UGC Guidelines: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के नियम एक बार फिर चर्चा में हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वह UGC-2026 के नियमों की पुनः समीक्षा के लिए एक विशेष समिति का गठन कर रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को बताया कि सरकार विद्यार्थियों की चिंताओं का समाधान करने के उपायों पर विचार कर रही है और साथ ही, यह सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं कि नियामक ढांचे के तहत छात्र समुदाय का कोई भी वर्ग खुद को उपेक्षित, असुरक्षित या आशंकित महसूस न करे। प्रधान न्यायाधीश ने प्रत्येक विद्यार्थी के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया और याचिकाओं पर सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। समझा जाता है कि शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में सरकार गाइडलाइन में बदलाव कर सकती है।
सरकार की यूजीसी गाइडलाइन क्या है?
यह मामला यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा) विनियम, 2026 का है। सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला मामले की सुनवाई में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए नियम बनाने का निर्देश दिया था। उसी के बाद यूजीसी एक्ट में संशोधन हुआ और आयोग ने 13 जनवरी को नए नियम जारी किए। इनसे पहले 2012 के नियम लागू थे। इन नियमों के मुख्य प्रावधान ये हैं:- हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र और समता समिति बनाना अनिवार्य है।
- ये इकाइयां वंचित समूहों के लिए नीतियां लागू करती हैं और भेदभाव की शिकायतों की जांच करती हैं।
- समानता हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं भी इसी ढांचे का हिस्सा हैं।
- सीधे शब्दों में, यह कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाया गया संस्थागत शिकायत-निवारण तंत्र है।
गाइडलाइन पर विवाद क्या है?
विवाद की जड़ भेदभाव की परिभाषा है। नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में SC, ST और OBC को शामिल किया गया। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि उन्हें समान सुरक्षा नहीं मिली। आलोचकों का तर्क है कि इससे यह संदेश जाता है कि जातिगत भेदभाव सिर्फ इन्हीं वर्गों के साथ होता है। याचिकाओं में कहा गया कि सामान्य श्रेणी के छात्र इस शिकायत-निवारण व्यवस्था में शिकायत नहीं कर सकते।समिति की बनावट और दुरुपयोग की आशंका: एक याचिका में 'जाति आधारित भेदभाव' की परिभाषा के साथ इक्विटी कमेटियों की संरचना पर भी सवाल उठाया गया है। कोर्ट ने भी पहली नजर में नियमों को अस्पष्ट और दुरुपयोग योग्य माना।
राजनीतिक और सामाजिक असर: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने इन नियमों के विरोध में इस्तीफा दिया। रिपोर्टों के अनुसार इन नियमों पर भाजपा के भीतर भी असंतोष बढ़ा है। दूसरी ओर, भेदभाव-विरोधी ढांचे की मांग रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों से आई थी। यानी असली सवाल यह है कि कमजोर वर्गों की सुरक्षा और सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार के बीच संतुलन कैसे बने।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और सरकार का पक्ष
29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगला फैसला आने तक 2012 के नियम लागू रहेंगे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया कि सरकार समीक्षा के लिए समिति बनाने पर विचार कर रही है। उनका कहना था कि सरकार चाहती है कि हर छात्र का ध्यान रखा जाए और किसी को आशंका या असंतोष न रहे। पीठ ने साफ कहा कि नियम ऐसे हों जो आने वाली पीढ़ियों के हित को ध्यान में रखकर हर छात्र के अधिकारों की रक्षा करें। कोर्ट ने जाति-आधारित भेदभाव और रैगिंग से निपटने के प्रभावी उपायों पर भी जोर दिया। मामले की सुनवाई चार हफ्ते के लिए टल गई।
ध्यान देने की बात है कि सरकार ने अगस्त 2026 में भी पुनर्विचार की बात कही थी। यानी समीक्षा का संकेत पहले से था, और अब वह समिति के रूप में सामने आ रहा है।
समिति क्या करेगी?
अभी तक समिति का गठन नहीं हुआ है। सरकार ने सिर्फ 'विचार' की बात कही है। रिपोर्टों में इसके सदस्यों, कार्यक्षेत्र या समय-सीमा का कोई ब्योरा नहीं है।
समिति के ये हो सकते हैं संभावित काम
- भेदभाव की परिभाषा की समीक्षा, ताकि वह सभी छात्रों को कवर करे।
- शिकायत-निवारण व्यवस्था की जांच, ताकि किसी वर्ग को बाहर न रखा जाए।
- समता समितियों की बनावट पर विचार।
- झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ सुरक्षा उपाय।
- रैगिंग और जातिगत उत्पीड़न रोकने के असरदार तरीके, जिन पर कोर्ट ने जोर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि समिति में किसका प्रतिनिधित्व है। संविधानविदों, शिक्षाविदों, छात्र-प्रतिनिधियों और वंचित समुदायों की भागीदारी से ही उसकी सिफारिशों की विश्वसनीयता बनेगी।
क्या सरकार गाइडलाइन में सुधार करेगी?
सरकार ने कोर्ट में समीक्षा की मंशा जताई है। अगस्त में भी यही बात कही गई थी। कोर्ट ने खुद सरकार को नई समिति बनाने का सुझाव दिया था। नियम फिलहाल स्थगित हैं, इसलिए बदलाव के बिना उन्हें लागू करना कानूनी रूप से मुश्किल होगा। अगर परिभाषा बहुत व्यापक हुई, तो SC/ST/OBC छात्रों को लगेगा कि उनकी विशेष सुरक्षा कमजोर हुई। अगर सीमित रही, तो सामान्य वर्ग का विरोध जारी रहेगा। रिपोर्टों के अनुसार विवाद नौ महीने से चल रहा है। समिति बनाने, रिपोर्ट आने और नई अधिसूचना में काफी समय लग सकता है। अंतरिम व्यवस्था: तब तक 2012 के नियम ही चलेंगे, जो अपेक्षाकृत कमजोर माने जाते हैं। सुधार की संभावना मजबूत है, पर उसका स्वरूप और समय अभी तय नहीं। अगली सुनवाई (करीब चार हफ्ते बाद) में यह साफ होगा कि समिति बनी या नहीं, और उसका कार्यक्षेत्र क्या है। यह पूरा मामला दिखाता है कि समानता की नीति में 'सुरक्षा' और 'निष्पक्षता' को एक साथ साधना कितना कठिन है।