राजस्थान की राजनीति में स्थानीय शासन की दिशा तय करने वाले 309 नगरीय निकायों (Urban Local Bodies) के चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं। 10,244 वार्डों के लिए हुए इस महामुकाबले ने राज्य के शहरी इलाकों के सियासी मानचित्र को पूरी तरह से फिर से सामने ला दिया है। एक तरफ जहां राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन करते हुए कुल वार्डों और प्रमुख नगर निगमों में बढ़त बनाई है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कई अप्रत्याशित सीटें जीतकर और दिग्गज नेताओं के गृह क्षेत्रों में सेंध लगाकर भाजपा के लिए बड़ी चुनौती पेश की है। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन किसी भी राष्ट्रीय दल की तुलना में राज्य के 177 निकायों के लिए निर्णायक साबित हुआ है। राजस्थान निकाय चुनाव ने किस तरह शहरी सत्ता का नक्शा बदला है और नतीजों के सियासी मायने क्या हैं, समझने की कोशिश करते हैं।
किस पार्टी के खाते में क्या आया?
राज्य निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 10,244 घोषित वार्डों में से विभिन्न राजनीतिक दलों और निर्दलीयों की स्थिति इस प्रकार रही है।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP)
- कांग्रेस
- 3,613 वार्ड (राज्य के 46 नगरीय निकायों में स्पष्ट बहुमत)
- निर्दलीय उम्मीदवार: 2,273 वार्ड (177 निकायों में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण किंगमेकर की भूमिका में)
- इसके अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) को 63, आम आदमी पार्टी (AAP) को 42, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) को 38, बहुजन समाज पार्टी (BSP) को 19 और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) को 8 वार्डों में जीत हासिल हुई।
10 बड़े नगर निगमों का पूरा लेखा-जोखा
राज्य के 10 प्रमुख बड़े शहरों में जहां नगर निगम के चुनाव आयोजित हुए थे, वहां कांटे की टक्कर देखी गई। राजस्थान में हुए नगरीय निकाय चुनाव के तहत 10 नगर निगमों के रिजल्ट घोषित कर दिए गए। इनमें छह पर बीजेपी, तीन पर कांग्रेस और एक सीट अन्य के खाते में गई है। राज्य में जिन 309 नगरीय निकायों चुनाव हुए थे जिनमें 10 नगर निगम, 47 नगर परिषद और 200 से अधिक नगरपालिकाएं शामिल थीं।
राजस्थान स्थानीय चुनाव नतीजे
दिग्गज नेताओं के गढ़ में बड़ा उलटफेर
इन चुनावों की सबसे ज्यादा चर्चा दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में आए चौंकाने वाले नतीजों की हो रही है। अजमेर में भाजपा का 36 साल पुराना किला ध्वस्त हो गया। ऐतिहासिक रूप से अजमेर नगर निगम भाजपा का अजेय गढ़ माना जाता रहा है। पिछले 36 वर्षों से यहां भाजपा जीतती आ रही थी। लेकिन इस बार कांग्रेस ने 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जबकि भाजपा 32 सीटों पर सिमट गई।
वसुंधरा राजे का गढ़ (झालावाड़ व झालरापाटन)
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने जबरदस्त सेंधमारी करते हुए 29 वार्डों में जीत दर्ज की और बोर्ड बनाने का रास्ता साफ किया। हालांकि, उनके अपने विधानसभा क्षेत्र झालरापाटन नगरपालिका के 35 वार्डों में भाजपा ने 22 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व कायम रखा।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह क्षेत्र (पाली)
पाली नगर निगम में भाजपा प्रदेश प्रमुख मदन राठौड़ का घरेलू मैदान होने के बावजूद पार्टी को निराशा हाथ लगी। यहां कांग्रेस 29 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा 21 सीटों पर अटक गई।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र (भरतपुर)
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में नगर निगम का फैसला बेहद अजीब रहा। यहां 65 में से 36 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने परचम लहराया, जिसके चलते दोनों प्रमुख दल पीछे छूट गए।
अशोक गहलोत और गजेंद्र सिंह शेखावत का क्षेत्र (जोधपुर)
