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मानगढ़ धाम पर क्या है नया विवाद, केंद्र ने राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने से क्यों किया इनकार?

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में गुजरात सीमा पर स्थित मानगढ़ धाम 17 नवंबर 1913 को हुए उस ऐतिहासिक नरसंहार का स्थल है, जिसमें ब्रिटिश सेना ने लगभग 1,500 भील आदिवासियों की हत्या कर दी थी। यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) से छह वर्ष पहले हुई थी, इसलिए इसे अक्सर 'आदिवासियों का जलियांवाला बाग' कहा जाता है।

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राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में है मानगढ़ धाम।
Written by: Alok Rao
Updated Aug 6, 2026, 13:54 IST
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Mangarh Dham controversy : राजस्थान का मानगढ़ धाम एक बार फिर चर्चा में है। बांसवाड़ा जिले में स्थित यह ऐतिहासिक स्थल सुर्खियों में इसलिए आया है क्योंकि सरकार ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने से इंकार कर दिया है। सरकार का कहना है कि यह स्थल इस योग्य नहीं है कि इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक का दर्जा दिया जाए। सरकार के इस रुख के बाद विपक्ष हमलावर है और उसने आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान न करने का आरोप लगाया है। दरअसल, बीते दिनों यह मामला संसद में उठा। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के प्रमुख हनुमान बेनीवाल के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारक का दर्जा पाने की जो पात्रता एवं योग्यता है, मानगढ़ धाम उसे पूरी नहीं करता। इससे पहले मार्च में भाजपा के उदयपुर के सांसद मन्ना लाल रावत के सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि मानगढ़ धाम का राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का उसके पास कोई प्रस्ताव नहीं है।

राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित होने के योग्य नहीं-शेखावत

राजस्थान के बांसवाड़ा इलाके में आदिवासी समाज मानगढ़ धाम को अपनी पहचान से जोड़कर देखता है। इस स्थान आदिवासी समाज के जुड़ाव को देखते और अक्सर इस इलाके में एक भील प्रदेश के गठन की मांग भी उठती रही है। आदिवासी समाज के लोगों का कहना है कि राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के जनजाति बहुल क्षेत्रों को मिलाकर एक भील प्रदेश का निर्माण होना चाहिए। शेखावत ने अपने जवाब में कहा कि 'स्थल का निरीक्षण करने पर यह पाया गया कि इस स्थान पर काफी निर्माण कार्य हुआ है। राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित होने के लिए जिस पुरातात्विक विशेषताओं, प्रमाणिकता एवं अखंडता की जरूरत होती है, यह स्थल उसे पूरा नहीं करता। सरकार के इस जवाब के बाद आदिवासी समाज के नेताओं में नाराजगी देखी जा रही है। 'इंडियन एक्सप्रेस' के साथ बातचीत में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के संस्थापक एवं बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि 'केंद्रीय मंत्री ने जिस तरह से जवाब दिया है वह 1500 आदिवासियों के बलिदान (मानगढ़ नरसंहार) का अपमान है। भाजपा सम्मान नहीं दे सकती। सरकार के इस रुख से आदिवासी समाज और इस स्थान पर श्रद्धा रखने वाले लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक का दर्जा न देना अलग बात है लेकिन सरकार का जवाब यह दिखाता है कि आदिवासियों का बलिदान उसके लिए कोई महत्व नहीं रखता।'

'राजनीतिक फायदे के लिए मानगढ़ धाम का इस्तेमाल किया'

बीएपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहन लाल रोत ने भी सरकार के रवैये की आलोचना की है। उन्होंने कहा, 'सरकार के इस जवाब का हम विरोध करते हैं। इसके बारे में हम लोगों को बताएंगे। हमारे बलिदान से दुनिया परिचित है लेकिन भाजपा आज भी आदिवासियों के प्रति हीन भावना रखती है। इन चारों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है। इन राज्यों के भाजपा विधायकों एवं सांसदों को इस स्थान के महत्व के बारे में सरकार को बताना चाहिए।'

Mangarh Dham

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बांसवाड़ा के सांसद राजकुमार ने आगे कहा कि 'पहले कांग्रेस और अब भाजपा ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए मानगढ़ धाम का इस्तेमाल किया है। अपनी रैलियों के लिए ये राजनीतिक दल मानगढ़ का इस्तेमाल करते हैं लेकिन सरकार का जवाब सौतेले व्यवहार जैसा है।' कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछली बार यहां अगस्त 2023 में आए थे जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2022 में यहां का दौरा किया था।

