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यूपी चुनाव में विपक्ष का 'बॉस' कौन? राहुल और अखिलेश को लेकर शुरू हुई 'ब्रांडिंग वॉर' से एकता में दरार!

2027 UP की सियासी जंग की तैयारी शुरू होते ही सवाल खड़ा हो गया है कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष का असली बॉस कौन है? राहुल गांधी या अखिलेश यादव?" दोनों पार्टियों की ओर से जारी बयानबाजी ने मामले को उलझा दिया है।

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राहुल या अखिलेश, यूपी में विपक्ष की कौन संभालेगा कमान?
Authored by: अमित कुमार मंडल
Updated Sep 23, 2026, 15:10 IST
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उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनावों की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को घेरने निकला विपक्षी 'INDIA' गठबंधन अंदरूनी वर्चस्व की जंग में उलझता दिख रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को चौंकाया था, तो लगा था कि यह जोड़ी लंबी रेस का घोड़ा है। लेकिन 2027 की सियासी जंग की तैयारी शुरू होते ही सवाल खड़ा हो गया है कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष का असली बॉस कौन है? राहुल गांधी या अखिलेश यादव?" दोनों पार्टियों की ओर से जारी बयानबाजी ने मामले को उलझा दिया है। ब्रांडिंग वॉर तेज हो गई है और श्रेय लूटने की होड़ अभी से मचने लगी है। किस तरह दोनों दलों में घमासान छिड़ा है और क्यों इंडिया गठबंधन की चिंता बढ़ गई है, विस्तार से समझते हैं।

इमरान मसूद का 'कांग्रेस बिग ब्रदर' दांव

सपा और कांग्रेस दोनों दलों के बड़े नेताओं के बीच से शुरू हुई बयानबाजी और "नेता कौन" की होड़ ने विपक्षी एकता के दावों में दरारें उजागर कर दी हैं। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने खुलकर राहुल गांधी की पैरवी की। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, देश भर में अगर कोई बीजेपी के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्षी आवाज है, तो वह सिर्फ राहुल गांधी हैं। राहुल जी की मेहनत से ही माहौल बना है, उनके बिना कुछ भी संभव नहीं है। कांग्रेस गठबंधन की 'बिग ब्रदर' है और सीटों का बंटवारा जल्द से जल्द तय हो जाना चाहिए। मसूद ने चेतावनी भी दी कि अगर गठबंधन का फैसला लटकाया गया तो जमीनी कार्यकर्ताओं को नुकसान होगा।

इकरा हसन ने अखिलेश का किया गुणगान

कैराना से सपा की युवा सांसद इकरा हसन ने कांग्रेस के इन दावों को तुरंत खारिज करते हुए अखिलेश यादव को गठबंधन का केंद्र बिंदु बताया। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, उत्तर प्रदेश में सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव ही बीजेपी को हराने में सक्षम हैं। अपने दम पर कांग्रेस अकेले यूपी में कुछ खास हासिल नहीं कर पाएगी। स्थानीय नेताओं के इन परस्पर विरोधी बयानों ने साफ कर दिया है कि नीचे जमीनी स्तर पर सपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व को लेकर बड़ा गतिरोध है।

सीट-शेयरिंग और टाइमलाइन पर फंसा पेंच

परदे के पीछे असली लड़ाई सीटों के बंटवारे और मोलभाव को लेकर है। खबरों के मुताबिक, कांग्रेस 150 से अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी जता रही है और इसे अपने नियम व शर्तों पर तय करना चाहती है। सपा का स्पष्ट मानना है कि यूपी में मुख्य लड़ाई उनकी है, इसलिए बड़ी हिस्सेदारी उनके पास ही रहेगी। इमरान मसूद समेत कांग्रेस नेता चाहते हैं कि सीट शेयरिंग तुरंत/अक्टूबर तक फाइनल हो ताकि समय पर तैयारी हो सके। अखिलेश यादव और सपा नेतृत्व गठबंधन को लेकर कोई जल्दबाजी में नहीं हैं और चुनाव करीब आने पर ही इस पर आधिकारिक बात करना चाहते हैं। कांग्रेस आलाकमान का झुकाव सपा के साथ है, लेकिन कुछ नेता बसपा या चंद्रशेखर आजाद के विकल्पों पर भी नजर गड़ाए हुए हैं।

PDA बनाम 'राहुल कार्ड'

दो अलग रणनीतियांदोनों दल जमीनी स्तर पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं, लेकिन खुद को बड़ा दिखाने में पीछे नहीं हट रहे। अखिलेश यादव 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और राज्यस्तरीय 'PDA यात्रा' के दम पर अपने काडर को एकजुट कर रहे हैं। सपा का मानना है कि 2024 में सपा को जो 37 सीटें मिली थीं, वह इस बात का सबूत है कि यूपी की जनता अखिलेश को ही मुख्य विकल्प मानती है। वहीं 2024 में 6 लोकसभा सीटें जीतने के बाद संजीवनी पाई कांग्रेस को लगता है कि राहुल गांधी का राष्ट्रीय प्रभाव और संविधान बचाओ का नैरेटिव ही बीजेपी को पीछे धकेल सकता है, इसलिए यूपी में भी कांग्रेस को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ओवैसी की एंट्री और तीसरा कोण

गठबंधन की इस रार के बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की है। कानपुर में एक रैली के दौरान ओवैसी ने कहा कि अगर बीजेपी को रोकना है तो विपक्षी दलों को एआईएमआईएम (AIMIM) के साथ हाथ मिलाना होगा। हालांकि, कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने मुस्लिम मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा कि ओवैसी के साथ जाना सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने जैसा होगा।

गठबंधन का भविष्य क्या है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन बुरी तरह विफल रहा था, लेकिन 2024 में वोट ट्रांसफर होने से दोनों दलों को फायदा हुआ। दोनों दल जानते हैं कि बिना एक-दूसरे के 2027 में बीजेपी के विजय रथ को रोकना मुश्किल है—सपा का पश्चिमी यूपी में आधार कमजोर है और कांग्रेस का काडर लगभग पूरे प्रदेश में सिमटा हुआ है। फिर भी, सीटों के मोलभाव में अपना पलड़ा भारी करने के लिए दोनों तरफ से लीडरशिप क्लेम की यह जंग अभी और तेज हो सकती है। अगर शीर्ष नेतृत्व यानी अखिलेश और राहुल ने खुद वक्त रहते इस पर विराम नहीं लगाया, तो नीचे काडर के बीच शुरू हुई यह खींचतान चुनाव तक गठबंधन के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।

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