US Midterm Election : बीते 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजराइल के संयुक्त के हमले के बाद ही यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए चीजें सही नहीं हुईं। उन्होंने सोचा था कि उनके हवाई हमलों से डरकर ईरान सरेंडर कर देगा। कट्टरपंथी सरकार से नाराज लोग बगावत कर देंगे और तख्तापलट हो जाएगा लेकिन ईरान में ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमले शुरू होने के बाद ईरान की जनता अपनी सरकार के साथ मजबूती के साथ खड़ी हो गई। हवाई हमलों से ईरान को नुकसान तो हुआ जरूर लेकिन युद्ध के मोर्चे वह डंटा रहा, उसने हार नहीं मानी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ीं और इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रही। डीजल की कमी होने से अमेरिका में महंगाई बढ़ने लगी। टैरिफ, नाटो और ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों को लेकर ट्रंप ने पहले ही अपने परंपरागत सहयोगी देशों के साथ गतिरोध और टकराव मोल ले लिया था। इन सारी चीजों की वजह से ट्रंप की लोकप्रियता की रेटिंग लगातार गिरती रही। जैसे-जैसे 3 नवंबर की तारीख करीब आई, ट्रंप की लोकप्रियता की रेटिंग घटती गई। यह यहां तक नीचे आ गई कि उस रेटिंग के आधार पर किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीतना संभव नहीं रहता है।
हार का अहसास ट्रंप-रिपब्लिकन पार्टी दोनों को हो गया था!
इस बात का अहसास शायद ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी दोनों को हो गया था। महंगाई कम करने के लिए रूस से डीजल खरीदने का ट्रंप का फैसला देरी से उठाया गया कदम था। महंगाई और रोजमर्रा के खर्च से पैदा हुई नाराजगी ने डेमोक्रेट्स को चार साल की बेहद कमजोर रिपब्लिकन बहुमत वाली संसद के बाद हाउस में वापसी दिलाई। नतीजे उम्मीद से कहीं बड़े रहे। डेमोक्रेट्स को सीनेट में बहुमत के लिए चार सीटें चाहिए थीं, और नक्शा रिपब्लिकन के पक्ष में माना जा रहा था। फिर भी पार्टी ने यह बाधा पार कर ली। हाउस में जेफ्रीज का दावा है कि अंतिम गिनती में डेमोक्रेट्स कम से कम 255 सीटें जीतेंगे, जबकि CNBC की प्रोजेक्शन के अनुसार डेमोक्रेट्स को कम से कम 250 सीटें मिलेंगी। सीनेट में बैलट पीडिया के अनुसार डेमोक्रेट्स ने सात सीटें जोड़ीं और 54-44 की बढ़त पर हैं। इसमें वे सात राज्य भी शामिल हैं जो 2024 में ट्रंप ने जीते थे। टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और जॉर्जिया जैसे राज्यों में डेमोक्रेट्स की जीत इस नतीजे को खास बनाती है। जेफ्रीज अब अमेरिका के पहले अश्वेत स्पीकर बनने की राह पर हैं।
इस नतीजे के पीछे तीन वजहें दिखती हैं: महंगाई, टैरिफ का बोझ और ईरान युद्ध। उपराष्ट्रपति वेंस ने खुद रिपब्लिकन हार के लिए ईरान युद्ध को जिम्मेदार ठहराया। मध्यावधि चुनाव से पहले नौ राज्यों में हुई रीडिस्ट्रिक्टिंग भी रिपब्लिकन को नहीं बचा सकी।
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ट्रंप के लिए अगले दो साल कैसे होंगे
ट्रंप अब पूरी तरह 'लेम डक' तो नहीं, लेकिन उनके हाथ काफी बंध गए हैं। कानून बनाने की ताकत लगभग खत्म। हाउस और सीनेट दोनों डेमोक्रेट्स के पास हैं, इसलिए ट्रंप का कोई बड़ा विधायी एजेंडा पास नहीं होगा। CBS के अनुसार यह नतीजा ट्रंप के विधायी एजेंडे को प्रभावी रूप से रोक देगा। दूसरी ओर, ट्रंप के पास वीटो है। डेमोक्रेट्स के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, इसलिए वे भी अपनी मर्जी का कानून नहीं बना पाएंगे। नतीजा गतिरोध वाला होगा। यही नहीं, हाउस में कई जांचें होंगी और समितियों के पास गवाहों को बुलाने की सम्मन शक्ति होगी। प्रशासन के फैसले, खर्च और ट्रंप के कारोबारी हित निशाने पर रहेंगे। महाभियोग हाउस में पास हो सकता है, लेकिन सीनेट में दोषसिद्धि के लिए 67 वोट चाहिए, जो डेमोक्रेट्स के पास नहीं हैं। इसलिए यह राजनीतिक संदेश का औजार ज्यादा होगा।नियुक्तियों पर ताला