1913 में अंग्रेजों की गोलीबारी में मारे गए थे सैकड़ों आदिवासी

वहीं, सरकार के इस जवाब पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर आदिवासी समाज की भावनाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने मंगलवार को कहा कि संसद में सरकार द्वारा यह बताए जाने के बाद कि बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ धाम को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने के योग्य नहीं पाया गया, केंद्र का आदिवासी विरोधी रवैया उजागर हो गया है। गहलोत ने कहा कि केंद्र सरकार के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आदिवासी समाज को केवल वोट बैंक के रूप में देखते हैं तथा उनकी पहचान और इतिहास का सम्मान नहीं करते। बांसवाड़ा जिले का मानगढ़ धाम वह ऐतिहासिक स्थल है, जहां आदिवासी नेता गोविंद गुरु ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों को संगठित किया था। वर्ष 1913 में ब्रिटिश सेना की गोलीबारी में सैकड़ों आदिवासी पुरुष और महिलाएं शहीद हुए थे। इस कारण इस स्थल को 'आदिवासियों का जलियांवाला बाग’ भी कहा जाता है। गहलोत ने कहा कि 2022 में मोदी के मानगढ़ धाम दौरे के दौरान यह संदेश गया था कि जल्द ही इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलेगा। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसके लिए गंभीर प्रयास किए थे, लेकिन केंद्र सरकार ने इस मांग पर कोई कार्रवाई नहीं की।

मानगढ़ धाम का महत्व क्या है?

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में गुजरात सीमा पर स्थित मानगढ़ धाम 17 नवंबर 1913 को हुए उस ऐतिहासिक नरसंहार का स्थल है, जिसमें ब्रिटिश सेना ने लगभग 1,500 भील आदिवासियों की हत्या कर दी थी। यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) से छह वर्ष पहले हुई थी, इसलिए इसे अक्सर 'आदिवासियों का जलियांवाला बाग' कहा जाता है। इस नरसंहार के बाद से मानगढ़ धाम राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के भील आदिवासियों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल और उनकी सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान का प्रमुख प्रतीक बन गया। यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दल भी इस स्थल से जुड़े आदिवासी भावनाओं को महत्व देते रहे हैं। मानगढ़ धाम से जुड़ी आदिवासी पहचान ने भारतीय ट्राइबल पार्टी और बाद में उससे अलग होकर बनी भारत आदिवासी पार्टी के उभार में अहम भूमिका निभाई। ये दल राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लगभग 39 जिलों को मिलाकर अलग भील प्रदेश बनाने की मांग करते रहे हैं। हाल ही में BAP नेता कांति लाल रोत ने इसी मांग को लेकर 'भील प्रदेश संदेश यात्रा' भी निकाली थी। वर्ष 2017 में गुजरात में स्थापित BTP के प्रमुख उद्देश्यों में भी भील प्रदेश का गठन शामिल रहा है। राजस्थान BTP के अध्यक्ष वेलाराम घोघरा के अनुसार, भील समाज सुधारक और आध्यात्मिक नेता गोविंद गुरु ने 1913 के मानगढ़ नरसंहार के बाद ही अलग आदिवासी राज्य की अवधारणा रखी थी।

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मानगढ़ धाम को लेकर भाजपा पहले क्या कहती रही है?

साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मानगढ़ धाम दौरे से पहले यह संकेत मिले थे कि केंद्र सरकार इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर सकती है। मई 2022 में तत्कालीन केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाएगा। जुलाई 2022 में राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण की एक टीम ने मानगढ़ को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित करने संबंधी अपनी रिपोर्ट मेघवाल को सौंपी थी। हालांकि, 1 नवंबर 2022 को प्रधानमंत्री मोदी की सभा के दौरान जारी एक आधिकारिक बयान में यह दावा किया गया कि उन्होंने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया है। बाद में स्पष्ट हुआ कि यह उनके बयान की गलत व्याख्या थी। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा था कि 'मुझे विश्वास है कि मानगढ़ धाम का विकास इस क्षेत्र को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का केंद्र बनाएगा। भारत सरकार के सहयोग से इसे और विकसित किया जा सकता है। इसे राष्ट्रीय स्मारक कहा जाए या किसी और नाम से, लेकिन भारत सरकार और इन चार राज्यों के आदिवासी समाज के बीच सीधा संबंध है।'

भाजपा के ये नेता पहले कर चुके हैं मांग

वर्षों से भाजपा के कई नेताओं ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देने की मांग की है। 2015 में उदयपुर के तत्कालीन भाजपा सांसद अर्जुनलाल मीणा ने संसद में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठाई थी। 2019 में तत्कालीन राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक विधेयक निजी सदस्य विधेयक के रूप में पेश किया लेकिन यह पारित नहीं हो सका। बांसवाड़ा के पूर्व सांसद कनक मल कटारा ने भी कई बार संसद में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित करने की मांग की। मार्च 2025 में उदयपुर से भाजपा सांसद मन्नालाल रावत ने भी केंद्र सरकार से मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की अपील की।

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