Jantar Mantar: जंतर-मंतर की पहचान एक प्रदर्शन स्थल के रूप में है लेकिन सरकार ने अब प्रदर्शन के नामित स्थल के रूप में इसकी पहचान वापस ले ली है। अब यहां प्रदर्शन नहीं होंगे। बीते 23 साील से यह स्थान छोटे-बड़े प्रदर्शनों एवं जनांदोलनों का गवाह रहा है। नामित प्रदर्शन स्थल की वापसी वाले गृह मंत्रालय के फैसले की घोषणा दिल्ली पुलिस ने सोमवार को की। हालांकि, सरकार के इस फैसले का विरोध भी हो रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का कहना है कि उसके विरोध-प्रदर्शन से सरकार डर गई है। कई लोगों का कहना है कि दुनिया में ऐसे कई प्रदर्शन स्थल हैं जो कि राजधानियों के बीचों-बीच स्थित हैं। हालांकि, प्रदर्शन स्थल का दर्जा वापस लेने के पीछे सरकार का अपना तर्क है। सरकार ने प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली में तीन जगहों के नाम दिए हैं। इनमें पहला है, मध्य दिल्ली स्थित रामलीला मैदान, दूसरा है उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली स्थित बुराड़ी और तीसरा है पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड।
18वीं सदी की खगोलीय वेधशाला के पास स्थित सड़क का यह हिस्सा पिछले दो दशकों से अधिक समय से दिल्ली में राजनीतिक असहमति और विरोध प्रदर्शनों के सबसे पहचाने जाने वाले स्थलों में से एक रहा है। यहां भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं, आंदोलनकारी किसानों, छात्रों, सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों और यहां तक कि ओलंपिक पदक विजेता पहलवानों ने भी प्रदर्शन किया है। पहलवानों ने कथित यौन उत्पीड़न के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर यहां धरना दिया था।
जंतर-मंतर से पहले बोट क्लब पर होता था प्रदर्शन
1980 के दशक के आखिर तक इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब, जो अब कर्तव्य पथ का हिस्सा है, दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक रैलियों का प्रमुख स्थल था। इसे ‘रेजिस्टेंस स्क्वायर’ यानी प्रतिरोध का चौक भी कहा जाता था। अक्टूबर 1988 में एक निर्णायक घटना हुई, जब भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने राजधानी में किसानों का विशाल आंदोलन किया। करीब पांच लाख किसान बोट क्लब और आसपास के लॉन में जुटे थे, जिससे मध्य दिल्ली का बड़ा हिस्सा ठप हो गया था। यह आंदोलन तब समाप्त हुआ, जब तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने किसानों की मांगों पर आश्वासन दिया। इनमें बिजली की दरों और गन्ने की कीमतों से जुड़े मुद्दे शामिल थे। टिकैत के आंदोलन के बाद सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए बोट क्लब से विरोध प्रदर्शनों को दूसरी जगह ले जाने का फैसला किया। सरकार के अनुसार, बोट क्लब प्रधानमंत्री कार्यालय और लुटियंस दिल्ली में स्थित वित्त एवं विदेश मंत्रालयों के काफी करीब था। धीरे-धीरे प्रदर्शन बोट क्लब से दूसरी जगहों पर स्थानांतरित होने लगे। हालांकि, जंतर-मंतर को औपचारिक रूप से 2003 में ही ‘प्रदर्शन स्थल’ घोषित किया गया। यहां प्रदर्शनकारियों की अधिकतम संख्या 5,000 निर्धारित की गई और आयोजकों को क्षेत्र में वाहन लाने की अनुमति नहीं दी गई।
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
जंतर-मंतर से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण आंदोलनों में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शामिल है। अप्रैल 2011 में उन्होंने सरकारी पदों पर भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक सशक्त जन लोकपाल कानून बनाने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। प्रदर्शनकारियों की संख्या निर्धारित 5,000 की सीमा से अधिक होने के बाद आंदोलन का विस्तार हुआ और इसे रामलीला मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। रामलीला मैदान में अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, राम जेठमलानी, मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, कर्नल देविंदर सहरावत, सुनीता गोदारा, हर्ष मंदर, दिल्ली के आर्चबिशप और न्यायमूर्ति डी. एस. तेवतिया सहित कई प्रमुख हस्तियां पहुंचीं। इस आंदोलन ने देशभर का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद केंद्र की तत्कालीन सरकार लोकपाल विधेयक तैयार करने के लिए मंत्रियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त मसौदा समिति बनाने पर सहमत हुई। इस आंदोलन ने 2012 में आम आदमी पार्टी (AAP) के गठन का रास्ता भी तैयार किया। पार्टी ने आगे चलकर 2013 में दिल्ली में सरकार बनाई।
निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा की मांग
दिसंबर 2012 में दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके बाद राजधानी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। जंतर-मंतर छात्रों और युवाओं के जुटने का एक प्रमुख केंद्र बन गया। प्रदर्शनकारियों ने पीड़िता को न्याय दिलाने, यौन हिंसा के खिलाफ कड़े कानून बनाने और महिलाओं की सुरक्षा बेहतर करने की मांग की। निर्भया आंदोलन देशव्यापी आक्रोश का हिस्सा बन गया। इसके बाद सरकार ने 2013 में कानून में संशोधन करके यौन अपराधों से संबंधित कानूनी प्रावधानों में व्यापक बदलाव किए।
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तमिलनाडु के किसानों का 100 दिनों से अधिक का आंदोलन
2017 में तमिलनाडु के किसानों ने कार्यकर्ता पी. अय्याकन्नू के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर 100 दिनों से अधिक समय तक प्रदर्शन किया। उनका उद्देश्य राज्य में कृषि संकट की ओर ध्यान आकर्षित करना था। यह संकट तमिलनाडु में पिछले 140 वर्षों के सबसे भीषण सूखे के बाद और गंभीर हो गया था। अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी के किसानों से मुलाकात करने और उनकी समस्याओं पर आश्वासन देने के बाद आंदोलन अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया। हालांकि, किसानों ने बाद में यह कहते हुए फिर से प्रदर्शन शुरू किया कि उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई है।
वन रैंक वन पेंशन के लिए पूर्व सैनिकों का आंदोलन
जंतर-मंतर उन पूर्व सैन्यकर्मियों के आंदोलन का भी प्रमुख केंद्र बना, जो वन रैंक वन पेंशन (OROP) योजना लागू करने की मांग कर रहे थे। इंडियन एक्स-सर्विसमेन मूवमेंट (IESM) के बैनर तले पूर्व सैनिकों ने 2015 में यहां भूख हड़ताल शुरू की। उनकी मांग थी कि समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले सेवानिवृत्त सैनिकों को एक समान पेंशन व्यवस्था का लाभ मिले, भले ही उनकी सेवानिवृत्ति का समय अलग-अलग रहा हो। इस आंदोलन के दौरान सेवानिवृत्त कर्नल पुष्पेंद्र सिंह सहित कई पूर्व सैनिकों ने भूख हड़ताल की।
CAA-NRC विरोध प्रदर्शन
2019 और 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान जंतर-मंतर एक बार फिर प्रदर्शनकारियों के जुटने का प्रमुख स्थान बना।
2023 में पहलवानों का धरना
2023 में ओलंपिक पदक विजेता और अन्य प्रमुख भारतीय पहलवानों ने जंतर-मंतर पर करीब एक महीने तक धरना दिया। उन्होंने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के तत्कालीन अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई की मांग की। इस आंदोलन का नेतृत्व विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया जैसे पहलवानों ने किया।
NEET-UG पेपर लीक के आरोपों पर युवाओं का आंदोलन
इस साल जून और जुलाई में जंतर-मंतर 2026 की NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक को लेकर युवाओं के नेतृत्व में हुए आंदोलन का केंद्र बना। CJP ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू किया। प्रदर्शन शुरू होने के कुछ दिनों बाद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने खुद को ‘मानद कॉकरोच’ घोषित किया और छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। जंतर-मंतर की यह यात्रा दिखाती है कि कैसे एक ऐतिहासिक धरोहर के आसपास का स्थान समय के साथ किसानों, छात्रों, महिलाओं, पूर्व सैनिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की आवाज उठाने का प्रमुख मंच बन गया।
