BRICS Joint Declaration: दिल्ली के भारत मंडपम में 12-13 सितंबर को BRICS देशों का समिट हुआ। इस समिट में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका सहित ब्रिक्स के सभी 11 सदस्य और पार्टनर देश शामिल हुए। राष्ट्राध्यक्षों की अगर बात करें तो व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, मसूद पेजेश्कियान, प्रबोवो सुबियांतो, अब्देल फतेह अल सीसी से लेकर यूएई, सऊदी अरब और उन तमाम देशों के प्रमुख और प्रतिनिधि शामिल हुए जिन्हें इस समिट के लिए निमंत्रण मिला था। दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स का यह 18वां समिट अपनी सफलता और कई शानदार उपलब्धियों के लिए याद रखा जाएगा। भारत और ब्रिक्स दोनों के लिहाज से यह समिट बेहद खास और संदेश वाला रहा है। इन पर विस्तार से चर्चा हो सकती है लेकिन हम यहां ब्रिक्स के संयुक्त घोषणापत्र पर चर्चा करेंगे जो कि समिट के पहले दिन यानी 12 सितंबर को ही जारी हुआ।
संयुक्त घोषणापत्र का जारी होना बड़ी सफलता
गौर करने वाली बात यह है कि यह संयुक्त घोषणापत्र समिट के आखिरी दिन नहीं बल्कि समिट के पहले दिन ही जारी हो गया। समिट के पहले दिन संयुक्त घोषणापत्र का जारी हो जाना और वह भी सर्वसम्मति से आम बात नहीं है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। आम तौर पर ऐसा होता नहीं। घोषणापत्र, संयुक्त घोषणापत्र या चेयर नोट आम तौर पर समिट के समापन के बाद जारी होता आया है लेकिन 45 पन्ने वाले इस संयुक्त घोषणापत्र को सर्वसम्मति से अपना लिया गया और इससे भी बड़ी बात। संयुक्त घोषणापत्र में शामिल सभी 140 प्वाइंटस पर ब्रिक्स के देश सहमत हुए और अपनी मुहर लगाई। इस संयुक्त घोषणापत्र के बारे में सत्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए उनके बयान के बारे में भी जानना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसी भी सदस्य ने कोई आपत्ति नहीं की। नई दिल्ली घोषणापत्र 2026 सर्वसम्मति से अपना लिया गया।
...तो भारत को जारी करना पड़ता 'चेयर नोट'
यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है। संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाना आसान काम नहीं था क्योंकि ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक तक संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति होने के संकेत नहीं मिले थे। ऐसा लग रहा था कि समिट में, सर्वसम्मति से 'ज्वाइंट डिक्लेयरेशन' जारी नहीं हो पाएगा और इसकी जगह 'चेयर नोट' जारी करना पड़ सकता है लेकिन भारत ने उम्मीद नहीं छोड़ी। आपसी अनबन और मतभेद रखने वाले देशों खासकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को, घोषणापत्र पर एक साथ लाने के लिए विशेष प्रयास और बैठकें कीं। संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाने के लिए गहन बातचीत का दौर लगातार चलता रहा। बैठकों पर बैठकें होती रहीं। यहां तक कि ब्रिक्स देशों के शेरपाओं की बैठक शनिवार सुबह 4 बजे तक चली।
brics leaders
भारत की कूटनीति में ब्रिक्स देशों ने जताया भरोसा
दिल्ली का मकसद साफ था और वह मकसद था, दिल्ली से ब्रिक्स का सर्वसम्मति से, संयुक्त घोषणापत्र जारी होना चाहिए। इसके लिए भारत ने एक तरह से अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत लगा दी। विदेश मंत्री एस जयशंकर और उनकी टीम ने घोषणापत्र के बिंदुओं और मसौदे पर देशों और उनके प्रतिनिधियों को अपने भरोसे में लिया। इससे संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाने में सफलता मिली। यह ब्रिक्स में भारत के प्रभावी कूटनीति और दिल्ली में ब्रिक्स के सदस्य देशों के भरोसे की जीत है। कहीं न कहीं इस आम सहमति को बनाने में पीएम मोदी की 'हग डिप्लोमेसी' भी काम आई होगी।
आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा
इस संयुक्त घोषणापत्र में आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की गई है। संघर्षों को रोकने, विवादों का हल संवाद और कूटनीति से निकालने की बात कही गई है। मल्टीलेटरिज्म यानी बहु-पक्षवाद को और मजबूत बनाने और कारोबार के एक तरफा फैसलों पर चिंता जताई गई है। गाजा, सीरिया, सूडान सहित तमाम वैश्विक चुनौतियों और संकटों का जिक्र करते हुए संवाद और कूटनीति के जरिए उनका समाधान करने का आह्वान किया गया है। घोषणापत्र में फैसले लेने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और व्यवस्था में सुधार और बदलाव लाने पर जोर दिया गया है। यही नहीं, पीएम मोदी ने ब्रिक्स में सुधारों के लिए 10 उपायों का एक प्रस्ताव भी पेश किया। दुनिया के फैसले लेने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उन्होंने ग्लोबल साउथ की नुमाइंदगी बढ़ाने पर जोर दिया। यहां पीएम ने विशेष रूप से कहा कि विश्व की जो मौजूदा व्यवस्था है। वह 'पिरामिड ऑफ प्रिविलेज' है।
BRICS leaders
अब मंजूर नहीं सुधारों में देरी!
पीएम मोदी के बयान का यही मतलब है कि निर्णय करने वाली वैश्विक संस्थाओं की व्यवस्था कुछ चुनिंदा देशों और अंत में एक मुल्क के हाथों में है। ऐसे नहीं चल सकता। इस व्यवस्था में सबकी बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बारे में पीएम मोदी का यह बयान पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका को एक बड़ा संदेश है। पश्चिमी देशों को ब्रिक्स से साफ और स्पष्ट संदेश दिया गया है कि वैश्विक संस्थाएं अब पुराने चाल-ढाल वाले रवैये से नहीं चलेंगी। इनमें सुधार, बदलाव और ग्लोबल साउथ के देशों की हिस्सेदारी बढ़ानी ही होगी। संस्थाओं में सुधार को अब लंबित नहीं रखा जा सकता। ग्लोबल साउथ के देश अब और इंतजार करने के मूड में नहीं हैं। इन देशों को नुमाइंदगी और हिस्सेदारी देकर उन्हें उनका वाजिब हक देना होगा। अब उनकी आवाज अनसुनी नहीं की जा सकती। संकेत और संदेश साफ है कि सुधार लागू करने में ज्यादा देरी हुई तो सब्र का बांध टूट भी सकता है।
