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देशों का समर्थन बढ़ने के बावजूद भारत से दूर क्यों हैं UNSC की स्थायी सीट? जानिए कहां फंसा है पेच

इन दिनों न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का 81वां सत्र चल रहा है। यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के मुहिम का जोरदार समर्थन V4 के देशों पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक ने भी किया है। लेकिन सवाल ये है क्या सिर्फ समर्थन के बयान से भारत को वो सीट मिल जाएगी? जवाब है -नहीं।

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यूएनएससी की स्थायी सदस्यता पाना चाहता है भारत।
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 23, 2026, 14:05 IST
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UNSC parmanent seat: संयुक्त राष्ट्र में सुधारों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता के लिए भारत लंबे समय से मुहिम चला रहा है। स्थायी सदस्यता पाने के भारत के प्रयासों को दुनिया भर में काफी हद तक समर्थन मिला है। हाल के दिनों में नई दिल्ली के दावे का समर्थन करने वाले देशों की संख्या भी बढ़ी है लेकिन अभी तक भारत अपने इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। इन दिनों न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का 81वां सत्र चल रहा है। यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के मुहिम का जोरदार समर्थन V4 के देशों पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक ने भी किया है। लेकिन सवाल ये है क्या सिर्फ समर्थन के बयान से भारत को वो सीट मिल जाएगी? जवाब है -नहीं। हम समझेंगे कि आखिर वो कौन-सी दीवारें हैं जो पिछले दो दशकों से भारत की इस दावेदारी को रोके हुए हैं।

ग्लोबल साउथ का हिस्सा है भारत

ANI की रिपोर्टिंग के मुताबिक, 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में पहली बार V4-इंडिया फॉरेन मिनिस्टर्स मीटिंग हुई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसे 'ऐतिहासिक मौका' बताया। मीटिंग के बाद स्लोवाकिया के विदेश मंत्री युराय ब्लानार ने कहा कि चारों V4 देश एकमत हैं कि भारत को टेबल पर होना ही चाहिए क्योंकि भारत ग्लोबल साउथ का हिस्सा है और इंडो-पैसिफिक में एक उभरती हुई महाशक्ति है। मीटिंग में सिर्फ UNSC सीट की बात नहीं हुई -टेक्नोलॉजी, डिफेंस, बिज़नेस और लोगों के बीच आवाजाही बढ़ाने पर भी सहमति बनी, और अब हर साल ऐसी मीटिंग होगी।

सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य

UN में 15 देश सिक्योरिटी काउंसिल में बैठते हैं-पांच स्थायी और दस चुने हुए, जो दो साल के लिए आते हैं। पांच स्थायी सदस्य हैं-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन। भारत अब तक आठ बार चुने हुए सदस्य के तौर पर काउंसिल में रह चुका है। आखिरी बार 2021-22 में। लेकिन स्थायी सदस्यता मिलने का मतलब होगा-हर बार चुनाव लड़े बिना काउंसिल में लगातार मौजूदगी, संस्थागत निरंतरता, और युद्ध, प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे फैसलों में स्थायी भूमिका। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि भारत अकेले फैसले तय कर पाएगा। काउंसिल के फैसले तब भी बाकी सदस्यों के वोट और नियमों पर ही निर्भर रहेंगे।

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UNSC में भारत के लिए फिलहाल कोई खाली स्थायी सीट नहीं

यहीं असली पेच है। UNSC में भारत के लिए फिलहाल कोई खाली स्थायी सीट नहीं है। नई सीट बनाने के लिए UN चार्टर में संशोधन करना होगा। और चार्टर का आर्टिकल 108 इसके लिए दो शर्तें रखता है। पहली, जनरल असेंबली के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी और दूसरी उतना ही अहम दो-तिहाई सदस्य देशों को अपने-अपने संविधान के तहत इसकी पुष्टि करनी होगी, और इसमें पांचों मौजूदा स्थायी सदस्य शामिल होने अनिवार्य हैं। यानी सिर्फ जनरल असेंबली में वोट जीत लेना काफी नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन, इन पांचों को इस बदलाव को अपने यहां पास भी कराना होगा। मतलब साफ है जिन देशों से सत्ता साझा करने को कहा जा रहा है, वही तय करेंगे कि ये साझेदारी किन शर्तों पर होगी।

भारत की दावेदारी में चीन सबसे बड़ी रुकावट

चीन को अक्सर भारत की दावेदारी में सबसे बड़ी रुकावट कहा जाता है और ये सही भी है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस चारों ने भारत की स्थायी सदस्यता का खुलकर समर्थन किया है। रूस ने बार-बार दोहराया है, अमेरिका ने भी 2024 में टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशन को आगे बढ़ाने का समर्थन किया था, और ब्रिटेन-फ्रांस ने भी UN की डिबेट में सीधे भारत का नाम लेकर समर्थन दिया है। लेकिन चीन ने अब तक इतना साफ समर्थन कभी नहीं दिया। लेकिन सिर्फ चीन को दोष देना पूरी तस्वीर नहीं है। किसी एक P5 देश का समर्थन मिल जाना भी इस सवाल का जवाब नहीं देता कि कितनी नई सीटें बनेंगी, कौन-कौन से देश आएंगे, उन्हें कौन-सी शक्तियां मिलेंगी, और क्या हर सरकार आखिर में इस पूरे पैकेज को अपने यहां रैटिफाई करेगी। यानी भारत को सिर्फ समर्थन नहीं चाहिए एक ऐसा रिफॉर्म मॉडल चाहिए जिस पर सब सहमत हों, और मौजूदा स्थायी सदस्यों का सहयोग भी।

एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है G4

भारत अकेले ये लड़ाई नहीं लड़ रहा। ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर भारत G4 समूह बनाता है, जो एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का साथ देते हैं। ये V4 से बिल्कुल अलग समूह है। लेकिन हर देश स्थायी सीटों के पक्ष में नहीं है। 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' नाम का एक गुट है, जिसमें पाकिस्तान, इटली, मेक्सिको, अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया जैसे देश शामिल हैं। इनका कहना है कि नई स्थायी सीटें बनाने के बजाय चुने हुए सदस्यों की संख्या और उनका कार्यकाल बढ़ाया जाए, ताकि ज्यादा देशों को बारी-बारी से मौका मिले। सितंबर 2025 के अपने बयान में इस गुट ने साफ कहा कि सिर्फ इलेक्टेड मेंबरशिप बढ़ाई जाए।

क्या भारत को वीटो पावर भी मिल जाएगी?

इसके अलावा अफ्रीका का सवाल भी बड़ा है। आज तक कोई अफ्रीकी देश या लैटिन अमेरिकी देश UNSC में स्थायी सदस्य नहीं है। अफ्रीकन यूनियन की मांग है कि कम-से-कम दो स्थायी और पांच गैर-स्थायी सीटें अफ्रीका को मिलें और अगर वीटो पावर बरकरार रहती है, तो नए स्थायी सदस्यों को भी वो मिले। मतलब भारत की दावेदारी को इस बड़ी वैश्विक सौदेबाज़ी में फिट बैठना होगा। अगर अफ्रीका की मांग अनसुनी रह गई, तो पूरे रिफॉर्म की वैधता पर ही सवाल उठेंगे। एक और बड़ा सवाल -क्या स्थायी सीट मिलते ही भारत को वीटो पावर भी मिल जाएगी? इसका जवाब अभी तय नहीं है, और ये पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि आखिर में रिफॉर्म का जो मॉडल अपनाया जाएगा, उसमें क्या तय होता है। मौजूदा नियमों के तहत, किसी भी बड़े फैसले के लिए कम-से-कम नौ वोट चाहिए, और किसी भी स्थायी सदस्य का वीटो नहीं लगना चाहिए। नए स्थायी सदस्यों को वीटो देना या न देना , ये अपने आप में एक अलग बड़ी बहस है, क्योंकि वीटो देने से रुकावटों की संभावना और बढ़ जाएगी।

1963 में हो चुका है काउंसिल का विस्तार

क्या पहले कभी काउंसिल का विस्तार हुआ है? तो इसका जवाब हां है। साल 1963 में एक संशोधन पास हुआ था जो 1965 में लागू हुआ, जिससे काउंसिल 11 से बढ़कर 15 सदस्यों की हो गई। लेकिन तब सिर्फ चुने हुए सदस्यों की संख्या बढ़ी थी, स्थायी सदस्यों की संख्या नहीं बदली थी। यानी काउंसिल का विस्तार संभव है, ये साबित हो चुका है लेकिन नए स्थायी सदस्य जोड़ना, चुने हुए सदस्य बढ़ाने से कहीं ज्यादा मुश्किल काम है, क्योंकि इससे शक्ति का दीर्घकालीन बंटवारा बदल जाता है। तो भारत के लिए V4 का समर्थन अंततः क्या हासिल करता है? ये भारत की कूटनीतिक मुहिम में एक और आवाज जोड़ता है। खासतौर पर मध्य यूरोप से, जहां तक भारत की पहुंच पहले उतनी मजबूत नहीं मानी जाती थी। लेकिन ये यूरोपियन यूनियन का फैसला नहीं है, और न ही इससे काउंसिल की बनावट तुरंत बदलती है।

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देशों को पहले साझा प्रस्ताव पर सहमत होना होगा

भारत के लिए असली उपलब्धि ये होगी कि क्या समर्थन देने वाले देश आखिरकार एक साझा, बातचीत-योग्य प्रस्ताव पर पहुंच पाते हैं। काउंसिल का आखिरी आकार क्या हो, सीटें किसे मिलें, चुनाव कैसे हो, वीटो किसे मिले, और चार्टर में बदलाव कैसे लागू हो। इसके बाद ही असली मुश्किल शुरू होती है। इस समझौते को जनरल असेंबली से पास कराना, और फिर हर देश से अपने यहां रैटिफाई कराना। फिलहाल के लिए, V4 के साथ बना नया रिश्ता भारत के काम आएगा भी-टेक्नोलॉजी, रिसर्च, डिफेंस और लोगों की आवाजाही जैसे क्षेत्रों में, भले ही UNSC की सीट अभी दूर की मंजिल बनी हुई हो। तो कुल मिलाकर V4 का समर्थन भारत की दावेदारी को मजबूती तो देता है, लेकिन उस कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता अभी भी चार्टर अमेंडमेंट, पांचों स्थायी सदस्यों की रजामंदी, और अफ्रीका-लैटिन अमेरिका जैसे दूसरे दावेदारों के साथ एक बड़े समझौते से होकर गुजरता है। असली सवाल अब ये नहीं कि कौन समर्थन दे रहा है बल्कि ये कि क्या सारे समर्थक आखिरकार एक साझा प्रस्ताव पर सहमत हो पाएंगे।

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