अस्थिरता से घिरे बांग्लादेश में अंतरिम सरकार और सेना प्रमुख आमने सामने है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के हालात देखकर बांग्लादेशी सेना प्रमुख वकर-उज़-ज़मान जम्हूरी कवायदों को लेकर काफी संजीदा हो गए। यही वजह है कि उनकी कई मुद्दों को लेकर अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से ठनी हुई है। दोनों के बीच उभरे मतभेद साफ दिखायी दे रहे है। वकर-उज़-ज़मान कई मौकों पर मौजूदा बांग्लादेशी सरकार से आवामी इंतिखाब (आम चुनाव) की तारीखों का ऐलान करने मांग कर चुके है।
मोहम्मद यूनुस
इन सबको दरकिनार करते हुए मोहम्मद यूनुस चुनावों को लेकर ठुलमुल रवैया अख्तियार किए बैठे है, उन्होंने साफ किया है कि वो जून 2026 तक चुनाव करवायेगें। वो ये अच्छे से जानते है कि जब तक ढ़ाका के सत्ता सदन को स्थायी सरकार नहीं मिल जाती उन्हें सत्ता की मलाई काटने का मौका मिलता रहेगा।
सुलगी असहमति की चिंगारियां
शेख हसीना के निर्वासन की पटकथा लिखने वाली नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) का मानना है कि वकर-उज़-ज़मान को अपने साथ रखने के लिए यूनुस राजी नहीं थे, अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार का मानना था कि ज़मान में कुव्वत नहीं है, उनकी कथित उदारवादी छवि और सुधारवादी नज़रिए के बावजूद वो इस ओहदे के लिए ठीक नहीं है। दूसरी ओर जिस तरह से नई दिल्ली ने पाक आर्मी सुप्रीमो मुनीर (फिलहाल फील्ड मार्शल) का हश्र किया, उसे देखकर एनसीपी वकर-उज़-ज़मान की काबिलियत पर सवालिया निशान लगाने लगी है। बांग्लादेश में अंदरखाने अंतरिम सरकार और सेना के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है।
फिलहाल जुबानी बातों से माहौल गर्म है। बांग्लादेशी सेना ने प्रमुख ने कई मौकों पर घुमा फिराकर कहा है कि उनका मुल्क मोहम्मद यूनुस के हाथों महफ़ूज नहीं है। उनका मानना है कि सरकार गबन तो कर ही रही है साथ ही में वो सैन्य मामलों में नाजायज दखल भी दे रही है। इन्हीं तथ्यों की बुनियाद पर वो दावा करते है कि ना चाहते हुए उन्हें मुल्क के सियासी गलियारे में अपनी मौजूदगी दर्ज करवानी पड़ सकती है। मज़बूरी में वो सेना को नागरिक इलाकों की ओर मोबाइलाइज करने से परहेज नहीं करेगें। ऐसे में कथित तौर पर सैन्य तख्तपलट की संभावनाओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
संभावित चुनावों में आवामी लीग की ‘नो एंट्री’
भले ही मोहम्मद यूनुस की ओर से आम चुनावों का पुख्ता ऐलान ना किया गया हो लेकिन बांग्लादेश चुनाव आयोग ने पहले से ही साफ कर दिया है कि अवामी लीग आने वाले चुनावों में नहीं उतर सकेगी। इसी महीने के दूसरे हफ्ते के दौरान आवामी लीग की सभी तरह की पॉलिटिकल गतिविधियों पर रोक लगी दी गयी। ये बंदिशें सड़क से लेकर वेब तक पर लागू की गयी।
आर्मी चीफ जमान चाहते है कि आगामी चुनाव एकतरफा खालिदा जिया के पक्ष में ना चला जाये, इसलिए वो चुनावों को जनवादी-समावेशी तरीके से करवाने की पैरवी करते है। साफ है कि वो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सामने आवामी लीग का खड़ा करना चाहते है। ऐसे में यूनुस खेमे के कट्टरपंथियों को सेना प्रमुख की ये सोच नहीं भा रही है। मौका मिलते ही ये जमात वकर-उज़-ज़मान के खिलाफ लामबंद हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो हिंसा और गृहयुद्ध का भड़कना तय है।
बाहरी दखल के खिलाफ ज़मान
सेना प्रमुख ज़मान ये कतई भी नहीं चाहते कि उनके देश में बाहरी विदेशी ताकतें (खासतौर से पाकिस्तान) दखल दे। इसी मुद्दे पर हाल ही में उन्होनें अपने सिपहसालारों के साथ एक मीटिंग में रायशुमारी की। उस दौरान उन्होंने जोर दिया कि इस साल में आखिर (दिसंबर 2025) में आम चुनाव संपन्न करवा लिए जाए। साथ ही उन्होंने आगामी चुनावों में सभी पार्टियों की सक्रिय भागीदारी की भी उम्मीद जतायी।
ज़मान की इन कवायदों के यहीं मायने है कि यूनुस सरकार की अगुवाई में विदेशी ताकतें उनके मुल्क में पांव पसार सकती है। जिसे वक्त रहते रोके जाना जरूरी है और इसका एक ही उपाय है बैलेट बॉक्स। इसी खींचतान के चलते दोनों दिग्गज़ों के बीच दरार गहरी होती दिख रही है। जिस तरह से मोहम्मद यूनुस ने जशीम उद्दीन को विदेश मंत्रालय से बाहर का रास्ता दिखाया और मनमाने ढंग से खलीलुर रहमान को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया उससे ये चिंगारी शोले में तब्दील हो गयी।
