India's Kal Drone : युद्ध के आज तौर-तरीके बदल गए हैं। दुश्मन पर वार उसके इलाके में जाकर नहीं बल्कि दूर से हो रहे हैं। युद्ध को खत्म करने की जल्दी नहीं बल्कि इसे लंबा खींचा जा रहा है। युद्ध के इस बदले हुए स्वरूप में जो एक हथियार सबसे ज्यादा कारगर साबित हो हुआ है, वह ड्रोन है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर, ईरान-अमेरिका, इजराइल युद्ध में ड्रोन का जमकर इस्तेमाल हुआ और हो रहा है। हर युद्ध और संघर्ष से सबक मिलते हैं। इन युद्धों एवं संघर्षों ने भी सबक दिया है। एक चीज जो बिल्कुल साफ है, वह यह है कि ड्रोन आधुनिक युद्ध की जरूरत और वास्तविकता हैं। इन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जिस देश के पास जितने घातक एवं तकनीकी रूप से उन्नत ड्रोन होंगे, वह देश अपने दुश्मन पर ज्यादा बढ़त रखेगा, उसके पास दुश्मन को नुकसान पहुंचाने का सामर्थ्य ज्यादा होगा।
ओडिशा के आईजी डिफेंस ने बनाया 'काल' ड्रोन
युद्ध एवं संघर्ष में ड्रोन की इस अहमियत को देखते हुए भारतीय रक्षा उत्पादन का प्रमुख जोर नए-नए एवं उन्नत ड्रोन निर्माण पर है। भारतीय सेना अपने हथियारों के जखीरे में नए एवं घातक ड्रोन शामिल कर रही है। भविष्य के युद्धों में ड्रोन की बढ़ती महत्ता को देखते हुए ओडिशा के आईजी डिफेंस ने 'काल' ड्रोन का निर्माण किया है। यह ईरान के शाहेद श्रेणी का ड्रोन है। यह ड्रोन दुश्मन के अंदरूनी इलाके में दाखिल होकर रणनीतिक रूप से अहम लक्ष्यों एवं ठिकानों को तबाह एवं बर्बाद कर सकता है। एक्सपर्ट की राय है कि स्पीड, तकनीक, अभियानगत क्षमता और पेलोड को देखते हुए यह 'कॉल' चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। यही नही, क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के बाद यह सबसे ज्यादा खरीदे जाने वाला भारतीय स्वदेशी हथियार बन सकता है।
'काल' ड्रोन की मारक क्षमता, स्पीड
ओडिशा स्थित आईजी डिफेंस ने इस 'काल' ड्रोन का निर्माण किया है। 'काल' ड्रोन दुश्मन के अंदरूनी इलाके में दाखिल होकर रणनीतिक रूप से अहम ठिकानों एवं लक्ष्यों को आसानी से बर्बाद और तबाह कर सकता है। डिफेंस एक्सपर्ट मानते हैं कि 'काल' ड्रोन को ईरान के शाहेद और अमेरिका के लूकास ड्रोन की तर्ज पर विकसित किया गया है। आईजी डिफेंस के मुताबिक पूरी तरह स्वदेशी इस ड्रोन की अभियानगत क्षमता 1000 किलोमीटर तक है। एक बार उड़ान भरने के बाद यह सात से आठ घंटे में आसमान में रह सकता है। 'कॉल' ड्रोन अपने साथ 50 किलोग्राम का पेलोड ले जा सकता है। इसकी सामान्य रफ्तार 160 किलोमीटर प्रतिघंटा है और यह अधिकतम 200 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार पकड़ सकता है। समुद्र स्तर से 5000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हुए यह अपने अभियान को अंजाम दे सकता है।
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उन्नत गाइडेंस एवं नेविगेशन तकनीक से भी लैस
यह उन्नत गाइडेंस एवं नेविगेशन तकनीक से भी लैस है। इसका मतलब है कि अभियान के दौरान अपने लिए यह खुद रास्ता बना सकता है। यह उड़ता हुआ बारूद के एक गोले की तरह भी है जो लक्ष्य या ठिकाने से टकराकर उन्हें ध्वस्त कर सकता है। कंपनी का कहना है कि ‘काल’ ड्रोन ऑपरेशनल डेप्थ में बुनियादी ढांचे, रडार साइट्स, एयर-डिफेंस बैटरियों और हल्के व अर्ध-कठोर लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है। इसके अलावा, इसे रॉकेट-असिस्टेड टेक-ऑफ या किसी वाहन के जरिए लॉन्च किया जा सकता है, जिससे ऑपरेटरों को इसकी तैनाती करना आसान हो जाता है।
गल्फ, वैश्विक बाजारों पर ‘काल’ ड्रोन की नजर
‘काल’ ड्रोन अब देश की सीमाओं से बाहर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है। गल्फ और अन्य रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों के कई देशों ने इसमें रुचि दिखाई है। 5 अगस्त को आईजी डिफेंस ने बताया कि कई गल्फ देशों ने अपनी युद्धक जरूरतों के लिए ‘काल’ ड्रोन खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने किफायती, स्वायत्त और लंबी दूरी तक हमला करने वाले सिस्टम की बढ़ती सैन्य उपयोगिता को उजागर किया है। रिपोर्टों में आईजी डिफेंस से जुड़े लोगों ने कहा, 'हम कई खाड़ी देशों के साथ बातचीत कर रहे हैं। बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। हमें उम्मीद है कि इस वित्तीय वर्ष में ही इनमें से कुछ बातचीत को सौदे में बदल दिया जाएगा।
ब्रह्मोस: कई देशों ने खरीदा भारत का यह अचूक हथियार
कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘काल’ ड्रोन भारत का अगला बड़ा रक्षा निर्यात बन सकता है और यह ब्रह्मोस मिसाइल की सफलता की राह पर आगे बढ़ सकता है।
ब्रह्मोस का पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बना फिलिपींस