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के गृह क्षेत्र जोधपुर में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा, जहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही 44-44 सीटों पर आकर रुक गईं और सत्ता की कुंजी 10 निर्दलीयों के हाथों में आ गई।
बीजेपी और कांग्रेस के दावे
चुनाव परिणाम घोषित होते ही जहां सत्तारूढ़ दल ने इसे सरकार के कामकाज की सराहना बताया, वहीं विपक्ष ने इसे बदलाव का संकेत करार दिया। परिणामों पर खुशी जताते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि प्रदेश की जनता ने राज्य सरकार के सुशासन और 'विकसित भारत-विकसित राजस्थान' के संकल्प पर अपनी मुहर लगाई है। उन्होंने कहा कि शहर की जनता ने विकास की निरंतरता को चुना है। उधर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने आंकड़ों के आधार पर भाजपा के दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनावों के समय भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का जो अंतर 8 प्रतिशत के आसपास था, वह इन स्थानीय चुनावों में घटकर महज 1 प्रतिशत के करीब रह गया है। इससे साफ है कि शहरी जनता का भरोसा भाजपा से उठ रहा है और कांग्रेस मजबूती से उभर रही है।
अब आगे क्या? 21 और 22 सितंबर को तय होगी असली 'सत्ता'
309 नगरीय निकायों में से सिर्फ 132 निकायों में ही पार्टियों को स्पष्ट बहुमत मिल सका है (भाजपा-86, कांग्रेस-46)। बाकी 177 निकायों में त्रिशंकु की स्थिति बनी हुई है। अब असली राजनीतिक शह-मात का खेल इन 177 निकायों में शुरू हो चुका है। दोनों ही दल निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं। राज्य के सभी निकायों में महापौर, नगर परिषद अध्यक्ष और नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए चुनाव 21 सितंबर को कराए जाएंगे। इसके अगले ही दिन 22 सितंबर को उप-महापौर और उपाध्यक्ष पदों का निर्वाचन होगा।
विधानसभा चुनाव बनाम निकाय चुनाव का गणित
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव (2023) के रुझानों से तुलना करना जरूरी है, जो राज्य के राजनीतिक ध्रुवीकरण की एक नई तस्वीर पेश करता है। दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 200 में से 115 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, जबकि तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी 69 सीटों पर सिमट गई थी। उस समय भाजपा को करीब 41.7% और कांग्रेस को 39.5% वोट मिले थे, यानी दोनों पार्टियों के बीच मत प्रतिशत का अंतर लगभग 2.2% था।
शहरी वोट बैंक में भाजपा का दबदबा बरकरार, लेकिन मार्जिन घटा
पारंपरिक रूप से राजस्थान का शहरी मतदाता भाजपा का मजबूत कैडर माना जाता रहा है। निकाय चुनाव 2026 में भाजपा ने कुल 86 निकायों में स्पष्ट बहुमत और 4,179 वार्डों पर जीत हासिल कर अपनी इस साख को बचाए रखा है। हालांकि, विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार कांग्रेस ने शहरी निकायों में बेहद आक्रामक वापसी की है। विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने वाली कांग्रेस ने निकाय चुनावों में 46 निकायों में पूर्ण बहुमत हासिल किया है और 3,613 वार्ड जीते हैं। पार्टी ने न सिर्फ अजमेर और झालावाड़ जैसे भाजपा के पारंपरिक दुर्ग ढहा दिए हैं, बल्कि कुल वोट शेयर के अंतर को भी बेहद पाट दिया है।
राजस्थान की सियासी परंपरा
राजस्थान में हर पांच साल में राज बदलने की राजनीतिक परंपरा रही है। इसके नजर ये चुनाव परिणाम अहम हैं। निकाय चुनाव 2026 के परिणाम यह संकेत देते हैं कि जहां सरकार बनाने के बाद भाजपा अपनी पकड़ पूरी तरह ढीली नहीं होने देना चाहती, वहीं विपक्षी कांग्रेस ने अपने मजबूत जमीनी कैडर के दम पर अपनी खोई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया है। बहरहाल, स्थानीय स्तर पर क्या सियासी तस्वीर उभरकर सामने आती है, ये तो 21 और 22 सितंबर को निर्दलीयों के रुख के साथ ही यह स्पष्ट होगा। तब पचा चलेगा कि प्रदेश के शहरी तंत्र की अंतिम बागडोर किसके हाथ में होगी।
