Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज है। यह सियासी हलचल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के दोनों गुटों में चल रही है। शरद पवार खेमा और अजित पवार गुट के कुछ नेता आपस में विलय चाहते हैं। वे चाहते हैं कि अब कोई गुट न रहे, पहले की तरह बस एक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी रहे। विलय और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने की अकटलों के पीछे बीते दिनों एनसीपी अजित पवार गुट के बड़े नेताओं की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात और फिर प्रफुल्ल पटेल की अस्पताल में शरद पवार की मुलाकात है। इन मुलाकातों से विलय की अटकलों ने जोर पकड़ा है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि इस विलय को अजित पवार के परिवार का समर्थन नहीं मिल पा रहा है। बताया जा रहा है कि दिवंगत अजित पवार की पत्नी एवं महाराष्ट्र सरकार में डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पवार इस विलय के लिए तैयार नहीं है। बावजूद इसके दोनों पार्टियां विलय की संभावना को जिंदा रखे हुए हैं।
1 नवंबर को दिल्ली में शाह से मिले पटेल, तटकरे एवं अन्य नेता
1 नवंबर को दिल्ली में NCP के छह वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल, हसन मुश्रीफ, दिलीप वलसे पाटिल और धनंजय मुंडे गृह मंत्री अमित शाह से मिले। बैठक में पार्टी प्रमुख और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार तथा उनके बेटे पार्थ और जय मौजूद नहीं थे। यही बात अटकलों की जड़ बनी। कुछ दिन बाद प्रफुल्ल पटेल मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में शरद पवार से मिलने पहुंचे। वहाँ से सामने आए वीडियो के मुताबिक पवार ने 10 नवंबर के बाद बैठकर बात करने की बात कही। पटेल इसे सिर्फ सेहत का हाल जानने की भेंट बता रहे हैं, पर सियासत में ऐसी शिष्टाचार भेंट शायद ही कभी सिर्फ शिष्टाचार होती है।
हाशिये पर महसूस कर रहे अजित पवार गुट के नेता?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए जनवरी 2026 में अजित पवार के विमान हादसे में निधन को केंद्र में रखना होगा। 2023 में उन्होंने पार्टी तोड़ी थी और संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत थी। उनके बाद सुनेत्रा पवार ने कमान संभाली और बेटे पार्थ व जय भी फैसलों में सक्रिय हो गए। दूसरी तरफ भुजबल, पटेल, तटकरे जैसे नेता दशकों से अजित पवार के साथ काम करते आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार इन नेताओं का असंतोष यह है कि पार्थ पवार के दखल और एकतरफा नियुक्तियों से वरिष्ठ नेता हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। पार्टी इन आरोपों को खारिज करती है। यानी संकट विचारधारा का नहीं, उत्तराधिकार का है। सवाल यह है कि पार्टी 'परिवार' की विरासत से चलेगी या 'सामूहिक नेतृत्व' से।
MLC चुनाव में हार ने बढ़ाई बेचैनी
टाइमिंग भी मायने रखती है। विधान परिषद चुनाव में औरंगाबाद स्नातक सीट पर NCP हारी, जहां वह 18 साल से काबिज थी, और यह सीट शरद पवार गुट ने जीती। महायुति के भीतर किसी घटक दल की चुनावी कमजोरी भाजपा की चिंता बढ़ाती है। वित्त मंत्रालय का सवाल भी बाकी है। यह विभाग अजित पवार के पास था और उनके बाद मुख्यमंत्री फडणवीस ने इसे अपने पास रखा है। NCP इसे वापस चाहती है। सत्ता-साझेदारी में यह दबाव का बड़ा मुद्दा है।
विलय की थ्योरी: कितनी ठोस?