डेमोक्रेटिक सीनेट कैबिनेट और जजों की नियुक्तियों में बड़ी रुकावट बनेगी। अगर कोई कैबिनेट मंत्री हटता है या सुप्रीम कोर्ट में पद खाली होता है, तो ट्रंप के लिए पसंदीदा नाम पास कराना आसान नहीं होगा।
ट्रंप के सामने प्रमुख चुनौतियां
बजट और शटडाउन
सरकारी खर्च के बिल अब डेमोक्रेट्स की सहमति के बिना पास नहीं होंगे। इससे बजट की हर समयसीमा पर शटडाउन का खतरा बनेगा।
अर्थव्यवस्था और महंगाई
यही मुद्दा चुनाव का केंद्र रहा। टैक्स पॉलिसी सेंटर का अनुमान है कि मौजूदा कानून के तहत टैरिफ का औसत बोझ 2026 में प्रति अमेरिकी परिवार लगभग 920 डॉलर होगा। डेमोक्रेट्स 'अफोर्डेबिलिटी' को अपना मुख्य एजेंडा बता चुके हैं, इसलिए हर हफ्ते महंगाई पर सुनवाई और बहस होगी।
ईरान युद्ध
इस संघर्ष से मध्य-पूर्व से तेल और गैस का निर्यात प्रभावित हुआ और खाड़ी के कई रिफाइनरी ठिकानों को नुकसान पहुंचा। अब कांग्रेस वॉर पावर्स पर वोट, फंडिंग की शर्तें और सुनवाई के जरिए दबाव बना सकती है।
टैरिफ की कानूनी कमजोरी
20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने रेसिप्रोकल टैरिफ रद्द कर दिए थे, जिसके बाद 90 दिन के लिए 10% का वैश्विक टैरिफ लगाया गया। ट्रंप को अब दूसरे कानूनी रास्तों पर निर्भर रहना होगा, और कांग्रेस से कोई नई छूट मिलने की संभावना नहीं है।
पार्टी के भीतर की राजनीति
हार का दोष तय करने की खींचतान रिपब्लिकन में शुरू हो चुकी है। 2028 की दौड़ के लिए वेंस और दूसरे नेता अपनी जगह बनाएंगे, जिससे ट्रंप का पार्टी पर नियंत्रण धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है। एक संतुलन भी जरूरी है। ट्रंप के पास कार्यकारी आदेश, विदेश नीति और टैरिफ जैसे बड़े अधिकार बने रहेंगे। जेफरीज की रिपोर्ट के अनुसार विभाजित सरकार में भी प्रभावी टैरिफ दर 10-20% के बीच रहने की संभावना है, और ट्रंप की विदेश नीति की कई कार्रवाइयां बिना नई कांग्रेस की मंजूरी के आगे बढ़ सकती हैं। यानी कांग्रेस बहस और जांच का मंच बनेगी, पर नीतियों को पूरी तरह पलट नहीं पाएगी।
मिडटर्म नतीजों का दुनिया पर असर
नतीजों के बाद बाजार ने राहत दिखाईमध्यावधि चुनाव नतीजों का असर बाजार पर देखने को मिला। डेमोक्रेट्स के जीतने के बाद डाउ जोन्स करीब 1,500 अंक उछला। निवेशकों को लगता है कि विभाजित सत्ता में अचानक और बड़े नीतिगत झटके कम होंगे।
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यूरोप और यूक्रेन पर असर
ब्रसेल्स टैरिफ, नाटो प्रतिबद्धताओं और यूक्रेन को समर्थन को लेकर अनिश्चितता में है। डेमोक्रेटिक कांग्रेस से यूक्रेन और नाटो के पक्ष में ज्यादा समर्थन की उम्मीद है। लेकिन विदेश नीति राष्ट्रपति के हाथ में है, इसलिए असर सीमित रहेगा। मॉस्को के लिए भी यह संकेत है कि अमेरिकी राजनीति में ट्रंप का समर्थन घट रहा है।
चीन और एशिया
जापान जैसे सहयोगी यह देख रहे हैं कि मिडटर्म से टैरिफ, रक्षा खर्च और चीन पर कांग्रेस का रुख कैसे बदलता है। चीन पर सख्ती दोनों पार्टियों में आम सहमति का विषय है, इसलिए इसमें बड़े बदलाव की उम्मीद कम है।
भारत पर असर
यह सबसे अहम बिंदु है। भारत ने फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे पर आगे बढ़ने में मिडटर्म तक इंतजार की रणनीति अपनाई थी। अब तस्वीर साफ है, पर तुरंत राहत की उम्मीद ठीक नहीं। जेफरीज का आकलन है कि डेमोक्रेटिक हाउस भी टैरिफ घटाने वाला कोई कानून पास करने की संभावना नहीं रखता। भारतीय निर्यातकों के लिए अनिश्चितता बनी रहेगी। डेमोक्रेट्स की ओर से H-1B जैसे आव्रजन और श्रम मानकों पर अलग तरह के सुझाव आ सकते हैं, जिन पर नजर रखनी होगी। यह नतीजा अमेरिकी जनता का आर्थिक असंतोष और युद्ध-थकान का फैसला है। ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे और विदेश नीति व टैरिफ पर उनके अधिकार बड़े हैं। लेकिन संसद अब उनकी ढाल नहीं, उनकी जांचकर्ता होगी। दुनिया के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका की नीतियां अब पहले जितनी अप्रत्याशित नहीं रहेंगी, पर वे अचानक उदार भी नहीं होंगी।
