IMF Outlook Explained : फिलहाल पूरी दुनिया की इकोनॉमी अजीब दौर से गुजर रही है। एक तरफ युद्ध, महंगा ईंधन, ट्रेड प्रतिबंध और कमजोर होती ग्लोबल डिमांड का दबाव है। दूसरी तरफ Artificial Intelligence यानी AI में भारी निवेश और टेक्नोलॉजी से पैदा हो रही नई डिमांड आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे रही है। इनके बीच में बढ़ती ब्याज दरें, घटती नौकरियां और महंगाई आम आदमी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहे हैं।
बहरहाल, World Economic Forum के सितंबर 2026 Chief Economists Outlook में ग्लोबल इकोनॉमी को थोड़ी सुस्त तस्वीर दिखी है। सर्वे में 45% चीफ इकोनॉमिस्ट ये मानते हैं कि अगले 12 महीनों में ग्लोबल परिस्थितियों के कमजोर बने रहने की आशंका है। वहीं, 56% का मानना है कि हालात या तो जैसे हैं वैसे ही रह सकते हैं या थोड़ा सुधार हो सकता है।
दबाव में क्यों ग्लोबल इकोनॉमी?
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव का सबसे बड़ा कारण जियो पॉलिटकल तनाव है और एनर्जी सप्लाई शॉक है। WEF के सर्वे में 97% मुख्य अर्थशास्त्रियों ने माना है कि अगले 12 महीनों तक जियो पॉलिटिक अस्थिरता ग्लोबल इकोनॉमी के लिए सबसे बड़ा रिस्क है। इसके बाद 58% अर्थशास्त्रियों ने एसेट प्राइस करेक्शन, 44% ने बड़े तकनीकी बदलाव (AI-Humanoid) और 42% ने ट्रेड और निवेश प्रतिबंधों को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौतियां माना है। यानी मसला सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। लेकिन, युद्ध सबसे बड़ा मसला है क्योंकि अगर तेल, गैस, फर्टिलाइजर या शिपिंग महंगी होती है, तो उसका असर लगभग पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। IMF के मुताबिक 2026 में वैश्विक स्तर पर महंगाई दर 4.7% तक पहुंच सकती है। यानी महंगाई में, जो गिरावट पिछले कुछ समय से दिख रही थी, वह फिलहाल रुक गई है।
भारत की ग्रोथ की 5 बड़ी वजह
क्यों कमजोर नजर आ रहा अगला एक साल?
ग्लोबल ग्रोथ का अनुमान 2026 के लिए 3% है, जो 2024-25 के करीब 3.5% औसत से कम है। यही वजह है कि आने वाला साल बहुत तेज ग्रोथ वाला दौर नहीं माना जा रहा। दूसरी समस्या यह है कि दुनिया के कई देशों ने पिछले कुछ वर्षों में महामारी, युद्ध और ईंधन आपूर्ति के झटकों से निपटने के लिए फिस्कल सपोर्ट दिया है। WEF के मुताबिक 2020 के बाद ग्लोबल इकोनॉमी को संभालने में फिस्कल सपोर्ट सबसे बड़ा सहारा रहा, जिसे 69% चीफ इकोनॉमिस्ट ने सुस्त ग्रोथ के के प्रमुख कारणों में शामिल किया है। इसके साथ ही अब कई देशों पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ चुका है कि उनके पास पहले जैसी आर्थिक गुंजाइश नहीं बची है। इसलिए अगला संकट आने पर हर सरकार बड़े पैमाने पर राहत पैकेज दे पाएं, यह जरूरी नहीं है।
AI इकोनॉमी के लिए दोधारी तलवार
यह तस्वीर का दूसरा और बेहद अहम हिस्सा है। IMF के मुताबिक ग्लोबल GDP और ग्रोथ के लिहाज से देखें, तो युद्ध की वजह से जो नुकसान हुआ है, उस दबाव को हटाने में AI मे हो रहे निवेश ने काफी कम किया है। हालांकि, कई अर्थशास्त्री AI को दोधारी तलवार मान रहे हैं, तो आने वाले दिनों में खासतौर पर बेरोजगारी बढ़ाने वाली सबसे बड़ी वजह बन सकती है। WEF के सर्वे में 97% चीफ इकोनॉमिस्ट इस बात भी सहमत हैं कि अगले 12 महीनों में AI Adoption बढ़ेगा, जबकि 69% को उम्मीद है कि इससे साथर्क नतीजे मिलेंगे। यानी AI सिर्फ एक टेक स्टोरी नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रोथ ड्राइवर बन रही है। 61% अर्थशास्त्री मानते हैं कि AI और Data सेंटर्स में जितना निवेश हुआ है, उसकी तुलना में अगले 12 महीनों में दुनिया में नौकरियां नहीं बनने वाली हैं। यानी AI में निवेश बढ़ सकता है, प्रोडक्टिविटी बढ़ सकती है लेकिन आम लोगों को नौकरिंयां और इनकम मिले यह जरूरी नहीं है।
भारत सबसे अलग राह पर क्यों?
भारत की सबसे बड़ी ताकत इस समय घरेलू खपत है। WEF के सितंबर आउटलुक में भारत को अगले 12 महीनों के लिए सबसे मजबूत ग्रोथ प्रोस्पेक्ट्स वाले क्षेत्रों में रखा गया है। भारत के मामले में 74% चीफ इकोनॉमिस्ट ने मजबूत (Strong) या बहुत मजबूत ग्रोथ (Very Strong Growth) की उम्मीद जताई है। IMF के जुलाई Outlook में भारत की FY2026-27 Growth का अनुमान 6.4% रखा गया है, जबकि 2027 के लिए Growth 6.7% तक पहुंचने का अनुमान है। IMF ने कहा है कि हाई फ्रिक्वेंसी इंडिकेटर्स और हाल के इकोनॉमिक डेटा में भारत की गतिविधियों में रेजिलिएंस दिख रहा है। यानी ग्लोबल इकोनॉमी के कमजोर पड़ने का असर भारत पर पड़ेगा, खासकर लेकिन घरेलू आर्थिक गतिविधियां इसे बड़ा सहारा दे रही हैं।
