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अस्तित्व में कब आया BRICS? कौन से काम करता है यह समूह, दुनिया की अर्थव्यवस्था-आबादी में कितनी है इसकी हिस्सेदारी

BRICS शब्द सबसे पहले 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए गढ़ा था। रूस ने 2009 में पहला औपचारिक सम्मेलन बुलाया, और अगले ही साल दक्षिण अफ्रीका चीन के न्योते पर इसमें शामिल हुआ तब जाकर ये BRICS बना।

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Photo : AP
12-13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का आयोजन।
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 9, 2026, 13:06 IST
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BRICS Summit 2026: आगामी 12 और 13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं के समूह BRICS का सम्मेलन होने जा रहा है। हालांकि, चीन की अर्थव्यवस्था अपवाद है। वह एक विकसित अर्थव्यवस्था है। पुतिन सहित ब्रिक्स के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष का दिल्ली दौरा करीब-करीब तय हो चुका है लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे को लेकर अभी असमंजस बना हुआ है। जिनपिंग की भारत यात्रा यदि होती है तो सात साल में उनकी यह पहली भारत यात्रा होगी। आज हम यहां समझेंगे BRICS है क्या, ये इतना बड़ा क्यों हो गया, और दिल्ली समिट में भारत के लिए दांव पर क्या लगा है।

BRICS है क्या, क्यों हुआ इसका गठन

BRICS शब्द सबसे पहले 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए गढ़ा था। रूस ने 2009 में पहला औपचारिक सम्मेलन बुलाया, और अगले ही साल दक्षिण अफ्रीका चीन के न्योते पर इसमें शामिल हुआ तब जाकर ये BRICS बना। खास बात यह है कि ब्रिक्स कोई संधि-आधारित संगठन नहीं है और न कोई चार्टर, न कोई स्थायी सचिवालय। ये एक गठबंधन है, जो सहमति के आधार पर चलता है, और हर साल एक सदस्य देश इसकी अध्यक्षता संभालता है। 2023 में इसका बड़ा विस्तार हुआ। इसमें शामिल होने के लिए मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE को न्योता मिला। अर्जेंटीना ने इससे जुड़ने से मना कर दिया। 2024 में इंडोनेशिया भी इससे जुड़ गया। आज BRICS 11 पूर्ण सदस्यों का समूह है, और दुनिया की करीब एक-चौथाई अर्थव्यवस्था और आधी आबादी इसमें समाई है।

आबादी और अर्थव्यवस्था दोनों में दबदबा

आज के 11 सदस्यीय BRICS-ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया का वैश्विक अर्थव्यवस्था और आबादी में बड़ा प्रभाव है। भारत सरकार के अनुसार, ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, यानी दुनिया के लगभग हर दो में से एक व्यक्ति BRICS देशों में रहता है। आर्थिक ताकत की बात करें तो परचेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के आधार पर BRICS की हिस्सेदारी वैश्विक GDP में करीब 40% है। IMF के 2025 अनुमानों के अनुसार यह हिस्सा लगभग 40.7% तक पहुंच सकता है। वहीं, बाजार विनिमय दर के आधार पर हिस्सेदारी लगभग 28-29% है। इस तरह, करीब आधी वैश्विक आबादी और 40% के आसपास वैश्विक GDP के साथ BRICS विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुका है।

आर्थिक ताकत और डॉलर से दूरी की कोशिश

BRICS का मकसद शुरू से साफ रहा है। विश्व बैंक, IMF और G7 जैसी पश्चिमी-प्रभुत्व वाली संस्थाओं का विकल्प खड़ा करना। इसीलिए इसने विश्व बैंक और आईएमएफ की तर्ज पर न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और कंटीजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) बनाए। NDB ने 2016 से अब तक करीब 32 अरब डॉलर के 96 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है, लेकिन ये विश्व बैंक के मुकाबले पांच गुना से भी छोटा है।

Brics Summit 2026

Brics Summit 2026

डॉलर पर निर्भरता घटाना

ब्रिक्स के बारे में कहा जाता है कि आपसी व्यापार के लिए ये देश डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते हैं। ये देश अपने देश की करेंसी यानी मुद्रा में लेन-देन करने का समर्थन करते हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला एक साझा BRICS करेंसी की वकालत करते रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है ये फिलहाल दूर की कौड़ी है। डॉलर अब भी वैश्विक व्यापार के 80% से ज्यादा हिस्से में इस्तेमाल होता है और एक साझा मुद्रा के लिए बैंकिंग यूनियन और फिस्कल यूनियन जैसी बड़ी राजनीतिक सहमति चाहिए, जो अभी दूर की बात है। यही वह विचार है जिस पर ट्रंप प्रशासन सबसे ज्यादा भड़का है। डोनाल्ड ट्रंप ने BRICS देशों को धमकी दी है कि अगर उन्होंने डॉलर को कमजोर करने की कोशिश की, तो उन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा।

