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क्या है पशु क्रूरता निवारण अधिनियम? जानिए कानून, अधिकार और सजा का प्रावधान

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) भारत में पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता को रोकने और उनके कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया एक केंद्रीय कानून है। यह अधिनियम संसद द्वारा 1960 में पारित किया गया था।

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क्या का पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (फोटो- PTI)
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Aug 16, 2025, 23:35 IST

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने देशभर में आवारा कुत्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। समाज इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है—एक पक्ष उन लोगों का है जो कुत्तों के अधिकारों और सुरक्षा की पैरवी करते हुए इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, जबकि दूसरा खेमा सार्वजनिक सुरक्षा और नियंत्रण की जरूरत के पक्ष में खड़ा है। यह बहस सिर्फ कुत्तों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे जुड़ा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 भी अब कटघरे में है। इस कानून के तहत जानवरों, खासकर कुत्तों के खिलाफ हिंसा, मारपीट या अमानवीय व्यवहार को अपराध माना गया है। लेकिन हाल के दिनों में यह आरोप भी सामने आए हैं कि कुछ पशु प्रेमी या स्वयंसेवी संगठन इस कानून का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। कई बार आवारा कुत्तों से परेशान नागरिकों पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती है। शिकायत करने पर पशु अधिकार कार्यकर्ता या वॉलंटियर्स पुलिस की चेतावनी देने लगते हैं, जिससे आम नागरिक डरा और असहाय महसूस करता है। इस पूरे विवाद ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और पशु क्रूरता अधिनियम—दोनों के औचित्य, व्याख्या और प्रभावशीलता को लेकर व्यापक विमर्श को जन्म दिया है। यह अब एक कानून बनाम जनहित की बहस में बदल चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर यह अधिनियम क्या है, इसका उद्देश्य क्या है और मौजूदा हालात में इसकी सीमाएं क्या हैं? आइए, विस्तार से जानते हैं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के बारे में

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 भारत में जानवरों के अधिकारों की रक्षा करने वाला एक प्रमुख कानून है। इसे स्वतंत्र भारत में पशु कल्याण के लिए बनाए गए सबसे पहले और सबसे महत्त्वपूर्ण कानूनों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य है- जानवरों के साथ क्रूरता को रोकना, उन्हें अनावश्यक कष्ट से बचाना, और एक ऐसे सामाजिक वातावरण को प्रोत्साहित करना जहां जानवरों के साथ संवेदनशीलता और करुणा से पेश आया जाए।

क्यों पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की हुई जरूरत महसूस

1950 के दशक में भारत में पशुओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार और उपेक्षा की घटनाएं लगातार सामने आ रही थीं। उस समय समाज में पशु अधिकारों को लेकर ज्यादा चेतना नहीं थी और न ही ऐसा कोई मजबूत कानूनी ढांचा था, जो इन जीवों की रक्षा कर सके। इसी स्थिति को देखते हुए संसद ने 1960 में यह अधिनियम पारित किया। इसके पीछे मुख्य प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उस विचार से भी जुड़ी थी जिसमें उन्होंने कहा था- "किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति इस बात से आंकी जा सकती है कि वह अपने पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करता है।"

कानून की मूल भावना और उद्देश्य

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि कोई भी व्यक्ति बिना कारण किसी जानवर को पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और यदि ऐसा करता है तो उसे सजा मिलेगी। इस कानून के तहत "पशु" का अर्थ है ऐसा कोई भी जीव जो मानव नहीं है- यानी इसमें गाय, कुत्ते, बिल्ली, बकरी, घोड़े, हाथी, पक्षी और अन्य सभी जीव शामिल हैं। इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी जानवर को इस प्रकार का कोई कार्य कराना, जिससे उसे शारीरिक या मानसिक कष्ट हो, एक दंडनीय अपराध है। इसका मतलब यह हुआ कि पशु को भूखा-प्यासा रखना, मारना-पीटना, बंधक बनाना, बीमार होने पर इलाज न कराना, या उसे उसकी क्षमता से अधिक कार्य के लिए मजबूर करना, सब कुछ इस कानून के अंतर्गत "क्रूरता" की श्रेणी में आता है।

animal lover protest

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धारा 11 – क्रूरता के प्रकार

  • यह धारा सबसे महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत कई कार्यों को "क्रूरता" माना गया है
  • बिना पर्याप्त भोजन या पानी दिए जानवर को रखना
  • उसे आवश्यकता से अधिक काम पर लगाना
  • उसकी चोट या बीमारी का इलाज न कराना
  • मनोरंजन या तमाशे के लिए उसका इस्तेमाल करना (कुछ अपवादों को छोड़कर)
  • जानवरों की लड़ाई करवाना
  • गलत तरीके से हत्या या यातना देना

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड

इस कानून के तहत "Animal Welfare Board of India" (AWBI) की स्थापना की गई, जो इस कानून के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। यह बोर्ड पशु कल्याण से जुड़ी नीतियां बनाता है, पशु-कल्याण संगठनों को पंजीकृत करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि देश में इस अधिनियम के प्रावधानों का पालन हो। AWBI फिल्मों, सर्कस, और अन्य मनोरंजन गतिविधियों में जानवरों के इस्तेमाल की अनुमति भी देता है और उनके शोषण की स्थिति में कार्रवाई कर सकता है।

