Why Striat Of Malacca is backbone of China Economy: अगर पूछा जाए कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक क्या है? तो जवाब होगा कि ऊर्जा, ईंधन, व्यापार के प्रमुख और सकरे जो (शिपिंग लेन) समुद्री मार्ग हैं, यदि उन्हें अवरूद्ध कर दिया जाए, मालवाहक एवं ईंधन जहाजों का आवागमन यदि रुक जाए या उन रास्तों पर असुरक्षा और जोखिम बढ़ जाए तो बाजार से लेकर सरकारें तक हिलने लगेंगी। सीमित और संकीर्ण क्षेत्र के समुद्री इलाके में बढ़े खतरे का 'कंपन' पूरी दुनिया महसूस करेगी, मिसाइलों का काम मार्केट कर देगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संकट ने विश्व को सोचने पर मजबूर किया है। ईरान-अमेरिका और इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया का पूरा जोर स्टेट ऑफ होर्मुज खुलवाने पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो कह दिया है कि वह दो-तीन सप्ताह में ईरान युद्ध से निकल सकते हैं और जिन्हें तेल की जरूरत है, वे होर्मुज आकर तेल ले जाएं। यानी कि होर्मुज खुलवाने को लेकर ट्रंप ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। उनकी मंशा यही है कि वह इस युद्ध से बस निकल जाना चाहते हैं।
कच्चे तेल और ईंधन की आपूर्ति पहले की तरह होती रहे इसके लिए जरूरी है कि इस समुद्री रास्ते पर ईरान की तरफ से जो खतरा है, वह दूर हो, तभी जाकर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बहाल हो पाएगी। युद्ध शुरू होने से पहले इस रास्ते से प्रतिदिन करीब 20 मिलियन बैरल कच्चे तेल एवं ईंधन की आपूर्ति होती थी जो कि मोटे तौर कुल वैश्विक ईंधन व्यापार का पांचवां हिस्सा है। अभी तो तेल एवं ईंधन के 20 प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति पर संकट पैदा हुआ है तो दुनिया भर में चीख-पुकार मचने लगी।
दुनिया के दो सबसे अहम ऊर्जा चेकप्वाइंट्स में से एक
कल्पना कीजिए कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की तरह या उससे बड़े जो समुद्री मार्ग हैं, वे अवरूद्ध हो जाएं या उन पर यदि इस तरह का खतरा या जोखिम आ जाए तो क्या होगा? स्ट्रेट ऑफ मलक्का से केवल ईंधन की आपूर्ति की अगर बात करें तो यूएस एनर्जी इंफार्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) का कहना है कि 2025 के पहले छह महीने में इस मार्ग से प्रतिदिन 20.9 मिलियन बैरल ईंधन गुजरा। जाहिर है कि यह दुनिया के दो सबसे अहम ऊर्जा चेकप्वाइंट्स में से एक है। संदेश साफ है कि इस तरह के चेकप्वाइंट्स को मात्र असुरक्षित या जोखिम भरा बना देने से ही दुनिया भर में आर्थिक पीड़ा महसूस की जाने लगेगी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की तरह विश्व में कई सामुद्रिक मार्ग हैं जिनसे होकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कच्चे तेल, गैस, कोयला और अन्य उत्पादों की आपूर्ति होती है। इन्हीं में से एक है स्ट्रेट ऑफ मलक्का।
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इंडोनेशिया, मलेशिया-सिंगापुर के बीच से गुजरता है
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से हजारों मील दूर स्ट्रेट ऑफ मलक्का दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। यह समुद्री मार्ग, इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच से गुजरता है। दक्षिणपूर्व एशिया में आने वाला यह समुद्री मार्ग बेहद सकरा है जो हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है। पूर्वी एशिया की ऊर्जा एवं व्यापार का यही प्रमुख रास्ता है। मलय प्रायदीप में स्थित इस समुद्री रास्ते की लंबाई और चौड़ाई की अगर बात करें तो इस सकरे रास्ते की लंबाई 900 किलोमीटर और चौड़ाई 65 से 250 किलोमीटर है। विश्व का कुल 25 प्रतिशत व्यापार जिसमें तेल, चीन के उत्पाद, कोयला, पॉम ऑयल, इंडोनेशिया कॉफी शामिल हैं, इसी रास्ते से होता है। कहने का मतलब है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ने एक रास्ता दिखाया है कि युद्ध या तनाव होने पर समुद्री मार्ग रोक, उसे असुरक्षित कर विश्व भर में तेल, वस्तुओं और उत्पादों की किल्लत और दबाव बनाया जा सकता है। दरअसल, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ने दुनिया को एक 'ट्रेलर' दिखाया है, आने वाले समय में इसकी पूरी पिक्चर देखने को मिल सकती है।
भारत को बढ़त देती है उसकी भौगोलिक स्थिति
