US Iran Peace Deal: शुक्रवार को दुनिया भर की निगाहें व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम पर टिकी थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शीर्ष रणनीतिकारों और सिपहसालारों के साथ एक बेहद अहम मुलाकात की, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल बैठक में क्या फैसले हुए, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी दुनिया के सामने नहीं आ सकी है।
अमेरिका ने युद्धविराम की अवधि बढ़ाने और होर्मुज को लेकर अब तक कोई फैसला नहीं लिया है। AI IMAGE
इससे ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर बेहद आक्रामक पोस्ट लिखी थी। ट्रंप ने कहा था कि ईरान के यूरेनियम को अमेरिका खोदकर निकालेगा। ईरान को हर हाल में इस बात पर सहमत होना होगा कि वह भविष्य में कभी भी कोई परमाणु हथियार या बम नहीं बनाएगा।
हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच सिर्फ यूरेनियम ही इकलौता विवाद नहीं है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक गतिरोध और महायुद्ध की आशंका के पीछे 5 ऐसे मुख्य कारण हैं, जिन्होंने शांति समझौते की राह रोक रखी है। आइए इन्हें सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
Donald Trump
1. यूरेनियम का सिंडिकेट
अमेरिका की पहली और सबसे बड़ी शर्त है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने का अपना सपना हमेशा के लिए छोड़ दे और अपने पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) का पूरा स्टॉक सरेंडर करे। अमेरिका चाहता है कि इस यूरेनियम को रूस या किसी तीसरे देश में ट्रांसफर कर दिया जाए।
ईरान का रुख इस पर बिल्कुल साफ है। वह यूरेनियम की शुद्धता या तीव्रता (Dilute) को कम करने के लिए तो तैयार है, लेकिन अपने स्टॉक को देश से बाहर किसी भी कीमत पर नहीं भेजेगा। इसके अलावा, अमेरिका यूरेनियम संवर्धन पर 20 साल का प्रतिबंध चाहता है, जबकि ईरान इसे सिर्फ 5 साल तक सीमित रखने की बात कह रहा है।
2. हॉर्मुज पर किसका हुकुम?
दूसरा सबसे बड़ा विवाद दुनिया की सबसे संवेदनशील समुद्री नस यानी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। अमेरिका की मांग है कि ईरान इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ते से अपनी समुद्री बारूदी सुरंगें तुरंत हटाए और इसे पहले की तरह पूरी तरह मुक्त करे।
ईरान अब युद्ध से पहले वाली स्थिति में लौटने को तैयार नहीं है। उसका तर्क है कि हॉर्मुज जलमार्ग पर उसका संप्रभु अधिकार है। ईरान अब वहां से गुजरने वाले जहाजों से 'नेविगेशनल फीस' वसूलना चाहता है और ओमान के साथ मिलकर इस पूरे रूट को खुद मॉनिटर करना चाहता है, जो अमेरिका को बिल्कुल मंजूर नहीं है।
3. कतर में फंसे 12 अरब डॉलर
यह पूरा विवाद पैसे के लेनदेन पर भी अटका है। ईरान के 12 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) कतर के बैंकों में फ्रीज (जब्त) पड़े हैं। ईरान की सीधी शर्त है कि जैसे ही वह युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर करेगा, अमेरिका को ये पैसे तुरंत रिलीज करने होंगे और उसके ऊपर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे।
अमेरिकी संसद (Congress) और खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इसका भारी विरोध हो रहा है। अमेरिकी कूटनीतिज्ञों का मानना है कि अगर ईरान को इतनी बड़ी रकम तुरंत मिल गई, तो वह इसका इस्तेमाल मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने वाले अपने प्रॉक्सी ग्रुप्स की फंडिंग में करेगा। इस घरेलू राजनीतिक दबाव के कारण ट्रंप पीछे हट रहे हैं।
4. हिजबुल्लाह बनाम इजरायल का फ्रंट
चौथा सबसे बड़ा रोड़ा लेबनान और इजरायल के बीच चल रही सीधी जंग है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक लेबनान में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच पूर्ण युद्धविराम नहीं हो जाता, तब तक वे अमेरिका के साथ किसी भी समझौते पर दस्तखत नहीं करेंगे।
दूसरी तरफ, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पीस डील के सख्त खिलाफ हैं। इजरायल का मानना है कि अमेरिका इस समझौते के जरिए ईरान को बहुत आसानी से 'सेफ एग्जिट' दे रहा है, जबकि इस वक्त ईरान को पूरी तरह घुटनों पर लाया जाना चाहिए था। यही वजह है कि इजरायल लगातार लेबनान में हमले तेज कर रहा है ताकि यह डील पूरी ही न हो सके।
5. अब्राहम समझौता (The Abraham Accord)
हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर एक और पोस्ट शेयर की थी, जिसने आग में घी का काम किया। ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे बड़े मुस्लिम देशों के लिए अब्राहम समझौते (Abraham Accords) पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य बताने की बात कही है। ट्रंप इसे तेहरान के साथ जारी गुप्त वार्ताओं के बीच एक 'महासमझौते' के रूप में देख रहे हैं।
ईरान ने अमेरिका के इस एकतरफा फैसले की कड़ी निंदा की है। ईरान का कहना है कि पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में वास्तविक स्थिरता बाहरी ताकतों के दबाव से निर्मित नहीं की जा सकती। सुरक्षा तभी सुनिश्चित होगी जब वहां की क्षेत्रीय सरकारें आपस में सहयोग करेंगी। ईरान ने इस अमेरिकी नीति को शांति के बजाय केवल एक 'दिखावे का प्रोजेक्ट' करार दिया है।
कुल मिलाकर ईरान और अमेरिका शांति वार्ता न होने की सबसे बड़ी वजह भरोसा है। जब तक ट्रंप, ईरान को भरोसा नहीं जीत जाते तब तक अमेरिका के किसी भी समझौते पर ईरान सहमत नहीं हो सकता। ईरान आज भी साल 2018 के वाकये को नहीं भूला है जब ट्रंप ने पिछले परमाणु समझौते (JCPOA) को एक झटके में रद्द कर दिया था। ऐसे में जब तक अमेरिका ईरान का भरोसा नहीं जीत लेता, तब तक मिडिल ईस्ट में किसी स्थायी शांति समझौते पर सहमति बनना बेहद मुश्किल है।
