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50 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी से कैसे लड़ते हैं दुनिया के देश? जानिए एक्सट्रीम हीट से बचने के बड़े उपाय और चुनौतियां

Heatwave Explained: इस समय देश का खासकर उत्तर भारत हिस्सा भयंकर गर्मी की चपेट में है। दुनिया के कई देशों में तापमान 50°C तक पहुंच रहा है, जिससे जीवन और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा बढ़ गया है। जानिए एक्सट्रीम हीट से बचने के लिए दुनिया किन तरीकों का इस्तेमाल करती है।

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कूलिंग सेंटर से स्मार्ट टेक्नोलॉजी तक, गर्मी से बचने के नए तरीके (Photo: AI Generated)
Authored by: monu jha
Updated May 24, 2026, 23:15 IST

Heatwave Explained: दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि बड़ी चुनौती बन चुकी है। भारत, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कुवैत, कतर, ईरान और ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में तापमान (Extreme Heat) कई बार 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ऊपर पहुंच जाता है। इतनी भीषण गर्मी में सामान्य जीवन जीना आसान नहीं होता। सड़कें तपने लगती हैं, बिजली की मांग बढ़ जाती है और हीटस्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि इन देशों के लोग सदियों से गर्म इलाकों में रह रहे हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब गर्मी पहले से ज्यादा खतरनाक हो गई है। ऐसे में ये देश पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से गर्मी से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

गर्म देशों में घर और इमारतें इस तरह बनाई जाती हैं कि अंदर कम गर्मी पहुंचे। मध्य पूर्व के पुराने शहरों में संकरी गलियां, मोटी दीवारें और अंदर की तरफ बने आंगन आम बात हैं। इनसे धूप सीधे घरों में नहीं पहुंचती और अंदर ठंडक बनी रहती है। कई जगहों पर 'विंड टावर' या 'बादगीर' का इस्तेमाल किया जाता था। ये हवा को ऊपर से पकड़कर नीचे कमरों तक पहुंचाते थे, जिससे बिना बिजली के प्राकृतिक ठंडक मिलती थी। दीवारों और छतों में हल्के रंग के पत्थर या चूने का इस्तेमाल किया जाता था ताकि धूप कम सोखी जाए।

आज के समय में इन पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक भी जुड़ गई है। अब 'कूल रूफ' यानी हल्के रंग की छतें, ग्रीन रूफ, बेहतर इंसुलेशन और स्मार्ट एयर कंडीशनिंग सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इससे बिजली की खपत कम होती है और इमारतें ज्यादा ठंडी रहती हैं।

कई शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जा रहे हैं। रिसर्च बताती है कि पेड़ों और हरियाली से शहर का तापमान 2 से 5 डिग्री तक कम किया जा सकता है।

(Photo: iStock)

(Photo: iStock)

काम करने के समय में होता है बदलाव

50°C तापमान में दोपहर के समय बाहर काम करना जानलेवा हो सकता है। इसलिए कई खाड़ी देशों में गर्मियों के दौरान दोपहर में आउटडोर काम पर रोक लगा दी जाती है। UAE, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों में जून से सितंबर तक दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच निर्माण कार्य और अन्य भारी काम रोक दिए जाते हैं। इसका उद्देश्य मजदूरों को हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से बचाना होता है।

कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को ज्यादा पानी, इलेक्ट्रोलाइट्स और आराम के लिए ब्रेक देती हैं। कुछ जगहों पर “कूलिंग वेस्ट” भी पहनाए जाते हैं, जो शरीर को ठंडा रखने में मदद करते हैं। दुनिया के कई गर्म देशों में 'सिएस्टा' यानी दोपहर में आराम करने की संस्कृति भी काफी पुरानी है। लोग सुबह जल्दी काम शुरू करते हैं, दोपहर में आराम करते हैं और शाम को दोबारा काम करते हैं।

(Photo: iStock)

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हीट एक्शन प्लान

गर्मी से मौतों को रोकने के लिए कई देशों ने 'हीट एक्शन प्लान' शुरू किए हैं। भारत का अहमदाबाद शहर इसका बड़ा उदाहरण माना जाता है।

2013 में अहमदाबाद ने हीट एक्शन प्लान (Heatwave Alert) शुरू किया था। इसके तहत लोगों को पहले से चेतावनी दी जाती है कि आने वाले दिनों में तापमान कितना बढ़ सकता है। रेडियो, टीवी, मोबाइल मैसेज और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को सावधान किया जाता है।

इसके अलावा शहरों में पानी की व्यवस्था, कूलिंग सेंटर और अस्पतालों में विशेष तैयारी की जाती है। मजदूरों और बुजुर्गों को गर्मी से बचने के लिए विशेष निर्देश दिए जाते हैं। बाद में भारत के 100 से ज्यादा शहरों ने इस मॉडल को अपनाया। पाकिस्तान के कराची जैसे शहरों में भी कूलिंग सेंटर और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। वहीं सऊदी अरब में हज जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान खास हीट हेल्थ सिस्टम लागू किए जाते हैं।

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गर्मी के समय लोगों की आदतों में बदलाव

भीषण गर्मी से लड़ने में लोगों की आदतें भी बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। गर्म देशों में लोग हल्के और ढीले कपड़े पहनते हैं। सफेद या हल्के रंग के कपड़े धूप को कम सोखते हैं, इसलिए उनका ज्यादा इस्तेमाल होता है। लोग सिर को कपड़े, टोपी या छाते से ढककर रखते हैं। दिन के सबसे गर्म समय में बाहर निकलने से बचते हैं और सुबह या शाम को जरूरी काम करते हैं।

पानी पीना सबसे जरूरी माना जाता है। कई जगह लोग सिर्फ पानी ही नहीं, बल्कि नमक और इलेक्ट्रोलाइट वाले पेय भी लेते हैं ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। मॉल, मस्जिदें और सार्वजनिक भवन कई बार अस्थायी “कूलिंग सेंटर” में बदल दिए जाते हैं, जहां लोग कुछ समय ठंडक में बिता सकें।

(Photo: iStock)

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तकनीक की मदद

आज कई देश 'अर्बन हीट आइलैंड' समस्या से लड़ रहे हैं। शहरों में ज्यादा कंक्रीट और कम हरियाली के कारण तापमान गांवों से ज्यादा हो जाता है।

इसे कम करने के लिए सरकारें परावर्तक सड़कें (Reflective Roads), ठंडी फुटपाथें (Cool Pavements) और ज्यादा पेड़ लगाने पर काम कर रही हैं। सार्वजनिक बसों, मेट्रो और इमारतों में एयर कंडीशनिंग को बेहतर बनाया जा रहा है। कुछ शहरों में खुले इलाकों में धुंध प्रणाली (Misting Systems) लगाए जाते हैं, जो हवा में पानी की हल्की फुहार छोड़ते हैं और आसपास का तापमान कम करते हैं।

सबसे बड़ी चुनौती

गर्मी से लड़ाई आसान नहीं है। गरीब और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। हर किसी के पास एयर कंडीशनर नहीं होता और कई लोगों को गर्मी में भी काम करना पड़ता है। दूसरी तरफ AC के ज्यादा इस्तेमाल से बिजली की मांग बढ़ती है। इससे बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले समय में 50°C वाले दिन और बढ़ सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो गर्मी और ज्यादा खतरनाक हो सकती है।

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