West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल के फाल्टा (Falta Assembly Seat) इलाके में मतदान केंद्रों को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव आयोग (Election Commission of India) और राज्य के विशेष पर्यवेक्षक की जांच में जो बातें सामने आई हैं, वे न सिर्फ चिंताजनक हैं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना पर भी सीधा प्रहार करती हैं। इस पूरे मामले को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह केवल एक क्षेत्र तक सीमित घटना नहीं, बल्कि चुनावी प्रबंधन की विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। सवाल ये है कि आखिर फाल्टा में ऐसा क्या-क्या हुआ, जिसके कारण चुनाव आयोग को यहां का मतदान ही कैंसिल कर देना पड़ेगा और वोटिंग के लिए नई तारीख निकालनी पड़ गई।
फाल्टा में होगा फिर से मतदान (AI Photo)
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में छेड़छाड़
रिपोर्ट के मुताबिक सबसे गंभीर आरोप इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी Electronic Voting Machine के साथ कथित छेड़छाड़ को लेकर है। बताया गया कि करीब 60 मतदान केंद्रों-जो कुल बूथों का लगभग 21 प्रतिशत हैं-पर बैलेट यूनिट के बटनों पर काली टेप और गोंद चिपकाया गया था। इसका सीधा असर मतदाताओं की स्वतंत्र पसंद पर पड़ता है, क्योंकि वे अपनी पसंद के उम्मीदवार को सही तरीके से वोट ही नहीं दे पाते। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ बटनों पर इत्र लगाया गया था, ताकि बाद में यह पता लगाया जा सके कि किस मतदाता ने किस उम्मीदवार को वोट दिया। अगर यह दावा सही है, तो यह मतदाता की गोपनीयता के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन है, जो किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की आधारशिला होता है।
चुनाव आयोग ने किस आधार पर किया फैसला?
चुनाव आयोग ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणियों में कहा है कि इस तरह की संगठित छेड़छाड़ के चलते वास्तविक जनादेश को समझ पाना मुश्किल हो जाता है। यानी चुनाव के नतीजे कितने सही हैं, इस पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है, लेकिन अगर वोटिंग प्रक्रिया ही प्रभावित हो जाए, तो पूरे चुनाव की वैधता पर संदेह पैदा हो जाता है।
फाल्टा सीट पर ईवीएम में छेड़छाड़ का दावा (फोटो- @amitmalviya)
एक छोड़िए कई नियमों का उल्लंघन
इसके अलावा, मतदान प्रक्रिया के दौरान कई तरह की अनियमितताओं के भी आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट में “कंपैनियन वोटिंग” के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जी मतदान की बात कही गई है, जिसमें असली मतदाता की जगह कोई और व्यक्ति वोट डालता है। कई बूथों के अंदर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की अवैध मौजूदगी भी दर्ज की गई, जो मतदाताओं पर दबाव बना सकती है। कुछ मामलों में तो एक ही व्यक्ति द्वारा कई बार वोट डालने और मतदान कक्ष के अंदर एक साथ दो लोगों के होने की घटनाएं भी सामने आईं। यह सब चुनाव आचार संहिता और मतदान के मूल नियमों का खुला उल्लंघन है।
पोलिंग एजेंट भी कर रहे थे 'खेला'
और भी गंभीर बात यह है कि कुछ जगहों पर पोलिंग एजेंट खुद मतदाताओं की जगह वोट डालते पाए गए। यह न केवल गैरकानूनी है, बल्कि पूरे चुनावी ढांचे की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। अगर मतदान केंद्र के अंदर ही इस तरह की गतिविधियां होती हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि स्थानीय स्तर पर निगरानी और नियंत्रण पूरी तरह विफल रहा।
वीडियो फुटेज भी गायब?
सबूतों के साथ छेड़छाड़ का मुद्दा भी इस मामले को और जटिल बनाता है। कई बूथों के महत्वपूर्ण वीडियो फुटेज या तो गायब बताए गए हैं या फिर उपलब्ध ही नहीं कराए गए। खासतौर पर मतदान के अंतिम घंटों का डेटा न होना जांच को और मुश्किल बना देता है। कुछ रिकॉर्डिंग चिप्स खाली पाए गए, जबकि कुछ में दूसरे राज्यों के पुराने चुनावों के वीडियो मिले। क्लाउड पर मौजूद डेटा भी या तो अधूरा था या रुक-रुक कर रिकॉर्ड हुआ, जिससे शिकायतों की पुष्टि करना कठिन हो गया।
प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में
इन सबके बीच प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। विशेष पर्यवेक्षक की रिपोर्ट में कहा गया है कि कई पीठासीन अधिकारियों और मतदान स्टाफ ने अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन नहीं किया। इतना ही नहीं, रिटर्निंग ऑफिसर (RO) और जनरल ऑब्जर्वर की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए हैं। जो ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (ATR) भेजी गई, वह जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती पाई गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि स्थिति को सही ढंग से रिपोर्ट ही नहीं किया गया।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब तक इन शिकायतों पर कार्रवाई शुरू हुई, तब तक करीब 86 प्रतिशत से अधिक मतदान इन्हीं विवादित परिस्थितियों में हो चुका था। इसका मतलब है कि अगर गड़बड़ियां हुई भी हैं, तो उनका असर बड़े पैमाने पर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है।
फाल्टा के मतदान केंद्रों से जुड़ी यह रिपोर्ट केवल स्थानीय स्तर की समस्या नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा अलार्म है। यह जरूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग इस मामले की गहराई से जांच करे, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मजबूत तंत्र विकसित किया जाए। लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि चुनाव कितने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराए जाते हैं, और इस तरह की घटनाएं उस भरोसे को कमजोर करती हैं।