मनमाने ढंग से शासन चलाते यूनुस
ज़मान की गैरमौजूदगी और रजामंदी के बगैर यूनुस ने आनन-फानन में खलीलुर रहमान को एनएसए बना दिया। कायदे से इस ओहदे को दिए जाने पहले अंतरिम सरकार के मुखिया को सेना प्रमुख से रायशुमारी करनी चाहिए थी। ऐसा ना करके यूनुस ने सेना के भीतर अर्न्तविरोधों को और ज्यादा बढ़ा दिया। गौरतलब है कि शेख हसीना के निर्वासन से पहले ही ज़मान सेना प्रमुख का ओहदा संभाल चुके थे। उन्हें तरक्की पसंद और जम्हूरी ख्यालात वाले जनरल के तौर पर देखा जाता है, जबकि क्वार्टरमास्टर जनरल रहे लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद फैजुर रहमान (फिलहाल बांग्लादेशी एनएसए) को कट्टरपंथी इस्लामिक इदारों से तालुक्क रखने वाला शख्स माना जाता है। मोहम्मद फैजुर रहमान की इस्लामाबाद से करीबियां छिपी नहीं है। सेना में रहते हुए रहमान ने मनमाने ढंग से काम किया। सेना में पैठ बनाने के लिए कई सैन्य अधिकारियों से समर्थन हासिल किया। जमात-ए-इस्लामी से मोहम्मद फैजुर रहमान की नज़दीकियां जमान का रास नहीं आती है।
फिलहाल ज़मान की पकड़ सेना पर काफी मजबूत है, वो लगातार उन्हें एकजुट किए हुए है। ज़मान ने साफ कर दिया है कि किसी भी तरह की सिविल नाफरमानी और दबाव में वो नहीं आने वाले। जब शेख हसीना का निर्वासन हुआ तो ज़मान ने मोहम्मद यूनुस के पर्दापण का खुलकर इस्तकबाल किया था, लेकिन बढ़ती बाहरी ताकतें के दखल को देखते हुए आवामी इंतिखाब की फौरी मांग ही वो बड़ा पेंच है, जिस पर ज़मान और यूनुस एक दूसरे के सामने आ खड़े हुए है।
राखाइन गलियारा बना विवाद की दूसरी जड़
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित राखाइन मानवीय गलियारा वो दूसरा अहम बिंदु है, जो दोनों की टकराहट बढ़ा रहा है। यूनुस को लगता है कि म्यांमार से जुड़ी इस परियोजना पर काम करके रोहिंग्या शरणार्थियों से उपजी समस्या कम की जा सकेगी लेकिन जनरल ज़मान ने इसे खूनी गलियारा करार दे चुके है। प्रस्तावित परियोजना वाले इलाके में अराकान विद्रोहियों का वर्चस्व है, जिससे ज़मान बेवज़ह उलझना नहीं चाहते है। उनका मानना है कि अगर इस गलियारों को बनाया गया तो म्यांमार गृहयुद्ध की लपटें सीधे बांग्लादेश में दाखिल होगीं। सेना कयास लगा रही है कि अराकान विद्रोही इस गलियारे का फायदा उठाकर जुंटा के खिलाफ अपनी सामरिक पकड़ मजबूत कर सकते है। म्यांमार विद्रोही गुट के नेता मेजर जनरल ट्वान मराट नाइंग और ब्रिगेडियर जनरल न्यो ट्वान आंग इस प्रस्तावित गलियारे से काफी उम्मीदें पाले बैठे है। कुछ ऐसा ही समीकरण चट्टगांव बंदरगाह के न्यू मूरिंग कंटेनर टर्मिनल का है, जिसे लेकर यूनुस और ज़मान के बीच तनातनी है।
नई दिल्ली को बढ़ानी होगी कूटनीतिक मुस्तैदी
इसके अलावा कई और मुद्दों पर यूनुस और ज़मान के बीच असहमतियां है। बांग्लादेशी सेना प्रमुख सत्ता की बागडोर काबिल हाथों में सौंपने की दिलचस्पी नहीं दिखा रहे है। फिलहाल सेना ढ़ाका के सत्ता सदन में नहीं घुसेगी। उसकी प्राथमिकता चुनाव कराने और देश में स्थिरता बनाए रखने की है। जिस तरह कई शंति मिशनों में बांग्लादेशी सेना ने शानदार काम किया, उससे उसकी छवि चमकी है। अंतरिम सरकार भंग करते हुए तख्तापलट करके वो अपने हाथ काले नहीं करना चाहेगी। अगर दोनों के बीच तल्खियां बढ़ी तो नई दिल्ली को बांग्लादेश से लगती 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा पर मुस्तैदी बढ़ानी होगी।
राखाइन प्रांत को लेकर दोनों की बढ़ती खींचतान से रोहिंग्या शरणार्थियों की आवाक भारत में बढ़ेगी। इससे जनसांख्यिकीय असंतुलन बढ़ेगा, जिससे कि क्षेत्रीय असंतोष बढ़ना तय है। बांग्लादेशी एनएसए जनरल फैजुर रहमान की शह पर जमात-ए-इस्लामी और ISI भारत में अपनी खूनी कवायदों को बढ़ा सकते है। ऐसे में नई दिल्ली को ढ़ाका की ओर से आने वाले संकेतों पर नज़र बनाये रखनी होगी। मोदी सरकार को कूटनीतिक संतुलन कायम रखते हुए दोनों ही हितधारकों (मोहम्मद यूनुस और वकर-उज़-ज़मान) से संवाद को बनाए रखना होगा ताकि देश की पूर्वी सीमा पर क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
डिस्क्लेमर: इस लेख के लेखक राम अजोर जो वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं और लेख में व्यक्ति विचार उनके निजी है जिसके लिए टाइम्स नाउ नवभारत उत्तरदायी नहीं है।)
