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Explainer: वांगचुक के फैसले ने बदला खेल! सरकार, विपक्ष और छात्रों पर क्या होगा असर? अनशन के बाद क्या

कुल मिलाकर सरकार और सीजेपी के बीच एक सुलह का रास्ता खुला है लेकिन अभी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार और सीजेपी का रुख आंदोलन की दिशा तय करेगा। सरकार और सीजेपी के अलावा इस पूरे मामले पर विपक्ष का क्या रुख रहता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

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सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया है। तस्वीर-AI
Written by: Alok Rao
Updated Jul 24, 2026, 08:52 IST
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Sonam Wangchuk News: सरकार के साथ कई दौर की बातचीत के बाद एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने गुरुवार आधी रात के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया। गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा एवं जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में अपना अनशन समाप्त किया। वांगचुक द्वारा अपना अनशन समाप्त किया जाना सरकार के लिए एक बहुत बड़ी राहत है क्योंकि जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जारी प्रदर्शन की सबसे बड़ी धुरी सोनम वांगचुक हैं। अब सरकार और सीजेपी के प्रतिनिधियों के बीच दिल्ली में वार्ता होनी है जिनमें अन्य मांगों पर विचार किया जाएगा। बहरहाल, आंदोलन खत्म कराने की दिशा में सरकार को एक बड़ी सफलता मिली है। वांगचुक का अनशन खत्म कराने का उस पर भारी दबाव था। सरकार पर से यह दबाव फिलहाल हट गया है। वांगचुक के अनशन तोड़ने का असर सीजेपी के प्रदर्शन, सरकार और विपक्ष की रणनीति पर पड़ेगा लेकिन इस पूरे मामले में अभी भी सबसे बड़ा सवाल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का बना हुआ है। प्रधान के इस्तीफे पर बात कैसे आगे बढ़ती है, इस पर अब सभी की नजरें लगी हैं।

छात्र, सरकार और विपक्ष तीनों के लिए परीक्षा की घड़ी

सीजेपी की सबसे बड़ी मांग यही है। वह प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी हुई है। अभी कुल मिलाकर सरकार और सीजेपी के बीच एक सुलह का रास्ता खुला है लेकिन अभी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार और सीजेपी का रुख आंदोलन की दिशा तय करेगा। सरकार और सीजेपी के अलावा इस पूरे मामले पर विपक्ष का क्या रुख रहता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है। नीट पेपर लीक सहित शिक्षा में सुधार को लेकर सरकार संसद में चर्चा कराने के लिए तैयार है। वह विपक्ष के सामने चर्चा का प्रस्ताव भी रुख चुकी है लेकिन कांग्रेस ने चर्चा से पहले प्रधान के इस्तीफे की शर्त रख दी है। संसद का गतिरोध तोड़ना भी सरकार के लिए जरूरी है क्योंकि मानसून सत्र के शुरू हुए पांच दिन हो गए हैं लेकिन कोई विधायी कामकाज नहीं हो पाया है। प्रधान के इस्तीफ की मांग पर संसद की कार्यवाही भेंट चढ़ती गई है। संसद में बने इस गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार कौन सी रणनीति अपनाने जा रही है, यह देखना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मानसून सत्र में सरकार कई अहम बिल पेश करने की तैयारी में है।

सरकार ने अपनी संवेदनशीलता का दिया संदेश

CJP का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बीते 28 जून से चल रहा था। अनशन खत्म होने से पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों के 65 सांसदों ने वांगचुक से मिलकर या पत्र लिखकर अनशन तोड़ने की अपील की थी। सरकार के लिए यह घटनाक्रम राहत की तरह है। वांगचुक की तबीयत और बिगड़ती तो सरकार पर दबाव कई गुना बढ़ सकता था। नड्डा और जितेंद्र सिंह का खुद अस्पताल जाकर मुलाकात करना और सार्वजनिक रूप से जूस पिलाना — यह एक प्रतीकात्मक कदम है जिससे सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह संवेदनशील है और बातचीत के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट कर वांगचुक से डॉक्टरों की सलाह मानने की अपील करना भी इसी छवि का हिस्सा है।

Sonam wangchuk

Sonam wangchuk

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि 'मैं सोनम जी से आग्रह करता हूं की वो डॉक्टरों की सलाह के अनुसार अपनी दिनचर्या अपनाएं। साथ ही, मोदी ने कैबिनेट बैठक में पेपर लीक मुद्दे पर सख्त फैसले लेने की बात कही है। पीएम ने कहा है कि शुक्रवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में पेपर लीक के मुद्दे को लेकर कड़े निर्णय लिए जाएंगे। फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन पहले ही हो चुका है। अपने इन फैसलों के जरिए सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह प्रदर्शनकारियों की मांगों को सुन रही है।

