हाल ही में कांग्रेस हाईकमान यानी राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने छह राज्यों के प्रभारियों में फेरबदल करते हुए अपनी नई सांगठनिक रणनीति का खुलासा किया है। हालांकि यह फेरबदल केवल छह राज्यों तक सीमित है, लेकिन इसमें नेताओं को दी गई जिम्मेदारियों से पार्टी के भीतर घटते-बढ़ते कद और भविष्य की चुनावी बिसात का स्पष्ट खाका देखने को मिल रहा है। इस पूरे पुनर्गठन में सबसे ज्यादा चर्चा सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने और रणदीप सिंह सुरजेवाला को कर्नाटक के साथ-साथ गुजरात की भी कमान सौंपे जाने को लेकर हो रही है। आइए समझते हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के इस कदम के पीछे क्या गेम प्लान है।
सचिन पायलट का 'पंजाब टेस्ट'
सचिन पायलट को छत्तीसगढ़ से हटाकर पंजाब जैसे बड़े और चुनावी रूप से महत्वपूर्ण राज्य की कमान सौंपना एक बड़ा राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है। उत्तर भारत के बड़े राज्यों में पंजाब उन गिने-चुने राज्यों में से एक है जहां कांग्रेस आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ मजबूती से वापसी की उम्मीद कर रही है। पंजाब कांग्रेस में इस समय प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच वर्चस्व की जंग जारी है। खास बात यह है कि वड़िंग और चन्नी दोनों ही राहुल गांधी के पसंदीदा और करीबी नेता माने जाते हैं। ऐसे में दो अपनों की लड़ाई को शांत करने के लिए राहुल गांधी ने पीढ़ीगत संतुलन बनाते हुए सचिन पायलट पर दांव खेला है।
पायलट के लिए क्यों अहम है यह जिम्मेदारी?
राजस्थान में अशोक गहलोत के साथ लंबे चले सियासी संघर्ष का व्यक्तिगत अनुभव रखने के कारण पायलट यह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि अंदरूनी गुटबाजी से पार्टी को कितना नुकसान होता है। अगर पायलट राजा वड़िंग और चन्नी के बीच समन्वय बिठाकर, बिना किसी बगावत के टिकट बंटवारा करा लेते हैं और पार्टी को AAP के खिलाफ मुख्य मुकाबले में खड़ा कर देते हैं, तो यह उनका पासिंग एग्जाम साबित होगा। इससे 2028 में राजस्थान विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस हाईकमान के सामने अपनी निर्विवाद लीडरशिप का दावा ठोकना उनके लिए और आसान हो जाएगा।
सुरजेवाला पर 'गुजरात दांव'
अगर सचिन पायलट का पंजाब ट्रांसफर एक परीक्षा है, तो रणदीप सिंह सुरजेवाला को गुजरात का अतिरिक्त प्रभार मिलना हाईकमान का उन पर अटूट भरोसा दर्शाता है। सुरजेवाला 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय वहां के प्रभारी थे, जहां कांग्रेस ने 135 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। इतना ही नहीं, सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार जैसी दो बड़ी शख्सियतों के बीच सत्ता संघर्ष को बिना किसी बड़े विवाद के सुलझाने में सुरजेवाला की भूमिका बेहद अहम रही थी। गुजरात भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है, जहां 1995 से कांग्रेस सत्ता से बाहर है और 2022 में वह सिमटकर महज 17 सीटों पर रह गई थी। सुरजेवाला का काम गुजरात में 2027 चुनाव से पहले पार्टी को फिर से एक विकल्प के रूप में खड़ा करना है।
सुरजेवाला की लो-प्रोफाइल वर्किंग स्टाइल
सुरजेवाला की खासियत यह है कि वे राज्यों में अपनी अलग गुटबाजी या समानांतर सत्ता केंद्र बनाने के बजाय हाईकमान के सीधे दूत के रूप में काम करते हैं। राहुल और प्रियंका गांधी के बेहद करीब होने के कारण पार्टी उन्हें अपना भरोसेमंद 'ट्रबलशूटर' मान रही है।
अन्य राज्यों में फेरबदल और प्लान
पंजाब और गुजरात के अलावा अन्य चार राज्यों के बदलाव भी राहुल गांधी की दीर्घकालिक सांगठनिक सोच को दर्शाते हैं। भूपेश बघेल को असम का प्रभार दिए जाने के पीछे भी एक रणनीति है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पंजाब से हटाकर असम की कमान दी गई है। बघेल इससे पहले असम चुनाव में पर्यवेक्षक रह चुके हैं और प्रियंका गांधी के साथ हिमाचल और यूपी में काम कर चुके हैं। असम में गौरव गोगोई के साथ उनका पुराना समन्वय पार्टी को मजबूत करने में मदद करेगा।
सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी
झारखंड के वरिष्ठ आदिवासी नेता सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया है। यह फैसला राहुल गांधी के 'आदिवासी प्रतिनिधित्व' के एजेंडे से मेल खाता है। सिरिवेला प्रसाद को महाराष्ट्र की कमान मिली है। आंध्र प्रदेश के नेता सिरिवेला प्रसाद को बिना किसी क्षेत्रीय गुटबाजी के महाराष्ट्र जैसी जटिल राजनीति (महाविकास अघाड़ी गठबंधन) को संभालने का काम दिया गया है। वहीं, पी.वी. मोहन को आंध्र प्रदेश की जिम्मेदारी मिली है। शून्य से शुरुआत करने वाली आंध्र प्रदेश इकाई को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी पी.वी. मोहन को दी गई है।
'सेकंड-लाइन' यानी बैंच स्ट्रेंथ तैयार कर रही कांग्रेस
कांग्रेस के इस पूरे फेरबदल से साफ है कि राहुल गांधी पार्टी के भीतर नेताओं की एक ऐसी 'सेकंड-लाइन' यानी बैंच स्ट्रेंथ तैयार कर रहे हैं, जो केवल भाषण देने के बजाय राज्यों में अंदरूनी खींचतान खत्म करने और चुनावी रणनीति लागू करने में सक्षम हों। पायलट को पंजाब की मुश्किल परीक्षा में डालकर उनकी क्षमता परखी जा रही है, जबकि सुरजेवाला को कर्नाटक और गुजरात दोनों देकर यह संदेश दिया गया है कि नतीजे देने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी। हालांकि, इस पूरे गेम प्लान की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हाईकमान इन प्रभारियों को जमीनी स्तर पर फैसले लेने की कितनी स्वायत्तता और अधिकार देता है।