What is Air Turbulence : विमान का एयर टर्बुलेंस में फंसना कोई नई बात नहीं है। मौसम खराब होने पर ये अक्सर एयर टर्बुलेंस में फंस जाते हैं। हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ान भर रहे विमान खराब मौसम में एयर टर्बुलेंस की जद में आ जाते हैं। ये टर्बुलेंस हल्के, मध्यम, तीव्र और खतरनाक स्तर के होते हैं । हल्के एवं मध्यम स्तर के टर्बुलेंस से विमान को नुकसान पहुंचने का खतरा कम होता है और वे खुद को नियंत्रित भी कर लेते हैं लेकिन तीव्र और खतरनाक स्तर के एयर टर्बुलेंस का सामना होने पर उन्हें नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।
एयर टर्बुलेंस में हवा की गति काफी तेज होती है।
टर्बुलेंस का सामना होने पर विमान हिलने लगता है। टर्बुलेंस तेज होने पर कई बार तो विमान अपने निर्धारित मार्ग से हट जाते हैं। यही नहीं कई बात तो ये चंद सेकेंड में सैकड़ों फीट नीचे तक आ जाते हैं। इस दौरान यात्रियों की सांसें अटकी रहती हैं। ऐसे में पायलट की सूझबूझ और अनुभव काफी काम आता है। 21 मई को श्रीनगर के लिए इंडिगो की फ्लाइट संख्या 6ई-2142 एयर टर्बुलेंस में फंस गई। ओलावृष्टि और बिजली गिरने से विमान का आगे का हिस्सा तक टूट गया। पायलट ने सूझबूझ दिखाते हुए विमान को श्रीनगर एयरपोर्ट पर लैंड कराया। इससे विमान में सवार 230 यात्रियों ने राहत की सांस ली।
टर्बुलेंस क्या है और यह क्यों होता है?
टर्बुलेंस एक तरह की अनियमित और अप्रत्याशित वायु गति है जिससे हवाई जहाज को झटके लगते हैं। यह कई कारणों से हो सकती है, जैसे तूफान, पहाड़ों के पास की हवा, और तेज़ वायुमंडलीय धाराएं जिन्हें जेट स्ट्रीम कहा जाता है। टर्बुलेंस चार तरह के होते हैं-हल्का, मध्यम, गंभीर और अत्यंत गंभीर। हल्की और मध्यम टर्बुलेंस में यात्री अपनी सीट बेल्ट से खिंचाव महसूस कर सकते हैं और केबिन में ढीली चीजें हिल सकती हैं लेकिन गंभीर या अत्यंत गंभीर मामलों में यात्री केबिन में उछल सकते हैं, जिससे गंभीर चोट या मौत तक हो सकती है।
क्लियर एयर टर्बुलेंस वह होती है जो बिना किसी तूफान या बादलों के बीच में होती है। यह आमतौर पर जेट स्ट्रीम, वायुमंडलीय दबाव, पहाड़ी क्षेत्रों की हवा, या मौसम के मोर्चों (फ्रंट्स) की वजह से होती है और इसे रडार पर देख पाना मुश्किल होता है। फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से 2021 के बीच 30 यात्री और 116 क्रू मेंबर्स को गंभीर चोटें आईं। सालाना लगभग 4 अरब हवाई यात्री होने के बावजूद, ये घटनाएं दुर्लभ हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग की एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले 40 वर्षों में गंभीर टर्बुलेंस में 55% की वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। विशेष रूप से नॉर्थ अटलांटिक रूट पर, 1979 से 2020 के बीच गंभीर टर्बुलेंस की कुल वार्षिक अवधि में यह वृद्धि देखी गई। अनुमान है कि आने वाले दशकों में टर्बुलेंस का समय दोगुना या तिगुना हो सकता है। यानी अगर आज एक ट्रांस-अटलांटिक फ्लाइट में 10 मिनट टर्बुलेंस होता है, तो भविष्य में यह 20-30 मिनट तक हो सकता है।
दुनिया में कई ऐसे मार्ग हैं जिन पर एयर टर्बुलेंस आते हैं। ये मार्ग हैं-सैंटियागो (चिली) से विरु विरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट (बोलीविया), अल्माटी (कज़ाख़स्तान) से बिश्केक (किर्गिजस्तान) और नैशविल (टेनेसी) से रैले/डरहम (नॉर्थ कैरोलिना)।
