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क्या है भारत का 'रक्षा' फ्रेमवर्क? 10 सालों वाली डिफेंस डिप्लोमेसी तैयार करेगी व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के संकल्प और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान ने देश में हथियार निर्माण का एक इको-सिस्टम तैयार किया है। खास बात है कि इस इको-सिस्टम में डीआरडीओ, एचएएल जैसी सरकारी एजेंसियां सहित टाटा, अडानी, कल्याणी और भारत फोर्ज जैसे रक्षा क्षेत्र के निजी कंपनियां भी शामिल हैं।

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दिल्ली में 'रक्षा फ्रेमवर्क' दस्तावेज का विमोचन करते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह। तस्वीर-PIB
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 8, 2026, 14:59 IST
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RAKSHA document : लंबे समय तक भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। रक्षा खरीदारा का यह दायरा पहले रूस और फ्रांस तक सीमित था लेकिन अब हथियारों की आपूर्ति अमेरिका और इजराइल से भी हो रही है। बावजूद इसके भारत का कदम रक्षा आयात से रक्षा निर्यात की तरफ तेजी से बढ़ा है। भारत अब देशों को ब्रह्मोस, अस्त्र मिसाइल, पिनाका और वायु रक्षा प्रणाली आकाश से लैस कर रहा है। पहले भारत का रक्षा निर्यात नगण्य था लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड Rs38,424 करोड़ का रहा है। रक्षा निर्यात का यह सर्वकालिक उच्च स्तर है। पिछले वित्त वर्ष यानी 2024-25 में भारत ने Rs23,622 करोड़ मूल्य का रक्षा निर्यात किया था। वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा निर्यात मात्र 686 करोड़ रुपये था। बीते 14-15 सालों में रक्षा उत्पादन क्षेत्र में भारत ने जिस तरह से अपने पांव मजबूत किए हैं, उसी का नतीजा है कि आज भारत इतने बड़े पैमाने रक्षा निर्यात कर पाने की स्थिति में पहुंचा है।

रक्षा क्षेत्र उत्पादन में निजी कंपनियों की भूमिका अहम

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के संकल्प और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान ने देश में हथियार निर्माण का एक इको-सिस्टम तैयार किया है। खास बात है कि इस इको-सिस्टम में डीआरडीओ, एचएएल जैसी सरकारी एजेंसियां सहित टाटा, अडानी, कल्याणी और भारत फोर्ज जैसे रक्षा क्षेत्र के निजी कंपनियां भी शामिल हैं। फाइटर जेट इंजन निर्माण की जिम्मेदारी निजी कंधों पर सौंपी गई है। यानी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए सरकार सारी अड़चनें दूर करते हुए एक व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी की तरफ बढ़ रही है। इस वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के लिए सरकार ने 10 साल के लिए 'रक्षा फ्रेमवर्क' नाम से एक डिफेंस डिप्लोमेसी तैयार किया है। एक्सपर्ट मानते हैं कि यह 'रक्षा फ्रेमवर्क' भारत के डिफेंस डिप्लोमेसी में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बीते 3 सितंबर को नई दिल्ली में इस 'रक्षा फ्रेमवर्क' दस्तावेज का विमोचन किया। यहां यह बता देना जरूरी है कि यह व्यापक दस्तावेज अगले 10 वर्षों में वैश्विक रक्षा साझेदारियों पर देश के रणनीतिक रोडमैप और दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

दस्तावेज का रणनीतिक खाका

यह दस्तावेज देश की रणनीतिक प्रतिबद्धता में एक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों को सक्रिय वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ा गया है। इससे दीर्घकालिक स्थिरता और पारस्परिक विकास को बढ़ावा मिलता है। दस्तावेज के रणनीतिक खाके में जिन प्रमुख स्तंभों पर प्रकाश डाला गया है, वे इस प्रकार हैं-

रणनीतिक साझेदारी : द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना।

क्षमता विकास : संयुक्त सैन्य अभ्यासों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना तथा मित्र देशों के साथ रक्षा के सर्वोत्तम तौर-तरीकों को साझा करना।

स्वदेशी निर्यात : भारत में निर्मित रक्षा प्लेटफार्मों को बढ़ावा देकर देश को एक विश्वसनीय वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना।

समुद्री सुरक्षा : हिंद महासागर क्षेत्र में शुद्ध सुरक्षा प्रदाता और प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में भारत की भूमिका को मजबूत करना।

रक्षा कूटनीति भारत की विदेश नीति का एक मुख्य स्तंभ है, इसलिए यह दस्तावेज अगले दशक के लिए एक स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भारत बदलते वैश्विक परिदृश्य में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बना रहे।

