओं ने राजकीय आदर्श के रूप में अपनाया।
चोल दरबार की भव्यता का उल्लेख
इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल के अनुसार, चोलों ने अपने पूर्व अधिपति पल्लवों को पराजित कर दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया। पूर्वी समुद्र तट के लिए प्रयुक्त तमिल शब्द 'कोरोमंडल' दरअसल चोलमंडल का परिवर्तित रूप है, जिसका अर्थ है चोलों का राज्यवृत्त। एक 11वीं सदी के चीनी प्रशासक ने चोल दरबार की भव्यता का उल्लेख करते हुए लिखा-'चोल सम्राट का मुकुट चमकीले मोतियों और दुर्लभ रत्नों से सजा है। उसके पास 60,000 युद्ध हाथी हैं और 10,000 से अधिक दासियां हैं, जिनमें से 3,000 रोज दरबार में सेवा करती हैं।' यह वर्णन चोलों की समृद्धि, सैन्य ताकत और प्रशासनिक दक्षता का साक्ष्य है।
राजेंद्र चोल प्रथम का दिग्विजय और समुद्री साम्राज्य
राजेंद्र प्रथम ने 1012 में युवराज के रूप में नामांकन के बाद 1014 में सिंहासन सँभाला। उन्होंने श्रीलंका पर पूर्ण विजय पाकर राजा महिंद 5 को बंदी बनाया और सम्पूर्ण द्वीप पर चोल अधिकार स्थापित किया। उन्होंने पश्चिमी चालुक्य, अनुराधापुर के राजा और पांड्य-चेर राजाओं से विद्रोह कुचलते हुए दक्षिण भारत में स्थायित्व लाया। फिर उन्होंने कलिंग और वेंगी को जीतकर गंगा नदी तक अपना साम्राज्य फैला दिया। इसके बाद उन्हें 'गंगाईकोंडा चोल' की उपाधि मिली और उन्होंने गंगाईकोंडाचोलपुरम नामक राजधानी बसाई। राजेंद्र ने लक्षद्वीप और मालदीव जैसे द्वीपों पर भी अधिकार कर लिया, जो अरब और अफ्रीका से जुड़े समुद्री व्यापार मार्गों पर स्थित थे। राजेंद्र ने श्रीविजय (इंडोनेशिया-सुमात्रा), खमेर साम्राज्य (कंबोडिया) और अन्य हिंदू साम्राज्यों के साथ गठबंधन किया। उन्होंने केदार, ताम्बरालिंगा और पेकू (बर्मा) को जीतकर चोल प्रभाव को दक्षिण-पूर्व एशिया में गहरा कर दिया। उन्होंने सुमात्रा की राजधानी कदराम, मलय प्रायद्वीप की मलैयूर और पन्नई को लूटा।
व्यापारियों के लिए एक समृद्ध नेटवर्क खोला
इस अभियान ने न केवल सैन्य विजय दिलाई बल्कि तमिल व्यापारियों के लिए एक समृद्ध नेटवर्क खोला। मणिग्रामम, अय्यवोल और ऐन्नूर्रुवर जैसे व्यापार संघ इन विदेशी बंदरगाहों तक पहुंच गए। अगली सदी तक इन इलाकों का व्यापार तमिल व्यापारियों के नियंत्रण में रहा। कुछ क्षेत्रों में चोल वंश की शाखाएं 16वीं सदी तक शासन करती रहीं। इस काल में तमिल मंदिर चीन के तटों और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न हिस्सों में उभरने लगे। तमिल शिलालेख, व्यापारिक वस्तुएं और सांस्कृतिक प्रतीक वहां पाए गए हैं। आज भी सुमात्रा की कारो जनजाति की भाषा में दर्जनों तमिल शब्द पाए जाते हैं जो चोल साम्राज्य के स्थायी प्रभाव का प्रमाण हैं। राजेंद्र चोल प्रथम का भूमि और समुद्र पर प्रभुत्व उन्हें ‘महान’ बनाता है। उनके समुद्री अभियानों ने दक्षिण भारत को सुदूर पूर्व से जोड़ते हुए व्यापार, संस्कृति और साम्राज्य विस्तार की अमिट कहानी रच दी।
