भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहां लोकतंत्र की जो परिभाषा तय की गई थी, उसी के अनुसार चुनाव होते हैं और फिर जनता द्वारा चुनी गई सरकार, शासन करती है, वो भी सिर्फ पांच साल के लिए और बहुमत रहने पर, अन्यथा, सत्ता से बाहर। आजादी के बाद से इमरजेंसी को छोड़ दें, तो ऐसा ही होता रहा है। हालांकि हाल के सालों में विपक्ष से लेकर इंटरनेशनल संस्थाओं ने भारतीय लोकतंत्र पर सवाल उठाया है, चुनाव और चुनावी प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है। अब एक रिपोर्ट (V-Dem Democracy Report 2026) आई है, जिसमें भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ कहा जा रहा है, भारत के लोकतंत्र पर डेटा के साथ सवाल उठा जा रहे हैं। आइए समझते है कि वो रिपोर्ट क्या है? रिपोर्ट का आधार क्या है और आपातकाल का क्या कनेक्शन है?
किसकी है रिपोर्ट और क्या है इसमें?
यह रिपोर्ट स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग से जुड़े V-Dem Institute की है। इसकी नई रिपोर्ट (V-Dem Democracy Report 2026) ने भारत की लोकतांत्रिक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस रिपोर्ट के ‘Unraveling The Democratic Era’ में भारत को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ की श्रेणी में रखा गया है। 2025 के लिए भारत का Electoral Democracy Index स्कोर 0.38 रहा और वह 179 देशों में 106वें स्थान पर रहा। वहीं Liberal Democracy Index में भारत 105वें स्थान पर रहा, जिसका स्कोर 0.26 है।
इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी का मतलब क्या है?
अब आते हैं इस रिपोर्ट के पहले सवाल पर। आखिर इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी का मतलब क्या है? इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी यानी कि चुनावी तानाशाही राजनीति विज्ञान की एक ऐसी अवधारणा है, जहां कोई देश कागजों पर या ऊपरी तौर पर 'लोकतंत्र' दिखता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से वहां 'तानाशाही' या एकछत्र राज चल रहा होता है।
तो क्या भारत में भी ऐसा ही है? जवाब है नहीं, भारत में न केवल चुनाव होते हैं बल्कि लोकतंत्र भी बरकरार है। तो फिर ये रिपोर्ट? V-Dem के आकलन के मुताबिक लोकतंत्र के दूसरे जरूरी हिस्सों-जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र मीडिया, विपक्ष की स्वतंत्रता, नागरिक समाज और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता- में पर्याप्त कमी हो सकती है। यानी आसान भाषा में कहें तो-चुनाव लोकतंत्र की जरूरी शर्त है, लेकिन सिर्फ चुनाव होने से कोई व्यवस्था पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं हो जाती। V-Dem लोकतंत्र को सिर्फ मतदान तक सीमित करके नहीं देखता, बल्कि कई संस्थागत और नागरिक स्वतंत्रताओं को भी अपने आकलन में शामिल करता है।
मतदान करने के लिए कतार में खड़े लोग (फाइल फोटो- PTI)
रिपोर्ट में कहां खड़ा है भारत?
V-Dem के 2026 रिपोर्ट में 2025 के आंकड़ों के आधार पर भारत का Electoral Democracy Index 0.38 है। रिपोर्ट ने भारत को कजाखस्तान और पाकिस्तान के साथ ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ श्रेणी में रखा है।
यहां यह समझना जरूरी है कि रैंकिंग और श्रेणी V-Dem के अपने लोकतांत्रिक सूचकांकों और पद्धति पर आधारित हैं। इसे सीधे तौर पर किसी देश के संविधान में दर्ज राजनीतिक व्यवस्था की आधिकारिक श्रेणी नहीं माना जाना चाहिए।
V-Dem किन चीजों को देखता है?
V-Dem यानी Varieties of Democracy लोकतंत्र को कई अलग-अलग पहलुओं से मापने की कोशिश करता है। इसमें चुनाव के अलावा यह भी देखा जाता है कि
- चुनाव कितने स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं?
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति क्या है?
- मीडिया कितना स्वतंत्र है?
