Times Now Navbharat
live-tv
Premium

गुजरात का छात्र आंदोलन, जिसे देखने पहुंचे जेपी और फिर हिला दी इंदिरा गांधी की सत्ता

गुजरात में एक कॉलेज से शुरू हुए आंदोलन को देखने जब जय प्रकाश नारायण (JP) जाते हैं, तब बिहार वापस आकर संपूर्ण क्रांति का नारा दे देते हैं, जिसके कारण इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सत्ता चली जाती है।

Image
गुजरात के मोरबी आंदोलन से क्या सीखे थे जेपी (AI Photo)
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Jul 25, 2026, 18:55 IST
Follow on Google News

भारत में आज एक बार फिर से एक छात्र आंदोलन की जीत हुई है, यह जीत भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश के लिए काफी अहम है। इससे एक बार फिर साबित होता है, कि छात्र जब सड़क उतरते हैं, जब जनता सड़क पर उतरती है तो सरकारें हिल जाया करती हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है, जो आज हुआ है, वो सालों पहले हो चुका है। आजादी के बाद छात्र आंदोलनों के कारण सीएम से लेकर पीएम तक की कुर्सी जा चुकी है। एक समय में इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया (India is Indira, and Indira is India) का नारा लगाने वाली सरकार, ऐसे ही एक छात्र आंदोलन में चली गई थी। जिस आंदोलन के कारण कभी इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार गई थी, जिस जय प्रकाश नारायण (JP) ने उस आंदोलन का नेतृत्व किया था, वो भी किसी ऐसे ही छात्र आंदोलन से सीख लेकर बिहार में उतरे थे और जब उतरे तो इंदिरा गांधी की सरकार को उखाड़ फेंका, जो उस समय की सबसे ताकतवर नेता थीं। आइए जानते हैं जेपी के उस सीख की कहानी, जो उन्हें कभी गुजरात के मोरबी में मिली थी।

मोरबी का वो आंदोलन, जिसमें चली थी सीएम की कुर्सी

साल था 1973, गुजरात में कांग्रेस की सरकार थी, चिमनभाई पटेल तब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते था। राज्य में खाने-पीने की वस्तुओं की महंगाई से जनता त्रस्त थी, भ्रष्टाचार के आरोप सीधे चिमनभाई पटेल पर लग रहे थे। तभी दिसंबर में मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज में कैंटीन में खाने के दाम बढ़ा दिए जाते हैं, छात्र इस वृद्धि से भड़क जाते और फिर प्रदर्शन करने उतर जाते हैं, सख्त कार्रवाई होती है, 40 छात्र सस्पेंड कर दिए जाते हैं और कॉलेज भी अस्थाई तौर पर बंद कर दिया जाता है।

धीरे-धीरे यह आंदोलन तेजी से एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज और फिर दूसरे कॉलेज से तीसरे कॉलेज तक फैलते चला जाता है। पुलिस से झड़पें होने लगती हैं। 7 जनवरी 1974 से शिक्षण संस्थानों में अनिश्चितकाल के लिए हड़ताल शुरू हो जाता है। सरकार सख्ती करती जाती है और आंदोलन फैलते जाता है। छात्रों के द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन 1974 के आगे बढ़ते-बढ़ते बाकी संस्थानों में पहुंचने लगता है। सरकारी से लेकर निजी कर्मचारियों तक का संगठन प्रदर्शन शुरू कर देते हैं, जबरदस्त हिंसा होती है। छात्रों, वकीलों और प्रोफेसरों ने आगे चलकर नव निर्माण युवक समिति का गठन किया। जनवरी 1974 में राज्यवापी हड़ताल हुआ, सरकार ने जमकर दमन किया, 33 शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया, सेना को बुला लिया गया। आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाता है। विरोध बढ़ते जाता है, पुलिस की कार्रवाई जारी रहती है।

फिर एंट्री होती है, तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की, चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देने के लिए कहा जाता है और 9 फरवरी 1974 को चिमनभाई पटेल को आखिरकार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ जाता है। हालांकि ये आंदोलन यहीं खत्म नहीं होता है, यह और आगे चलता है। इतिहास में इस आंदोलन को नवनिर्माण आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

गुजरात का नव निर्माण आंदोलन (फोटो- PIB)

गुजरात का नव निर्माण आंदोलन (फोटो- PIB)