ब्रिक्स के भीतर की दरारें

BRICS जितना बड़ा हुआ, उतनी ही उसकी भीतरी दरारें भी गहरी हुईं। भारत-चीन सीमा विवाद और ग्लोबल साउथ के नेतृत्व की होड़ को लेकर भारत और चीन में गतिरोध नजर आता है। यही वजह है कि ब्रिक्स के विस्तार पर भारत हमेशा चीन और रूस से ज्यादा सतर्क रहा। भारत को डर था कि ज्यादा सदस्य जोड़ने से बीजिंग के प्रभाव वाले देशों की तादाद बढ़ेगी। रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी इस गुट में दरार डाली। पुतिन पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का गिरफ्तारी वारंट है, जिसकी वजह से वो 2023 के दक्षिण अफ्रीका समिट में शारीरिक रूप से नहीं जा पाए थे। सऊदी अरब-ईरान और मिस्र-इथियोपिया जैसी पुरानी क्षेत्रीय रंजिशें भी अब इसी टेबल पर बैठी हैं। पश्चिमी देशों ने अब तक BRICS को बहुत गंभीरता से नहीं लिया लेकिन यूरोप के कुछ नीति-निर्माताओं ने चेतावनी दी है कि पश्चिम-विरोधी भावना अब पहले से ज्यादा तीखी होती जा रही है, और इसकी एक वजह ये भी है कि निम्न-आय वाले देशों की ज़रूरतों को पश्चिम ने लंबे समय तक नजरअंदाज किया।

अब बात दिल्ली समिट की-12–13 सितंबर

भारत चौथी बार BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। भारत मंडपम में आयोजित हो रहे 18वें BRICS समिट की थीम है-'बिल्डिंग फॉर रेजिलेंस, इनोवेशन, को-ऑपरेशन एंड सस्टेनबिलिटी'। इसकी अध्यक्षता के दौरान भारत ने 25 से ज्यादा शहरों में करीब 350 बैठकें पहले ही करवा चुका है।

सबसे बड़ा सवाल

क्या मोदी और शी की द्विपक्षीय मुलाकात होगी? अगर होती है, तो ये समिट की सबसे बड़ी कूटनीतिक खबर होगी, क्योंकि दोनों देश LAC पर तनाव कम करने की दिशा में बरसों बाद कदम बढ़ा रहे हैं। भारत के लिए ये समिट सिर्फ मेजबानी नहीं, एक बैलेंसिंग एक्ट है। भारत हमेशा से BRICS के भीतर सबसे सतर्क आवाज रहा है। जहां चीन और रूस विस्तार के पक्षधर रहे हैं, वहीं भारत झिझकता रहा है क्योंकि हर नया सदस्य जो बीजिंग के करीब है, वो चीन का प्रभाव और बढ़ाता है। भारत का अमेरिका के साथ रिश्ता भी उतना ही अहम है।

Bharat Mandapam

Bharat Mandapam

ट्रंप प्रशासन ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करके और ईरान के साथ तनाव बढ़ाकर मिडिल ईस्ट में एक नया मोर्चा खोल दिया है। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश जिनके अमेरिका से अपेक्षाकृत गर्म रिश्ते हैं। इस भू-राजनीतिक खींचतान के बीच फंस जाते हैं। एक तरफ़ रूस से तेल ख़रीदना और चीन के साथ एक मंच साझा करना, दूसरी तरफ वॉशिंगटन के टैरिफ की धमकियों से बचना, यही भारत की चुनौती है।

'पश्चिम-विरोधी गुट' की छवि से दूर रहना भारत की चुनौती

अध्यक्ष के तौर पर भारत की कोशिश यही रहेगी कि BRICS को 'पश्चिम-विरोधी गुट' की छवि से दूर रखकर, इसे ग्लोबल साउथ के व्यावहारिक हितों व्यापार, तकनीक, जलवायु वित्त पर केंद्रित रखा जाए। ये ठीक वही लाइन है जो भारत लंबे समय से खींचता आया है। भारत की कोशिश रहेगी कि वह बिना किसी ब्लॉक में बंधे रूस और अमेरिका दोनों से रिश्ते साधता रहे। चौथा शी जिनपिंग की संभावित यात्रा भारत-चीन संबंधों में एक प्रतीकात्मक मोड़ हो सकती है, खासकर तब जब पिछले कुछ महीनों में दोनों देश सीमा पर स्थिरता बहाल करने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। BRICS का विस्तार यहीं नहीं रुकने वाला। 2024 में करीब 30 से ज्यादा देशों ने इसमें शामिल होने के लिए आवेदन किया था। अजरबैजान, मलेशिया, तुर्की जैसे नाम इसमें शामिल हैं। लेकिन जितना बड़ा गुट होगा, उतनी ही मुश्किल होगी किसी चुनौतीपूर्ण मुद्दे पर सहमति बनान होगा। दिल्ली समिट की असली परीक्षा यही होगी कि क्या भारत, इतने विरोधाभासी हितों वाले 11+ देशों को एक व्यावहारिक एजेंडे पर राजी कर पाता है, या ये समिट सिर्फ एक और 'फैमिली फोटो' बनकर रह जाता है।

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