Israel Politics: इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी कुर्सी छोड़नी होगी? दरअसल, 27 अक्टूबर 2026 को हुए आम चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
वहीं, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी ने 21 सीटें हासिल कीं। हालांकि, आइजेनकोट को संसद के 120 में से 67 सांसदों का समर्थन मिला है, जबकि नेतन्याहू के पक्ष में 46 सांसदों ने समर्थन जताया। इसके बाद देश के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विपक्षी नेता और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट को नई सरकार बनाने का पहला मौका देने का फैसला किया है। बता दें कि इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।
लेकिन दिलचस्प बात ये है कि आइजेनकोट के सामने भी सरकार बनाना आसान नहीं होगा। उन्हें अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को एक साथ लाना होगा। ऐसे में सवाल है कि क्या नेतन्याहू की करीब 19 साल की राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ने वाली है? कौन हैं गादी आइजेनकोट और उनके पास सरकार बनाने के क्या विकल्प हैं? आइए समझते हैं पूरा मामला।
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क्या है पूरा मामला?
इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव हुए थे। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उनके नेतृत्व वाला गठबंधन संसद में बहुमत हासिल नहीं कर सका।
दूसरी तरफ, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को भी अपने दम पर सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलीं। नतीजतन, देश में सरकार गठन को लेकर राजनीतिक गतिरोध पैदा हो गया।
इसके बाद राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। इस दौरान 67 सांसदों ने आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका देने की सिफारिश की, जबकि 46 सांसदों ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सात सांसदों वाली यूनाइटेड टोरा जूडिज्म पार्टी ने किसी भी नेता के पक्ष में समर्थन नहीं दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने 8 नवंबर को आइजेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका देने का फैसला किया।
कौन हैं गादी आइजेनकोट?
गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख और वर्तमान में याशर पार्टी के नेता हैं। वह इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके हैं। सेना से राजनीति में आने के बाद उन्होंने नेतन्याहू के खिलाफ विपक्षी राजनीति में अपनी जगह बनाई। आइजेनकोट 2023 में हमास के हमले के बाद नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट में भी शामिल हुए थे। हालांकि, करीब आठ महीने बाद उन्होंने सरकार छोड़ दी। उन्होंने नेतन्याहू के नेतृत्व और युद्ध से जुड़े फैसलों की आलोचना की थी।
आइजेनकोट खुद को सुरक्षा मामलों में अनुभवी नेता के तौर पर पेश करते हैं। उनका राजनीतिक रुख सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त माना जाता है, लेकिन घरेलू राजनीति में वह नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक सहयोगियों से अलग रास्ता अपनाने की बात करते हैं।
Gadi Eisenkot
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें 61 सांसदों का समर्थन जुटाना है। भले ही 67 सांसदों ने उन्हें सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी सांसद उनकी सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हैं। इस पूरे राजनीतिक समीकरण में अरब पार्टियों की भूमिका बेहद अहम हो गई है।
इजरायल की दो अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के पास कुल 19 सीटें हैं। इन दोनों दलों ने आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका देने का समर्थन किया है। लेकिन आइजेनकोट पहले ही साफ कर चुके हैं कि वह अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं। यही उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास है। जिन पार्टियों के समर्थन से उन्हें बहुमत का रास्ता मिल सकता है, उन्हीं के साथ सरकार बनाने को लेकर उनकी अपनी सीमाएं हैं।
सरकार बनाने के लिए आइजेनकोट के पास क्या हैं विकल्प?
आइजेनकोट के सामने सरकार बनाने के तीन प्रमुख रास्ते हैं।
1. अरब पार्टियों के बाहरी समर्थन से सरकार
आइजेनकोट अरब पार्टियों को सरकार में शामिल किए बिना उनका बाहरी समर्थन हासिल कर सकते हैं। इसका मतलब है कि ये पार्टियां सरकार का हिस्सा बने बिना विश्वास मत और महत्वपूर्ण विधायी फैसलों पर उनका साथ दें। हालांकि, इस विकल्प में भी राजनीतिक मुश्किलें हैं। उनके संभावित सहयोगियों में कुछ दल अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के खिलाफ हैं।
2. अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टियों से गठबंधन
दूसरा रास्ता इजरायल की धार्मिक और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टियों का समर्थन हासिल करना है। इनमें यूनाइटेड टोरा जूडिज्म और शास पार्टी शामिल हैं। इन पार्टियों के पास कुल 13 सीटें हैं। अगर आइजेनकोट को अपने 48 समर्थक सांसदों के अलावा इन दोनों दलों का साथ मिल जाता है तो उनके पास 61 सीटें हो सकती हैं। लेकिन यहां भी एक पेंच है। अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। आइजेनकोट और उनके सहयोगियों का इस मामले में अलग रुख रहा है।
3. नेतन्याहू के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार
तीसरा विकल्प नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का है। नेतन्याहू खुद भी ऐसी सरकार बनाने की अपील कर चुके हैं। हालांकि, आइजेनकोट कई बार कह चुके हैं कि वह नेतन्याहू के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। इसलिए यह विकल्प भी काफी मुश्किल नजर आता है।
नेतन्याहू क्यों नहीं छोड़ना चाहते सत्ता?
बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल हैं। वह पिछले करीब 30 वर्षों में लगभग 19 साल तक इस पद पर रह चुके हैं। उनकी लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ संसद में सबसे बड़ी पार्टी है। हालांकि, उनके दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को केवल 53 सीटें मिली हैं।
नेतन्याहू ने चुनाव के बाद राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की अपील की है। उनका कहना है कि इजरायल को मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों के बीच एक मजबूत सरकार की जरूरत है। वहीं, उन्होंने अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार का विरोध भी किया है। दूसरी तरफ, विपक्षी दलों का आरोप है कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहने के लिए राजनीतिक समीकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए कितना समय मिलेगा?
इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की ओर से नामित उम्मीदवार को शुरुआत में 28 दिन का समय मिलता है। इस अवधि में वह अलग-अलग राजनीतिक दलों से बातचीत करके बहुमत जुटाने की कोशिश करता है।
अगर 28 दिनों में सरकार नहीं बनती है तो राष्ट्रपति 14 दिनों का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। यानी आइजेनकोट के पास अधिकतम 42 दिन हो सकते हैं। अगर वह इस दौरान सरकार बनाने में नाकाम रहते हैं तो किसी दूसरे नेता को मौका दिया जा सकता है। इसके बाद भी सरकार नहीं बनती है तो संसद में दूसरे उम्मीदवार को मौका देने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। अगर सभी कोशिशें नाकाम रहती हैं तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए करीब 100 दिनों की समयसीमा बताई गई है।
क्या इजरायल में फिर होंगे चुनाव?
इजरायल में राजनीतिक अस्थिरता का इतिहास पुराना है। 2019 से 2022 के बीच देश में पांच बार चुनाव कराने पड़े थे। इसकी बड़ी वजह किसी भी गठबंधन का स्थायी बहुमत हासिल नहीं कर पाना था। इस बार भी चुनाव के बाद किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। नेतन्याहू और आइजेनकोट दोनों के सामने गठबंधन बनाने की चुनौती है।
अगर आइजेनकोट 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल होते हैं तो इजरायल में नई सरकार का रास्ता खुल सकता है। लेकिन अगर वह ऐसा नहीं कर पाए तो किसी दूसरे नेता को मौका मिलेगा। अंततः सभी विकल्प विफल होने पर देश को फिर से चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल इतना साफ है कि नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है और आइजेनकोट के सामने अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं को एक साथ लाने की।