विलय की चर्चा पूरी तरह नई नहीं है। तटकरे ने खुद कहा है कि अजित पवार जीवित होते तो 12 फरवरी को दोनों गुटों के विलय को अंतिम रूप दे दिया जाता। जनवरी में अजित पवार और शरद पवार की मुलाकात भी हुई थी, जब पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के निकाय चुनावों में NCP-NCP(SP) का प्रदर्शन खराब रहा था। एक रिपोर्ट के अनुसार शाह ने वरिष्ठ नेताओं से कहा कि आपसी खींचतान से पार्टी गठबंधन पर बोझ बन रही है। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने यह भी चेताया कि हालात न सुधरे तो विलय की नौबत आ सकती है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे के अनुसार बैठक में विलय पर सीधी बात नहीं हुई और शाह ने सिर्फ अंदरूनी मसले सुलझाने को कहा। आधिकारिक रुख साफ है। तटकरे ने कहा कि पार्टी सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में काम करेगी और विलय का विकल्प ख़ारिज है। शरद पवार से जब निकट भविष्य में विलय की संभावना पूछी गई तो उनका जवाब था, 'अभी नहीं।' ध्यान देने की बात है कि यह जवाब 'कभी नहीं' नहीं है।
हर पक्ष का एक गणित है
शरद पवार की प्राथमिकता सुप्रिया सुले और अपने नेताओं का भविष्य सुरक्षित करना बताई जाती है। विश्लेषकों का तर्क है कि विपक्ष में रहना उनके लिए घाटे का सौदा है। रोहित पवार की शर्त दूसरी दिशा में जाती है। उनके मुताबिक विलय तभी संभव है जब अजित पवार गुट भाजपा और NDA का साथ छोड़े। यानी पवार परिवार के भीतर भी इस पर एक राय नहीं है।
सुनेत्रा पवार गुट: विलय में उसके हाथ से नियंत्रण जाता है। साथ ही 78 संगठनात्मक जिलों के अध्यक्षों, टिकटों और पदों के बंटवारे की व्यावहारिक उलझनें भी हैं।
भाजपा: उसे स्थिर, एकजुट सहयोगी चाहिए। अगर एक मजबूत, बड़ी NCP गठबंधन में आती है तो उसे ऐतराज नहीं होगा। पर बंटी हुई NCP उसके लिए जोखिम है।
तीन संभावित रास्ते
पैचअप: सबसे संभावित रास्ता यही दिखता है। कोर कमेटी की बैठकें, सामूहिक फैसलों का वादा और वरिष्ठों को ज्यादा भूमिका देकर असंतोष थामा जाए।
विलय: 10 नवंबर के बाद की बातचीत इसी का संकेत मानी जा रही है, पर शर्तें, नेतृत्व और NDA में जगह जैसे अड़चन-भरे सवाल अनसुलझे हैं। सुप्रिया सुले को केंद्र में जगह मिलने की चर्चा भी है, पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
औपचारिक टूट: नाराज़ वरिष्ठ नेता अलग राह पकड़ें। फ़िलहाल यह सबसे कमज़ोर संभावना है, क्योंकि पार्टी के विधायकों और मंत्रियों ने बैठक में सुनेत्रा पवार के नेतृत्व पर समर्थन जताया है और नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से असंतोष से इनकार किया है।
अभी तस्वीर 'टूट' से ज्यादा 'टटोलने' की है। सभी पक्ष विकल्प खुले रखकर अपनी सौदेबाजी की ताकत परख रहे हैं। असली संकेत 10 नवंबर के बाद की बातचीत, वित्त मंत्रालय पर फैसले और संगठन में पार्थ पवार की भूमिका से मिलेंगे। अजित पवार के बाद की NCP की असली परीक्षा यही है कि वह एक व्यक्ति की पार्टी से संस्था बन पाती है या नहीं।
दोनों धड़ों के विलय का सवाल नहीं-अनिल देशमुख
महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के वरिष्ठ नेता अनिल देशमुख ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के दोनों विरोधी गुटों के विलय का कोई सवाल ही नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जो भी उनके दल में शामिल होना चाहता है, उसका स्वागत है। सत्तारूढ़ राकांपा की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष सुनील तटकरे ने इससे पहले कहा था कि यदि तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष अजित पवार जीवित होते, तो दोनों गुटों का विलय इसी साल फरवरी में हो गया होता। अजित पवार की बीते 28 जनवरी को पुणे जिले के बारामती में विमान दुर्घटना में मौत हो गई थी।