सरकार के लिए अभी अस्थायी राहत

हालांकि, यह राहत अस्थायी भी हो सकती है। वांगचुक ने खुद स्पष्ट कर दिया कि उनका आंदोलन खत्म नहीं हुआ है और मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रहेगा। यानी सरकार को अभी ठोस कार्रवाई दिखानी होगी, वरना यह राहत जल्द खत्म हो सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक अनशन खत्म करने की घोषणा से पहले वांगचुक ने सरकार से 'स्पष्ट और बिना किसी शर्त के आश्वासन' की मांग रखी थी। वांगचुक ने सरकार से स्पष्ट और बिना किसी शर्त के आश्वासन मांगा, जिसमें पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए राहत जैसी मांगें शामिल थीं। बातचीत के दौरान सरकार ने कुछ मांगों पर सकारात्मक विचार का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान सरकार की ओर से उनकी कुछ मांगों पर सकारात्मक विचार करने का भरोसा दिया गया है। यानी यह अनशन का अंत भरोसे पर हुआ है, ठोस लिखित समझौते पर नहीं जो आगे राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन सकता है।

आगे भी इस मुद्दे को आगे ले जाने की कोशिश करेगा विपक्ष

विपक्ष के लिए यह मुद्दा ठंडा नहीं पड़ेगा। विपक्ष के राजनीतिक स्वार्थों को देखते हुए इस बात की उम्मीद कम है कि वह इस मुद्दे को इतनी आसानी से जाने देगा। सरकार पर हमला करने और उसे कठघरे में खड़ा करने के लिए छात्रों का यह प्रदर्शन उसके लिए एक बड़ा आधार बना है। विपक्ष इस मसले को ज्यादा से ज्यादा जिंदा रखने और उसे आगे ले जाने की कोशिश करेगा। पेपर लीक जैसे मुद्दे छात्रों और मध्यवर्गीय परिवारों को सीधे प्रभावित करते हैं, और यह विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का एक स्थायी हथियार बना रहेगा। 65 सांसदों का सर्वदलीय समर्थन दिखाता है कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रहा है। यह एक तरह से विपक्ष के लिए भी संकेत है कि छात्र-हितों की राजनीति व्यापक जनसमर्थन जुटा सकती है। अगर सरकार अपने आश्वासनों पर अमल नहीं करती, तो विपक्ष इसे आने वाले सत्रों और चुनावी भाषणों में बड़ा मुद्दा बना सकता है।

CJP protest

CJP protest

सरकार पर कम हुआ छात्रों के प्रदर्शन का दबाव

छात्र आंदोलन के लिए यह क्षण मिला-जुला है। एक तरफ, वांगचुक जैसे बड़े चेहरे का समर्थन मिलने से इस आंदोलन को एक विश्वसनीयता और नौतिक आधार मिला। इस आंदोलन की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखी-समझी गई। देश भर में छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं। यह वांगचुक के अनशन का दबाव ही है कि सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। दूसरी तरफ, वांगचुक का अनशन खत्म होने से आंदोलन की सबसे तीव्र और प्रतीकात्मक कड़ी हट गई है, जिससे आगे दबाव बनाए रखना कठिन हो सकता है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्र अब भी डटे हैं, और असली परीक्षा यही होगी कि सरकार अपने मौखिक भरोसे को नीतिगत कार्रवाई में बदलती है या नहीं।

बीच का कोई रास्ता निकालना चाहेगी सरकार

कुल मिलाकर, इस घटनाक्रम से सबसे तात्कालिक राहत सरकार को मिली है। वांगचुक के अनशन तोड़ने से मानवीय संकट फिलहाल टल गया है। लेकिन सरकार की असली जीत अभी नहीं हुई है। अगर छात्रों की मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह 'जीत' अल्पकालिक साबित होगी और विपक्ष व छात्र आंदोलन दोनों इसे आगे भुनाएंगे। ऐसे में हो सकता है कि छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेते हुए सरकार कोई कोई बीच का रास्ता निकाले जो सभी पक्षों को मंजूर हो। अगर बात नहीं बनी तो छात्र फिर से आंदोलन के रास्ते आने का खतर बना रहेगा। इससे सड़क पर फिर टकराव शुरू हो जाएगा जो छात्र या सरकार किसी के हित में नहीं होगा।

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