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भूकंप से कितनी सुरक्षित है दिल्ली, बड़े झटके झेल पाएगी? क्या है आपदा प्रबंधन विभाग की तैयारी

दिल्ली सीस्मिक जोन-IV में आती है, मतलब यह हाई रिस्क वाला क्षेत्र है, जहां आम तौर पर 5-6 तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं। ऐसे में दिल्ली में अगर कभी तेज भूकंप के झटके आते हैं, तो यहां तबाही मच सकती है। पुराने निर्माण भूकंप के तेज झटकों को शायद ही सहन कर सकें।

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दिल्ली में क्यों आता है बार-बार भूकंप, कितनी है सरकार की तैयारी?
Authored by: Shishupal Kumar
Updated Apr 4, 2026, 11:26 IST

शुक्रवार को जब अफगानिस्तान में 5.9 की तीव्रता का भूकंप आया, तो उसके तेज झटके दिल्ली तक महसूस हुए। लोग डर के मारे घरों से बाहर निकल आए। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दिल्ली भूकंप से कितनी सुरक्षित है, दिल्ली किस भूकंपीय जोन में आती है, दिल्ली की इमारतें भूकंप से कितनी सुरक्षित हैं, क्या दिल्ली की हाई-राइज बिल्डिंग में कोई कमी है? दिल्ली आपदा प्रबंधन विभाग की भूकंप को लेकर क्या तैयारी है? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब...

दिल्ली किस भूकंप जोन में? (What seismic zone is Delhi in)

हमारे देश में भूकंप संभावित क्षत्रों को अलग-अलग जोनों में बांटा गया है। इसमें यह अनुमान लगाया गया है कि किसी क्षेत्र में भूकंप आने पर कितनी क्षति हो सकती है और वहां बिल्डिंग से लेकर अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के समय किन मानकों का पालन करना चाहिए। दिल्ली सीस्मिक जोन-IV में आती है, जिसे उच्च जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है।

आईआईटी कानपुर का शोध

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दिल्ली में भूकंप का कितना खतरा?

दिल्ली के आसपास भूकंप की गतिविधि एक प्रमुख भूगर्भीय संरचना से जुड़ी मानी जाती है, जिसे दिल्ली-हरिद्वार रिज (Delhi-Haridwar Ridge) कहा जाता है। यह संरचना गंगा के मैदानों के नीचे से होकर हिमालय की ओर बढ़ती है और यही क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। यहां सामान्यतः 5-6 तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं, जबकि कभी-कभी 6-7 या 7-8 तीव्रता के भूकंप भी संभव हैं। यही कारण है कि दिल्ली में बार-बार भूकंप आते रहता है और भविष्य में भी यह खतरा बरकरार ही रहेगा।

क्या दिल्ली बड़े भूकंप झेल पाएगी?

Delhi Disaster Management Authority ने अपनी वेबसाइट पर खुद लिखा है कि शहर की बसावट को कभी भी उसकी जमीन और भूगर्भीय स्थिति को ध्यान में रखकर ठीक से नहीं बनाया गया। कई जगहों पर ऊंची इमारतें या खराब डिजाइन वाली कॉलोनियां हैं, जहां भूकंप से बचाव के नियमों का खास ध्यान नहीं रखा गया। इसी तरह, अनियोजित बस्तियां और कमजोर निर्माण वाली इमारतें हल्के या मध्यम भूकंप में भी ज्यादा नुकसान झेल सकती हैं। शहर का मुख्य व्यावसायिक इलाका कनॉट प्लेस, कई जिला केंद्र और तेजी से बन रही ऊंची आवासीय इमारतें अपनी ऊंचाई और निर्माण तरीके के कारण ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र माने जाते हैं। इसके अलावा पुराना शहर, यमुना पार के इलाके और अनियोजित बस्तियां भी कमजोर ढांचे और ज्यादा भीड़ के कारण खतरे में रहती हैं। जहां तक घरों की बात है, अब तक यह ठीक से नहीं जांचा गया कि कौन-सी इमारत भूकंप में कितनी सुरक्षित है। इसलिए नुकसान का सही अनुमान भी उपलब्ध नहीं है और इमारतों को मजबूत बनाने की योजना भी सीमित है।

भूकंप के समय क्या करें, क्या न करें?

