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असम UCC विधेयक से आम लोगों की जिंदगी में क्या होगा बदलाव? शादी-तलाक,संपत्ति और लिव-इन तक समझिए पूरा ब्यौरा

Assam UCC Bill: यह विधेयक केवल कानूनी दस्तावेज नहीं बल्कि सामाजिक ढांचे में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं को अधिक अधिकार, कानूनी समानता और पारदर्शिता मिलेगी, जबकि आलोचकों को आशंका है कि इससे निजी और धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

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असम यूजीसी विधेयक।
Edited by: Shiv Shukla
Updated May 28, 2026, 21:07 IST

Assam UCC Bill: देश में एक बार फिर यूसीसी की चर्चा जोरों पर है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम में भी समान नागरिक संहिता विधेयक को विधानसभा से पारित कर दिया गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे सरकार के चुनावी वादों की पूर्ति बताया है। उन्होंने इसे 'ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी फैसला'कहा है।

ऐसे में अब जबकि यह विधेयक पारित हो गया है तो यह सवाल उठ रहा है कि इसका आम लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा। यह कानून केवल कानूनी दस्तावेज नहीं बल्कि सामाजिक ढांचे में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं को अधिक अधिकार, कानूनी समानता और पारदर्शिता मिलेगी, जबकि आलोचकों को आशंका है कि इससे निजी और धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि इसमें किन प्रावधानों को शामिल किया गया है और यह राज्य के आम नागरिकों को कैसे प्रभावित करेगा....

सबसे पहले बात UCC की आखिर यह है क्या?

समान नागरिक संहिता का मतलब है कि सभी नागरिकों के लिए निजी जीवन से जुड़े मामलों में एक समान कानून लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। वर्तमान में भारत में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू हैं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों के विवाह, तलाक और उत्तराधिकार संबंधी कानून अलग-अलग हैं।

संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने की सलाह दी गई है। हालांकि यह नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है,इसलिए इसे लागू करना सरकारों के विवेक पर निर्भर करता है।

असम के UCC विधेयक में क्या खास है?

इस विधेयक का सबसे बड़ा प्रावधान एक विवाह व्यवस्था को अनिवार्य बनाना है। यानी कोई भी व्यक्ति एक समय में एक से अधिक शादी नहीं कर सकेगा। हालांकि यूसीसी लागू होने से पहले किए गए बहुविवाह को कानूनी सुरक्षा दी गई है। विधेयक में विवाह की न्यूनतम उम्र पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह व्यवस्था पहले से लागू राष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को खत्म नहीं किया जाएगा। लोग निकाह, वैदिक विवाह, आनंद कारज, सप्तपदी या अन्य पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार शादी कर सकेंगे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि सभी विवाहों का कानूनी ढांचा समान रहेगा।

विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य

नए विधेयक के तहत हर विवाह और तलाक का सरकारी पंजीकरण जरूरी होगा। शादी के 60 दिनों के भीतर दंपति को सब-रजिस्ट्रार के सामने विवाह ज्ञापन जमा करना होगा। सरकार का कहना है कि इससे बाल विवाह, फर्जी शादियों और धोखाधड़ी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। तलाक के लिए भी सभी समुदायों पर समान आधार लागू होंगे। इनमें क्रूरता, परित्याग और आपसी सहमति शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

बच्चों की कस्टडी और महिलाओं के अधिकार

विधेयक के अनुसार पांच साल से कम उम्र के बच्चों की प्राथमिक कस्टडी सामान्य तौर पर मां को दी जाएगी। इसे बाल हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया प्रावधान बताया जा रहा है। उत्तराधिकार के मामलों में भी बड़ा बदलाव किया गया है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मरता है तो उसकी संपत्ति में पति-पत्नी, बच्चे और माता-पिता को समान श्रेणी में रखा जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति अधिकारों में बराबरी मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर भी कानून

असम का यूसीसी केवल शादी तक सीमित नहीं है। इसमें लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी ढांचे में शामिल किया गया है। ऐसे संबंधों का एक महीने के भीतर पंजीकरण कराना होगा। इन संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा और छोड़े गए साथी को आर्थिक सहायता मांगने का अधिकार होगा। यही प्रावधान सबसे अधिक विवाद का विषय बना हुआ है। कुछ लोग इसे आधुनिक सामाजिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने वाला कदम मान रहे हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सरकारी निगरानी बढ़ सकती है।

कानून तोड़ने पर सख्त सजा

कानून में कड़े दंड का भी प्रावधान रखा गया है। बहुविवाह, धोखाधड़ी या तथ्य छिपाकर शादी करने पर सात साल तक की जेल हो सकती है। समय पर विवाह या लिव-इन संबंध का पंजीकरण न कराने पर जुर्माना लगाया जाएगा। फर्जी दस्तावेज देने पर जेल और जुर्माना दोनों हो सकते हैं।

अनुसूचित जनजातियों को क्यों रखा गया बाहर?

असम की बड़ी आबादी जनजातीय समुदायों से जुड़ी है। इन समुदायों की अपनी सामाजिक परंपराएं और पारिवारिक कानून हैं। सरकार का कहना है कि संविधान इन समुदायों को विशेष सुरक्षा देता है, इसलिए उन्हें यूसीसी से बाहर रखा गया है। यह कदम राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

क्या पूरे देश में लागू हो सकता है ऐसा कानून?

असम का यूसीसी राष्ट्रीय राजनीति में भी बड़ा संदेश माना जा रहा है। भाजपा लंबे समय से देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात करती रही है। ऐसे में असम का मॉडल भविष्य में दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन सकता है। हालांकि पूरे देश में यूसीसी लागू करना आसान नहीं माना जाता क्योंकि भारत की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता बहुत व्यापक है।

अब आगे क्या?

अब यह विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मंजूरी मिलने के बाद सरकार नियम अधिसूचित करेगी और फिर इसे लागू किया जाएगा। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मुताबिक पूरी प्रक्रिया में तीन से छह महीने लग सकते हैं।

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