सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह अस्पताल ले गई पुलिस।
भारतीय कानून के तहत फोर्स-फीडिंग पूरी तरह वैध नहीं।
Sonam Wangchuk: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सोनम वांगचुक अनशन पर हैं। शनिवार को पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई। इसके बाद कॉकरोच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अनशन की शुरुआत कर दी है। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल ने देशभर में एक नई कानूनी और संवैधानिक बहस छेड़ दी है। लगातार 21 दिनों तक अनशन करने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई, लेकिन उन्होंने अस्पताल में भी अपना उपवास जारी रखा।
इसके बाद सवाल उठने लगा कि अगर किसी व्यक्ति की जान खतरे में हो, तो क्या सरकार या डॉक्टर उसे उसकी इच्छा के खिलाफ जबरन खाना खिला सकते हैं या इलाज दे सकते हैं? इसका जवाब सीधा नहीं है, क्योंकि यह मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है।
भूख हड़ताल करना गैर-कानूनी नहीं
दरअसल, भारत में भूख हड़ताल करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। इसी अधिकार के तहत वर्षों से कई सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में भूख हड़ताल लोकतांत्रिक विरोध का एक प्रभावी माध्यम रही है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और यदि किसी प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था या सार्वजनिक सुरक्षा प्रभावित होती है, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं सोनम वांगचुक। PTI
फोर्स-फीडिंग पर क्या है कानून?
फोर्स-फीडिंग यानी किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध खाना या पोषण देना भारत में किसी स्पष्ट कानून के तहत अनिवार्य या पूरी तरह वैध नहीं है। दूसरी ओर संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
यही अनुच्छेद राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह नागरिक की जान बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। ऐसे में अदालतों और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता और जीवन बचाने के राज्य के दायित्व के बीच संतुलन बनाने की होती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा है?
सोनम वांगचुक के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिली। उनकी बिगड़ती सेहत को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। अदालत ने कहा कि यदि डॉक्टरों की मेडिकल राय में उनकी जान को गंभीर खतरा है, तो प्रशासन आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठा सकता है। इसके बाद पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई। हालांकि वांगचुक ने अस्पताल में भी अपना अनशन जारी रखा और समर्थकों के अनुसार उन्होंने IV फ्लूइड या अन्य पोषण लेने से इनकार किया।
मेडिकल एथिक्स के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम है और अपने फैसले स्वयं लेने की स्थिति में है, तो सामान्य परिस्थितियों में डॉक्टर उसकी इच्छा के खिलाफ इलाज नहीं कर सकते, लेकिन यदि मरीज बेहोश हो जाए, निर्णय लेने की क्षमता खो दे या उसकी जान तत्काल खतरे में हो, तो डॉक्टर जीवन बचाने के उद्देश्य से चिकित्सकीय हस्तक्षेप कर सकते हैं। इसलिए भूख हड़ताल के मामलों में डॉक्टर लगातार मरीज की स्थिति की निगरानी करते हैं और हर निर्णय उसकी मेडिकल स्थिति के आधार पर लिया जाता है।
भूख हड़ताल से जुड़े कुछ यादगार किस्से। AI IMAGE
भूख हड़ताल से जुड़े चर्चित किस्से
भारत में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (AFSPA) के विरोध में लगभग 16 वर्षों तक भूख हड़ताल की थी। उस दौरान सरकार ने कई बार उन्हें हिरासत में लेकर नाक के जरिए तरल पोषण दिया था। वहीं, 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान भी सरकार उनके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रख रही थी, लेकिन बातचीत के जरिए आंदोलन समाप्त हो गया और जबरन पोषण देने की नौबत नहीं आई।
पढ़ें महात्मा गांधी ने कब-कब किए भूख हड़ताल। AI IMAGE
क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है। विश्व चिकित्सा संघ (World Medical Association) की माल्टा घोषणा (Malta Declaration) कहती है कि यदि कोई मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति पूरी जानकारी के साथ भूख हड़ताल कर रहा है और इलाज या भोजन लेने से इनकार करता है, तो सामान्यतः उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि यदि उसकी निर्णय क्षमता खत्म हो जाए या उसकी जान तत्काल खतरे में हो, तो डॉक्टर जीवन बचाने के लिए आवश्यक हस्तक्षेप कर सकते हैं।
सोनम वांगचुक का मामला केवल एक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल भी खड़ा करता है। एक ओर नागरिक का अपने शरीर और निर्णय पर अधिकार है, तो दूसरी ओर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी नागरिक की जान बचाए।
मोटे तौर पर समझें तो भारत में ऐसा कोई स्पष्ट कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल के मामले में फोर्स-फीडिंग को अनिवार्य या पूरी तरह अवैध घोषित करता हो। ऐसे मामलों में फैसला व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, डॉक्टरों की राय, अदालत के निर्देश और परिस्थितियों के आधार पर लिया जाता है। यही वजह है कि सोनम वांगचुक का मामला आने वाले समय में भूख हड़ताल, मानवाधिकार और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़े कानूनी विमर्श का एक अहम उदाहरण माना जा सकता है।