- विपक्ष को कितनी राजनीतिक जगह मिलती है?
- नागरिक समाज कितना स्वतंत्र है?
- सरकार पर संस्थागत नियंत्रण और जवाबदेही कितनी है?
- कानून और संस्थाएं किस तरह काम कर रही हैं?
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ‘वोट डालने का अधिकार है या नहीं?’ सवाल यह भी है कि ‘वोट डालने और राजनीतिक भागीदारी के लिए लोकतांत्रिक माहौल कितना स्वतंत्र है?’
भारत के बारे में ये राय नई नहीं
भारत को V-Dem ने पहली बार इस साल ही ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ नहीं कहा, बल्कि इससे पहले V-Dem ने 2018 में भारत को इस श्रेणी में डाउनग्रेड किया था। 2024 की रिपोर्ट में भी भारत की लोकतांत्रिक स्थिति को लेकर चिंता जताई गई थी। उस रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष चुनाव और नागरिक समाज जैसे क्षेत्रों में गिरावट को लेकर बात की गई थी। यानी V-Dem के आकलन में भारत की लोकतांत्रिक स्थिति को लेकर चिंता कई वर्षों से जारी है।
क्या इसका मतलब भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया?
इसका एक शब्द में जवाब है, नहीं। भारत के संदर्भ में अंतर समझना जरूरी है। भारत में न केवल चुनाव होते हैं, बल्कि कई राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, प्रचार करते हैं, मतदाता सरकार चुनते हैं और सत्ता का चुनावी हस्तांतरण भी होता है। सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी होता है और सरकार झुकती भी है। यहां जनता और विपक्ष की मांगे सुनी भी जाती है और मानी भी जाती है। तीन कृषि कानून से लेकर नीट पेपर लीक तक पर के आंदोलनों की जीत, इसका सबसे बड़े उदाहरण हैं।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जश्न मनाते आंदोलनकारी (फोटो- PTI)
V-Dem का आकलन मुख्य रूप से यह सवाल उठाता है कि चुनाव होने के बावजूद लोकतंत्र के दूसरे संस्थागत आधार कितने मजबूत हैं। इसलिए ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ को ‘तानाशाही’ या ‘चुनाव रहित व्यवस्था’ का सीधा पर्याय समझना सही नहीं होगा।
आपातकाल का जिक्र क्यों?
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 1975 का आपातकाल एक महत्वपूर्ण घटना है। जब सही मायने में लोकतंत्र का खत्म कर दिया गया था। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया था। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक चला। इस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थाओं पर गंभीर प्रतिबंध लगे। विपक्ष के नेताओं को डेल में डाल दिया गया था। प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई थी। सरकार की आलोचना करने वाले कई प्रकाशनों पर कार्रवाई हुई और समाचार प्रकाशित करने से पहले सरकारी नियंत्रण बढ़ गया। आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन अभियान बेहद आक्रामक तरीके से चलाया गया। संजय गांधी इस अभियान के प्रमुख चेहरों में थे। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संविधान संशोधन किया। इसमें संविधान में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए। इसकी व्यापकता के कारण इसे अक्सर ‘मिनी संविधान’ कहा जाता है।
तो क्या आज की स्थिति 1975 जैसी है?
ऐसा कहना बिलकुल सही नहीं होगा। 1975-77 का आपातकाल एक औपचारिक संवैधानिक आपातकाल था, जिसमें नागरिक स्वतंत्रताओं पर स्पष्ट और व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे। आज की स्थिति को V-Dem एक अलग तरीके से देखता है। उसका आकलन यह जांचता है कि लोकतंत्र की संस्थाएं और नागरिक स्वतंत्रताएं समय के साथ किस दिशा में जा रही हैं।
भारत के लिए V-Dem की रिपोर्ट को न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही इसे इस निष्कर्ष के तौर पर देखा जा सकता है कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो चुका है। असल बहस इससे आगे की है। क्या भारत का लोकतंत्र सिर्फ चुनावों के स्तर पर मजबूत है या उसकी संस्थाएं, स्वतंत्र मीडिया, नागरिक अधिकार, विपक्ष और जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत है?