भूकंप के समय क्या करें, क्या न करें?

भूकंप-रोधी डिजाइन क्या होता है?

अगर सरल तरीके से समझें, तो सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि किसी भी इमारत की सुरक्षा सिर्फ उसकी ऊंचाई या दिखावट से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह भूकंप के झटकों को कितना सह सकती है। Earthquake-resistant design का मतलब यह होता है कि इमारत को इस तरह बनाया जाए कि भूकंप आने पर वह तुरंत गिरने के बजाय झटकों को झेल सके और लोगों को बाहर निकलने का समय मिल सके। इसमें मजबूत नींव, सही अनुपात में कॉलम और बीम, अच्छी गुणवत्ता का सीमेंट और सरिया, और निर्माण के दौरान तय मानकों का पालन करना बहुत जरूरी होता है।

क्या बिल्डर छुपा लेते हैं अहम जानकारी?

अक्सर घर या फ्लैट खरीदते समय लोग सिर्फ लोकेशन और कीमत देखते हैं, लेकिन कई बार कुछ बिल्डर अहम बातें छुपा लेते हैं। जैसे सस्ती या कमजोर सामग्री का इस्तेमाल, नक्शे से अलग निर्माण करना, भूकंपरोधी नियमों का पूरी तरह पालन न करना या जरूरी प्रमाणपत्र समय पर न लेना। ये छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़े भूकंप के समय भारी नुकसान का कारण बन सकती हैं। इसी तरह, किसी भी सोसाइटी या आरडब्ल्यूए (RWA) की तैयारी भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर सोसाइटी में आपातकालीन योजना, सुरक्षित निकासी का रास्ता, नियमित जांच और लोगों को जागरूक करने की व्यवस्था हो, तो भूकंप जैसी आपदा में नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सरल शब्दों में, इमारत की मजबूती और लोगों की तैयारी-दोनों मिलकर ही असली सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।

आपदा विभाग भूकंप की तैयारी के लिए मॉक ड्रिल करते हुए

आपदा विभाग भूकंप की तैयारी के लिए मॉक ड्रिल करते हुए

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मानदंड- NDMA 10 Golden Rules during Earthquake

  1. नई इमारतें भूकंपरोधी डिजाइन के अनुसार बनना अनिवार्य।
  2. पुराने और कमजोर भवनों की जांच और मजबूतीकरण जरूरी।
  3. हर इमारत में स्पष्ट आपातकालीन निकास होना चाहिए।
  4. स्कूल, अस्पताल और सरकारी भवनों को पहले सुरक्षित बनाया जाए।
  5. निर्माण के दौरान बिल्डिंग कोड्स का पालन जरूरी।
  6. नियमित मॉक ड्रील और लोगों की ट्रेनिंग कराना अनिवार्य।
  7. जोखिम वाले इलाकों की पहचान औरहैजर्ड मैपिंग की व्यवस्था।
  8. बिजली, पानी, संचार जैसी सेवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  9. आपदा के समय तुरंत सूचना देने के लिए वार्निंग सिस्टम तैयार रखना।
  10. स्थानीय प्रशासन, बिल्डर और नागरिक-सभी की जिम्मेदारी तय होना जरूरी।

भूकंप से कैसे सुरक्षित होगी दिल्ली?

वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को जल्द से जल्द विस्तृत जांच और अध्ययन शुरू करने की जरूरत है, ताकि Delhi के सामने मौजूद भूकंप के खतरे को सही आंकड़ों के साथ बेहतर तरीके से समझा जा सके। दुर्भाग्य से अब तक इस तरह के पर्याप्त अध्ययन नहीं किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, पुराने बड़े भूकंपों- जैसे 1720 और 1803 की घटनाओं- का पता लगाने के लिए पैलियोसीस्मिक (Paleoseismic) अध्ययन किए जाएं, तो इससे भूकंप के जोखिम का आकलन काफी सटीक हो सकता है। दिल्ली की जटिल भूगर्भीय स्थिति के कारण शहर के कुछ इलाके दूसरे क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा नुकसान झेल सकते हैं। इसलिए यह जानने के लिए कि कौन-से इलाके अधिक खतरे में हैं, शहर में विस्तृत माइक्रोजोनेशन (Microzonation) अध्ययन करना बेहद जरूरी माना जाता है।

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