जहां तक बात मलक्का की है तो इसका नियंत्रण भारत के पास नहीं है, फिर भी भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जो संकट के समय चाहे तो मलक्का से जहाजों की आवाजाही प्रभावित कर सकता है। वह ऐसे कि भारत का अंडमान निकोबार द्वीप समूह इस समुद्री जलमार्ग के बेहद करीब है और इस क्षेत्र में कभी तनाव होने पर, वह चाहे तो इस जलमार्ग की आसानी से निगरानी और दुनिया के व्यस्तम मार्गों में से एक पर मालवाहक जहाजों आवाजाही अवरुद्ध कर दबाव बना सकता है। मलक्का पर भारत की यही भौगोलिक रणनीतिक बढ़त चीन को परेशान करती है। खासकर, बीजिंग के साथ गतिरोध और तनाव होने की सूरत में भारत के पास मलक्का के रूप में एक 'तुरूप का इक्का' है। मलक्का पर भारत की रणनीतिक बढ़त और इसकी अहमियत के बारे में ऑस्ट्रेलियन डिफेंस फोर्स अकेडमी में न्यू साउथ वेल्स कैनबरा यूनिवर्सिटी के विजिटिंग फेलो डॉ. अशोक शर्मा कहते हैं कि भारत की रणनीतिक बढ़त स्ट्रेट ऑफ मलक्का से मालवाहक जहाजों का आवागमन पूरी तरह से बंद कर देने में नहीं, बल्कि 'इस मार्ग पर अनिश्चतता पैदा करने और रणनीतिक दबाव' बनाने में है। संक्षेप में कहें तो स्ट्रेट ऑफ मलक्का चीन की कमजोरी और दुखती रग है।
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चीन के लिए मलक्का एक रणनीतिक दिवास्वप्न
मान लीजिए ताइवान पर यदि चीन हमला कर दे और युद्ध का दायरा बढ़कर हिंद-प्रशांत महासागर तक फैला जाए या डोकलाम, गलवान जैसा कोई गतिरोध तीव्र होकर समुद्री क्षेत्र तक आ जाए तो ऐसे हालात में स्ट्रेट ऑफ मलक्का केवल एक समुद्री जलमार्ग भर नहीं रह जाएगा बल्कि रणनीतिक दबाव के यह एक बड़े केंद्र के रूप में उभर जाएगा। दुनिया के लिए होर्मुज यदि तेल एवं गैस का पैनिक बटन है तो चीन के लिए मलक्का एक रणनीतिक दिवास्वप्न है। व्यापारिक मार्ग की अपनी इस कमजोरी को दूर करने और इसका विकल्प तैयार करने के लिए चीन ने कोशिश भी की है। EIA वर्ल्ड ऑयल ट्रांजिट चेकप्वाइंट्स के मुताबिक 2025 के पहले छह महीने में स्ट्रेट ऑफ मलक्का से होकर प्रतिदिन 23.2 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति हुई और यह मात्रा कुल वैश्विक तेल आपूर्ति का कराब 29 प्रतिशत है। मात्रा को देखें तो यह विश्व का सबसे बड़ा तेल चेकप्वाइंट है, यहां तक कि होर्मुज से भी बड़ा।
चीन की मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था की रीढ़ है
ईआईए का यही डाटा कहता है कि इसी समयावधि में इस मार्ग से प्रतिदिन करीब 9.2 अरब क्यूबिक फीट एलएनजी की भी आपूर्ति हुई। खास बात यह है कि इस तेल और गैस का सबसे बड़ा उपभोक्ता कोई और नहीं चीन है। अपनी फैक्ट्रियों, उत्पादन और विनिमार्ण क्षेत्र के लिए तेल और गैस की यह मात्रा चीन के लिए बहुत महत्व रखती है। थिंक टैंक ORF का कहना है कि साल 2024 में चीन का ऊर्जा आयात 390 अरब डॉलर तक पहुंच गया और इसमें से करीब 80 प्रतिशत यानी 312 अरब डॉलर मूल्य की उसकी ईंधन आपूर्ति मलक्का स्ट्रेट के रास्ते हुई। मध्य पूर्व के ईंधन के लिए यह सबसे छोटा और प्रभावी मार्ग भी है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का से आने वाला ईंधन चीन जैसी मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था की रीढ़ और 'लाइफ लाइन' है।
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वैकल्पिक मार्ग इसकी भरपाई नहीं कर सकते
चीन और पूर्वी एशिया में तेल, एलएनजी, कच्चा माल, वस्तुएं और उत्पाद निर्बाध रूप से पहुंचने के लिए स्ट्रेट ऑफ मलक्का का चालू रहना बेहद जरूरी है। चीन इस बात को समझता है, उसे यह भी पता है कि स्ट्रेट ऑफ मलक्का में किसी तरह का अवरोध पैदा हुआ तो इसका सीधा और नकारात्मक असर उसकी उत्पादन क्षमता पर पड़ेगा। इस संकट को दूर करने के लिए उसने सालों से अन्य देशों के साथ मिलकर वैकल्पिक मार्ग तैयार करने पर आगे बढ़ा है। उसने बेल्ड एंड रोड रोड इनिशिएटिव जिसे बीआरआई कहा जाता है, उस पर काम किया। पाइपलाइन बिछाई, कॉरीडोर बनाए, अलग-अलग देशों में बंदरगाहों पर निवेश किया। यहां तक कि अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के जरिए उसने नए मार्ग बनाने की कोशिश भी की लेकिन ये सभी विकल्प भी मिलकर स्ट्रेट ऑफ मलक्का की जगह नहीं ले सकते। मलक्का रूट से होने वाला व्यापार की मात्रा, इसकी रफ्तार और कम लागत की भरपाई कोई और वैकल्पिक मार्ग नहीं कर सकता।