सजा और दंड का प्रावधान

यहीं पर इस अधिनियम की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। 1960 में जब इसे बनाया गया, उस समय ₹10 या ₹50 की सजा शायद कुछ मायने रखती थी, लेकिन आज के समय में ये दंड इतने छोटे हैं कि उनका कोई असर नहीं पड़ता।

  • पहली बार अपराध करने पर अधिकतम ₹50 जुर्माना या चेतावनी।
  • बार-बार अपराध करने पर अधिकतम ₹100 जुर्माना और/या तीन महीने तक की सजा।

कानून में सजा के प्रावधान पर सवाल

यानी यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी जानवर को मारता है, या बुरी तरह से पीटता है, तब भी वह ₹100 देकर छूट सकता है। यही कारण है कि लंबे समय से इस कानून में संशोधन की मांग की जा रही है और इसमें बदलाव प्रस्तावित भी है।

संभावित संशोधन (Draft Amendment Bill)

  • जुर्माने की सीमा ₹75,000 तक बढ़ाने का प्रस्ताव।
  • कुछ मामलों में 5 साल तक की सजा का सुझाव।
  • "Bestiality" (जानवरों के साथ यौन हिंसा) को अपराध की श्रेणी में लाने की योजना।
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विवाद और आलोचना

पिछले कुछ वर्षों में पशु क्रूरता अधिनियम विवादों में भी रहा है- खासकर आवारा कुत्तों को लेकर। कुछ इलाकों में जहां कुत्ते लोगों पर हमला करते हैं या स्वास्थ्य खतरा बनते हैं, वहां उन्हें हटाने की कोशिश की जाती है, तो कई पशु-प्रेमी और संगठन इस कानून का इस्तेमाल करके ऐसे नागरिकों पर मुकदमा करवा देते हैं। इसके चलते कई बार कानून का दुरुपयोग होने के आरोप लगे हैं। वहीं कुछ मामलों में पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता के कारण, असली मामलों में भी कार्रवाई नहीं हो पाती- जैसे जानवरों की तस्करी या बीमारियों से मरना आदि। इस कानून के दुरुपयोग के कारण जहां एक ओर सही मामलों में पशुओं को मदद नहीं मिल पाती है, वहीं कई बार बेकसूर लोग भी इसके कारण कानूनी विवाद में फंस जाते हैं।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम का दुरुपयोग कैसे हो रहा है?

  • कुछ लोग जिन इलाकों में आवारा कुत्तों की संख्या अधिक है, वहां उनकी शिकायत करने वाले नागरिकों पर कुत्ता प्रेमी समूह या एनिमल वेलफेयर वॉलंटियर्स पुलिस में शिकायत करने की धमकी देते हैं। अगर कोई नागरिक यह कहे कि "कुत्तों को कॉलोनी से हटाया जाए," तो उसे "पशु क्रूरता" के तहत केस में फंसाने की धमकी दी जाती है।
  • कई गेटेड कॉलोनियों में डॉग फीडिंग जोन या कुत्तों की उपस्थिति को लेकर विवाद होता है। फीडिंग रोकने या आपत्ति जताने वाले लोगों को PCA एक्ट के उल्लंघन का आरोपी बना दिया जाता है, जबकि उनका उद्देश्य सुरक्षा होता है, क्रूरता नहीं।
  • कई बार किसी जानवर को भगाने, डांटने या डराने की घटना का आधा वीडियो वायरल कर उस व्यक्ति को "क्रूर व्यक्ति" बताकर उसके खिलाफ केस दर्ज किया जाता है।
  • PCA अधिनियम में कई शब्द जैसे "क्रूरता", "अनावश्यक दर्द", या "उचित देखभाल" अस्पष्ट हैं। इनका अर्थ हर व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है, जिससे अनुचित FIR दर्ज करने में आसानी होती है।
  • कई बार विरोधी या स्थानीय गुंडे गौशालाओं या डेरी फार्म पर PCA एक्ट के तहत शिकायत कर देते हैं, जबकि वहां असल में कोई अत्याचार नहीं होता।

आवारा कुत्तों को लेकर विवाद और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

दिल्ली‑NCR में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्या ने हाल ही में एक नए विवाद को जन्म दिया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को एक आदेश जारी करते हुए दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद से सभी आवारा कुत्तों को आठ सप्ताह के भीतर पकड़कर उन्हें स्थायी रूप से शेल्टर होम में रखने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पकड़े गए कुत्तों को वापस सड़कों पर नहीं छोड़ा जाएगा। ये आदेश पशु अधिकार संगठनों और समाज के व्यापक हिस्सों में तीव्र विरोध का कारण बने। कई लोगों ने इस कदम को “अव्यावहारिक और अमानवीय” बताया, क्योंकि शहर में पर्याप्त भूमि, संसाधन तथा समर्पित कर्मचारियों के बिना लाखों कुत्तों को संगठित रूप से शेल्टर में रखना संभव नहीं है।

डराने वाले हैं कुत्तों के काटने के मामले

दिल्ली सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कुत्तों के काटने के आंकड़े रखे, जो काफी डराने वाले हैं। उन्होंनने कहा कि 2024 में भारत में कुत्तों के काटने के लगभग 37.15 लाख मामले सामने आए, अर्थात प्रतिदन लगभग 10,000 मामले। मेहता ने एक खबर का भी हवाला दिया और कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सरकारी और अन्य प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग करते हुए पिछले वर्ष कुत्ते के काटने से संबंधित 305 मौतों की सूचना दी थी।

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