बीते एक दशक में भारत का इन देशों के साथ रक्षा करार

भारत ने 2014 के बाद करीब 20 देशों के साथ रक्षा/सैन्य करार किए हैं। इसमें बांग्लादेश, बोत्स्वाना, फ्रांस, फिजी, जापान, कजाकिस्तान, केन्या, किर्गिस्तान, ओमान, पुर्तगाल, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, रूस, सेशेल्स, सिंगापुर, सूडान, तंजानिया, तुर्केमिनिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और वियतनाम शामिल हैं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और इजराइल के साथ रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी विशेष दर्जे तक पहुंचे हैं।

अमेरिका से खरीदे गए उन्नत हथियार

भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका, रूस, फ्रांस और इजरायल के साथ विशेष रक्षा सहयोग एवं साझेदारियां रखता है।

अमेरिका ने भारत को प्रमुख रक्षा साझेदार का दर्जा दिया है। दोनों देशों ने LEMOA जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत अमेरिका से MQ-9B ड्रोन और P-8I समुद्री गश्ती विमान जैसी उन्नत प्रणालियां भी खरीदता है। इसके अलावा भारतीय वायु सेना में चिनूक, अपाचे हेलिकॉप्टर शामिल हो चुके हैं। एंटी-टैंक मिसाइल जैवलिन के लिए भारत ने हाल ही में रक्षा सौदा किया है। भारत और अमेरिका संयुक्त सैन्य अभ्यास और तकनीकी साझेदारी के जरिए दोनों देश क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत में उभरती चुनौतियों से निपटने की अपनी क्षमता मजबूत कर रहे हैं।

भारतीय सेना में 60 से 65 प्रतिशत हथियार रूसी

भारतीय फौज में आज भी 60 से 65 प्रतिशत हथियार रूसी हैं। हालांकि, रूसी हथियारों पर ये निर्भरता अब धीरे-धीरे कम हो रही है। फिर भी लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे सैन्य उपकरण, भारी बख्तरबंद प्रणालियां और रणनीतिक प्लेटफॉर्म रूसी हैं। रूस भारत का लंबे समय से प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। भारतीय सशस्त्र बलों के सक्रिय सैन्य बेड़े का बड़ा हिस्सा सोवियत या रूसी मूल की प्रणालियों पर आधारित है। इसमें लीज पर ली गई परमाणु पनडुब्बियां और विभिन्न संयुक्त उत्पादन परियोजनाएं भी शामिल हैं। भारत द्वारा रक्षा आयात में विविधता लाने के बावजूद, रूस के साथ लाइसेंस प्राप्त उत्पादन, स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और दीर्घकालिक तकनीकी सहयोग के जरिए संबंध जारी हैं।

फ्रांस प्रमुख रक्षा साझेदार

फ्रांस भारत का एक प्रमुख पश्चिमी रक्षा साझेदार है, जो तकनीकी हस्तांतरण और औद्योगिक सहयोग पर जोर देता है तथा सहयोग पर अपेक्षाकृत कम भू-राजनीतिक शर्तें लगाता है। राफेल लड़ाकू विमान भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग का प्रमुख उदाहरण हैं। इसके अलावा घरेलू कंपनियों और फ्रांसीसी रक्षा कंपनियों के बीच साझेदारी के जरिए भारत में रक्षा प्रणालियों के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। फ्रांस के 36 राफेल वायु सेना में शामिल हो चुके हैं। नौसेना के लिए राफेल-M अलग से सौदा हुआ है। फ्रांस की साफरान कंपनी भारतीय फाइटर जेट के लिए इंजन बनाएगी।

इजराइल से मिली नई तकनीक

इजराइल के साथ भारत की रक्षा साझेदारी व्यावहारिक और परिणाम-केंद्रित रही है। इजराइल भारत को विशेष निगरानी प्रणालियां, मिसाइल गाइडेंस किट और MRSAM/Barak-8 जैसी वायु रक्षा प्रणालियां उपलब्ध कराता है। दोनों देशों का सहयोग संयुक्त अनुसंधान एवं विकास, मौजूदा सैन्य प्रणालियों के उन्नयन और भारत में छोटे हथियारों के स्थानीय उत्पादन जैसी परियोजनाओं पर भी केंद्रित है। कुल मिलाकर मौजूदा दौर के युद्धों, संघर्षों एवं तनावों को देखते हुए भारत देशों के साथ अपना रक्षा सहयोग का दायरा लगातार बढ़ा रहा है। यह 'रक्षा फ्रेमवर्क' भी इसी दीर्घकालिक रक्षा कूटनीति का हिस्सा है। अगले 10 वर्षों में यह डिफेंस डिप्लोमेंसी भारत के लिए कई दशकों का रक्षा-सुरक्षा का रोडमैप तैयार करेगी।

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