जयपुर के महाराज ने कराया जंतर-मंतर का निर्माण
इस सड़क और यहां स्थित प्रदर्शन स्थल का नाम खगोलीय वेधशाला के नाम पर पड़ा, जिसका निर्माण जयपुर के सवाई महाराजा जय सिंह द्वितीय ने 1724 में कराया था। तीन शताब्दियों से अधिक समय से यह वेधशाला भारत की स्थापत्य विरासत और इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल के रूप में खड़ी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, इसके विशाल परिसर में कई प्रमुख खगोलीय यंत्र हैं। इनमें सम्राट यंत्र शामिल है, जो पृथ्वी की धुरी के अनुरूप बनाए गए आधार वाला विशाल त्रिकोणीय धूपघड़ी यंत्र है। जयप्रकाश यंत्र में दो अर्धगोलाकार संरचनाएं हैं, जिनसे सूर्य और तारों की स्थिति का पता लगाया जाता है। राम यंत्र में दो गोलाकार इमारतें हैं, जिनसे क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर कोण मापे जाते हैं। वहीं, मिश्र यंत्र ऐसा संयुक्त यंत्र है, जो विभिन्न महाद्वीपों में समय बताने और सूर्य की कर्क राशि में प्रवेश की स्थिति का पता लगाने में मदद करता है।
1930 तक यह मैदान एक तालाब हुआ करता था
अधिकारियों के अनुसार, 1930 तक यह मैदान एक तालाब हुआ करता था, जिसे भरकर समतल कर दिया गया ताकि वहां रामलीला का मंचन किया जा सके। यह परंपरा 1932 में शुरू हुई और आज भी जारी है, जिससे इस मैदान को इसका यह नाम मिला। आजादी के बाद, 1951 में, पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को आजीविका उपलब्ध कराने के लिए इस इलाके का विकास किया गया। यह मैदान दशकों की अपनी यात्रा में, देश की राजनीति का मंच बन गया। 1952 में, भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर के भारत में एकीकरण की मांग को लेकर अपना सत्याग्रह शुरू किया था।
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2013 में केजरीवाल ने सीएम पद की ली शपथ
प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहरलाल नेहरू ने 1956 और 1957 में रामलीला मैदान में विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। वहीं, 1962 में भारत की यात्रा पर आईं महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के सम्मान में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए वहां एक स्थायी मंच बनाया गया था। वर्ष 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर मिली जीत के बाद इंदिरा गांधी ने यहां एक रैली को संबोधित किया था और 26 नवंबर 1974 को तत्कालीन सोवियत संघ के नेता लियोनिद ब्रेझनेव के सम्मान में एक जनसभा आयोजित की गई थी। इसके कुछ साल बाद, 25 जून 1975 को, जिस दिन आपातकाल की घोषणा की गई थी, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी मैदान में एक रैली को संबोधित किया था। अरविंद केजरीवाल ने 2013 में इसी जगह मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
विश्व में कई प्रदर्शन स्थल शहरों के बीच में
दिल्ली में जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद इस सवाल पर फिर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या शहर के बीचोंबीच प्रदर्शन की अनुमति दी जानी चाहिए? हालांकि, दुनिया भर में ऐसे कई प्रमुख स्थान हैं, जो शहरों के मध्य में हैं और जहां लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अपनी बात रखने और प्रदर्शन करने की अनुमति है। लंदन के स्पीकर्स कॉर्नर, ट्राफलगर स्क्वायर और पार्लियामेंट स्क्वायर से लेकर न्यूयॉर्क के यूनियन स्क्वायर, वाशिंगटन के लाफायेट स्क्वायर और नेशनल मॉल, इस्तांबुल के तकसीम स्क्वायर, सिंगापुर के हांग लिम पार्क और पेरिस के प्लेस डे ला बास्तील तक, ये सभी शहर के प्रमुख हिस्सों में स्थित हैं। इसके अलावा, काहिरा का तहरीर स्क्वायर, कीव का मैदान नेजालेझनोस्ती और बीजिंग का तियानमेन स्क्वायर हाल के इतिहास में हुए कुछ सबसे बड़े प्रदर्शनों के लिए दुनिया भर में चर्चित रहे हैं।