बिहार में आंदोलन और जेपी पहुंचे मोरबी

मोरबी में जब सरकार के खिलाफ छात्रों का यह आंदोलन चल रहा था, तब जय प्रकाश नारायण भी वहां पहुंचे थे। उन्होंने गुजरात में हुई इस क्रांति को काफी करीब से देखा और समझा था। यह वो दौर था जब बिहार में छात्र आंदोलन सुलग चुका था। छात्र जिसमें लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी जैसे युवा शामिल थे, कांग्रेस की सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। राज्य में अब्दुल गफूर मुख्यमंत्री थे। एक तरफ सीएम आश्वासन दे रहे थे तो दूसरी ओर रोज पुलिस और छात्र भिड़ रहे थे, आंदोलन हिंसक हो चुका था। जय प्रकाश नारायण 11 फरवरी को गुजरात में मोरबी आंदोलन को देखते हैं, समझते हैं और फिर 30 मार्च 1974 को बिहार आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

खड़ा हो जाता है पूरा देश

जेपी जब बिहार के आंदोलन का नेतृत्व करने जाते हैं, तब किसी को नहीं लगता है कि यह आंदोलन इंदिरा गांधी के खिलाफ हो जाएगा। पहले राज्य दर राज्य आंदोलन शुरू होता है, जिसके नेतृत्व के केंद्र में धीरे-धीरे जय प्रकाश नारायण आते चले जाते हैं। गुजरात का आंदोलन भी राज्य से निकलकर केंद्र की ओर होता है और बिहार से जेपी भी दिल्ली की ओर निकल चलते हैं। 13-14 अप्रैल 1974 को जेपी दिल्ली में रहते हैं, एक सम्मेलन में हिस्सा लेते हैं, सरकार से इस्तीफे की मांग की जाती है, लेकिन आंदोलन उसमें सफल नहीं होता। इससे पहले और इस दौरान मध्य प्रदेश से लेकर बिहार तक, छात्रों के आंदोलन के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करती है, कई छात्र मारे जाते हैं, सैकड़ों को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

फिर आता है 5 अप्रैल 1974, जेपी संपूर्ण क्रांति का नारा दे देते हैं। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जेपी यह नारा सैकड़ों लोगों के सामने देते हैं, उनके नारे का असर ये होता है कि शहर से लेकर गांव तक से लोग निकलने लगते हैं, जात-पात तोड़ने लगते हैं, लेकिन इंदिरा गांधी नहीं झुकती है। गुजरात में झुकने का परिणाम वो देख चुकी थी, बिहार में वो उसे दोहराना नहीं चाहती थीं।

बिहार आंदोलन (फोटो- PIB)

बिहार आंदोलन (फोटो- PIB)

इमरजेंसी और इंदिरा शासन खत्म

1974 की लड़ाई साल खत्म होते-होते विशाल हो जाती है। 1975 आ जाता है, देश भर में चल रहे आंदोलनों के बीच मोरारजी देसाई की भूख हड़ताल के बाद गुजरात में चुनाव होते हैं और वहां कांग्रेस हार जाती है। जिस 12 जून 1975 को गुजरात विधानसभा चुनाव का परिणाम आता है, उसी दिन इंदिरा गांधी के खिलाफ कोर्ट का फैसला आ जाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट चुनावी कदाचार का दोषी मानते हुए इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर देता है, 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक भी लगा देता है। इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, लेकिन पूरी तरह से राहत नहीं मिलती है। इंदिरा गांधी पीएम पद पर तो रह सकती थीं, लेकिन मतदान में हिस्सा नहीं ले सकती थीं। 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति इमरजेंसी का ऐलान कर देते हैं। इसी के बाद जय प्रकाश नारायण समेत ज्यादातर विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। एक साल पहले तक जो इंदिरा गांधी अजेय थी, वो अब हार की कगार पर खड़ी थी। सत्ता बचाने के लिए इमरजेंसी का दांव चल रही थी। इमरजेंसी के दौरान विपक्षी नेताओं के साथ बहुत बुरा सुलूक हुआ। 21 मार्च 1977 को आखिरकार इंदिरा गांधी काफी आलोचनाओं के बाद इमरजेंसी हटाने का ऐलान करती हैं, चुनाव की घोषणा होती है। जेपी के नेतृत्व में कुछ महीने पहले बनी जनता पार्टी चुनाव में उतरती है और इंदिरा गांधी को सबसे करारी हार का सामना करना पड़ता है।

End of Article