अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रही तनावपूर्ण बातचीत अब ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिख रही है,जहां एक बड़ा समझौता संभव माना जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार दोनों पक्ष एक ऐसी डील के करीब हैं,जो न केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करेगी बल्कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध,तेल संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तनाव को भी कम कर सकती है। हालांकि अब भी कई अहम मुद्दों पर अंतिम सहमति बाकी है। यह संभावित समझौता इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार, इजरायल-ईरान संघर्ष और पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे में हम आज विस्तार से समझेंगे कि इस प्रस्तावित समझौते में क्या-क्या है?साथ ही यह भी कि इस समझौते में पेच कहां फंसा हुआ है?
आखिर इस संभावित डील में क्या-क्या शामिल है?
अमेरिकी और क्षेत्रीय अधिकारियों के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान अपने उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) के भंडार को छोड़ने पर सहमत हो सकता है। यह वही मुद्दा है जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार अपनी सबसे बड़ी शर्त बताते रहे हैं।
फिलहाल ईरान के पास करीब 440.9 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है, जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया जा चुका है। तकनीकी रूप से यह हथियार बनाने योग्य 90 प्रतिशत स्तर से बहुत दूर नहीं माना जाता। इसी वजह से पश्चिमी देशों और इजरायल की चिंता लगातार बढ़ती रही है। संभावित योजना के मुताबिक ईरान या तो इस यूरेनियम को कम संवर्धित स्तर पर डायलूट करेगा या फिर इसका एक हिस्सा किसी तीसरे देश को सौंप सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक रूस इस यूरेनियम को अपने पास रखने की पेशकश कर चुका है।
हालांकि ईरान अब भी सार्वजनिक रूप से यह कह रहा है कि परमाणु तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग उसका “वैध अधिकार” है और वह इसे पूरी तरह नहीं छोड़ेगा। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने कहा कि उनका देश दुनिया को भरोसा दिलाने के लिए तैयार है कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है सबसे बड़ा मुद्दा?
यह पूरा समझौता सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। इसका सबसे अहम हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का दोबारा खुलना माना जा रहा है। Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। फरवरी में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद तेहरान ने इस जलमार्ग पर प्रभावी नियंत्रण और प्रतिबंध बढ़ा दिए थे। इसके बाद तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई।
अगर यह समझौता लागू होता है तो अमेरिका ईरान के बंदरगाहों पर लगी पाबंदियां कम कर सकता है और बदले में ईरान धीरे-धीरे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सामान्य शिपिंग के लिए खोल सकता है।
क्या ईरान पर लगे प्रतिबंध हटेंगे?
संभावित समझौते के तहत अमेरिका ईरान को तेल बेचने की सीमित छूट दे सकता है। इसके लिए “सैंक्शंस वेवर” यानी प्रतिबंधों में विशेष राहत दी जा सकती है। इसके अलावा ईरान की विदेशों में जमा फ्रीज की गई संपत्तियों को भी चरणबद्ध तरीके से रिलीज करने पर चर्चा हो रही है। बताया जा रहा है कि इन सभी आर्थिक मुद्दों पर 60 दिनों के भीतर विस्तृत बातचीत होगी। यही वजह है कि अमेरिकी अधिकारी बार-बार कह रहे हैं कि “ब्रॉड फ्रेमवर्क” पर सहमति बन सकती है,लेकिन अंतिम तकनीकी और राजनीतिक समझौते में अभी समय लगेगा।अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते पर आज हस्ताक्षर होने की संभावना नहीं है। ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डील के कई अहम बिंदुओं पर अब भी बातचीत जारी है और दोनों पक्ष कुछ शब्दों व शर्तों को लेकर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कल ट्रंप ने किया था होर्मुज को खोलने का दावा
ट्रंप ने शनिवार को अपनी पोस्ट में कहा कि समझौते के कई अन्य पहलुओं के अलावा,होर्मुज जलडमरूमध्य को खोल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मैं सभी को याद दिलाता हूं कि हमारा अंतिम लक्ष्य यह है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। ईरान कभी परमाणु हथियार विकसित करने की प्रक्रिया में शामिल न हो सके।
समझौते पर हस्ताक्षर क्यों टल गए?
हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया है कि समझौते का “ब्रॉड फ्रेमवर्क” लगभग तैयार है, लेकिन अंतिम तकनीकी और राजनीतिक सहमति अब भी नहीं बन सकी है। ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आज समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद नहीं है क्योंकि कई डिटेल्स अब भी बाकी हैं। उनके मुताबिक, सबसे बड़ा पेच समझौते की भाषा और शर्तों को लेकर फंसा हुआ है। अधिकारी ने कहा कि कुछ शब्द हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं और कुछ उनके लिए। दरअसल अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौतों में इस्तेमाल होने वाले शब्द ही भविष्य की कानूनी व्याख्या और प्रतिबद्धताओं को तय करते हैं। ऐसे में दोनों पक्ष किसी भी शब्द को लेकर बेहद सतर्क हैं।
अमेरिकी अधिकारी ने यह भी कहा कि ईरान की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था तेजी से फैसले लेने वाली नहीं है। वहां किसी भी बड़े समझौते को कई संस्थागत मंजूरियों से गुजरना पड़ता है। इसलिए अंतिम सहमति बनने में अभी कई दिन लग सकते हैं।
इजरायल क्यों असहज है?
वहीं, बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार भी इस संभावित डील को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिख रही है। दरअसल, इजरायल को डर है कि अगर ईरान पर दबाव कम हुआ और प्रतिबंधों में राहत मिली तो हिजबुल्लाह जैसे ईरान समर्थित समूह फिर मजबूत हो सकते हैं। लेबनान सीमा पर पिछले कई महीनों से ड्रोन और रॉकेट हमले जारी हैं। अमेरिका की मध्यस्थता में संघर्षविराम की कोशिशें हुई हैं, लेकिन हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए। हालांकि रिपोर्टों के मुताबिक संभावित समझौते में यह शर्त भी शामिल हो सकती है कि ईरान क्षेत्रीय देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा और लेबनान में तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।
क्या यह डील सच में पश्चिम एशिया को बदल सकती है?
अगर यह समझौता सफल होता है तो इसके असर बेहद बड़े हो सकते हैं।
- तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता आ सकती है
- होर्मुज जलडमरूमध्य सामान्य रूप से खुल सकता है
- अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य टकराव टल सकता है
- इजरायल-ईरान तनाव कुछ हद तक कम हो सकता है
- वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है