रक्षा विकास एवं अनुसंधान संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओ मशिनोस्त्रोवेनिया द्वारा संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस भारत के सबसे चर्चित रक्षा निर्यातों में शामिल हो चुका है। इसमें तेज गति, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और कई प्लेटफॉर्म से लॉन्च किए जाने की क्षमता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसके प्रभावी प्रदर्शन के बाद इसकी मांग काफी बढ़ गई। 2022 में फिलीपींस ब्रह्मोस का पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बना था। उसने तट-आधारित एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम के लिए 375 मिलियन डॉलर का सौदा किया था। इसके बाद वियतनाम ने भी भारत के साथ ब्रह्मोस को लेकर समझौता किया। वहीं, जुलाई की शुरुआत में भारत ने घोषणा की कि वह इंडोनेशिया को भी ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति करेगा।
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ब्रह्मोस खरीदने में इन देशों ने भी रुचि दिखाई
दक्षिण कोरिया, अल्जीरिया, ग्रीस, मिस्र, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात और चिली जैसे कुछ अन्य देशों ने भी ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है। इसे दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक माना जाता है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, विदेशी देशों के लिए ब्रह्मोस की खासियत यह है कि इसके इस्तेमाल के लिए किसी बड़े नौसैनिक बेड़े की जरूरत नहीं होती। इसके अलावा, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में इसकी बढ़ती मांग का संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलती समुद्री सुरक्षा चिंताओं से भी है। इस क्षेत्र के कई देश दक्षिण चीन सागर में आपसी क्षेत्रीय दावों और बढ़ती सैन्य गतिविधियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि अधिकांश देशों ने औपचारिक सैन्य गुटों में शामिल होने से परहेज किया है, लेकिन संभावित दबाव या सैन्य कार्रवाई की कीमत बढ़ाने के लिए कई देश एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल (A2/AD) क्षमताएं मजबूत कर रहे हैं।
भारत का रक्षा निर्यात में बढ़ता दबदबा
भारत धीरे-धीरे और लगातार हथियारों के बड़े आयातक से एक रक्षा निर्यातक देश में बदल रहा है। इसके आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं।
अप्रैल में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 62.66 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। इस वृद्धि में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बड़ी भूमिका रही। उनके निर्यात में 151 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 8,389 करोड़ रुपये से बढ़कर 21,071 करोड़ रुपये हो गया। कुल रक्षा निर्यात में DPSUs की हिस्सेदारी 54.84 प्रतिशत रही। वहीं, निजी कंपनियों के निर्यात में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह बढ़कर 17,353 करोड़ रुपये हो गया। आंकड़ों के अनुसार, भारत फिलहाल 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। रक्षा उत्पादों के निर्यातकों की संख्या भी पिछले वर्ष के 128 से बढ़कर 145 हो गई है।
ब्रह्मोस के अलावा ये हथियार भी बेचता है भारत
मई में भारत के रक्षा निर्यात पर बोलते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि जो भारत कभी हथियारों का आयातक था, उसे अगले 25-30 वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा निर्यातक बनने से कोई ताकत नहीं रोक सकती। ब्रह्मोस भारत का प्रमुख रक्षा निर्यात है, लेकिन इसके अलावा पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, स्वाति वेपन-लोकेटिंग रडार, एंटी-टैंक गोला-बारूद और आकाश एयर डिफेंस सिस्टम ने भी विदेशी खरीदारों की दिलचस्पी हासिल की है। मिसाइलों और तोपखाने से आगे बढ़कर भारतीय कंपनियों ने ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर मॉरीशस को निर्यात किए हैं। वहीं डॉर्नियर-228 विमान मॉरीशस, सेशेल्स और गुयाना जैसे देशों को निगरानी भूमिकाओं के लिए दिए गए हैं। भारतीय शिपयार्ड अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को ऑफशोर पेट्रोल वेसल और इंटरसेप्टर बोट्स भी उपलब्ध करा चुके हैं।
50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य
भारत ने अब वित्त वर्ष 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है। हाल ही में रक्षा सचिव ने कहा था कि यह लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि भारत इस लक्ष्य को हासिल कर पाएगा या नहीं, लेकिन ‘काल’ जैसे स्वदेशी हथियारों का निर्यात निश्चित रूप से इस दिशा में भारत की मदद कर सकता है।
