बिहार... नाम सुनते ही इतिहास के कई पन्ने खुल जाते हैं। बुद्ध, महावीर, नालंदा, मौर्य साम्राज्य और चंपारण सत्याग्रह। इस धरती की पहचान सिर्फ एक राज्य की नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध विरासत से जुड़ी है।
लेकिन आज बिहार की चर्चा एक ऐसी वजह से हो रही है जो हमें इतिहास से निकालकर जो मौजूदा हकीकत के सामने ला खड़ा करती है। जमुई में एक युवती के साथ सार्वजनिक स्थान पर कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिए मारपीट और दुर्व्यवहार किया क्योंकि वह एक युवक के साथ यात्रा कर रही थी।
घटना गंभीर थी, लेकिन इसके बाद सामने आई प्रतिक्रिया ने उससे भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। लड़की के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया गया, यह पूछने के बजाय कुछ लोगों ने उसकी परवरिश और ‘संस्कार’ पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
जमुई में छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना घटी।
यह सवाल सिर्फ जमुई तक सीमित नहीं है। ऐसी ही घटना ओडिशा के ढेंकानाल जिले में घटी। यहां एक युवा कपल के साथ दिन-दहाड़े कुछ लोगों ने मारपीट और बदसलूकी की। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
इतना ही नहीं, सोमवार देर रात दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। पुलिस के मुताबिक, लड़की अपने 17 वर्षीय दोस्त के साथ मंदिर गई थी और बाद में दोनों पास के आस्था कुंज पार्क में गए। आरोप है कि वहां करीब 25 से 30 साल की उम्र के तीन लोग पहुंचे और खुद को पुलिसकर्मी बताकर दोनों को धमकाया। इसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
अब गुरुग्राम का चर्चित ‘बाइकर सिया’ मामला ही देख लीजिए। गोल्फ कोर्स रोड पर मोटरसाइकिल से जा रहीं सिया ने आरोप लगाया कि एक कार उनका पीछा कर रही थी और बाद में उनकी बाइक को टक्कर मार दी। इस घटना में वह सड़क पर गिर गईं और पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज की। इन घटनाओं के बीच एक बड़ा सवाल है। क्या किसी महिला का किसी पुरुष मित्र के साथ होना, बाइक चलाना, अकेले घूमना या अपनी पसंद से जिंदगी जीना उसके खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न या अपमान का कारण बन सकता है?
गुरुग्राम में एक महिला बाइकर सिया को कार चालक ने टक्कर मार दी।
सवाल लड़की से ही क्यों?
जमुई की घटना के बाद अगर सवाल यह पूछा जाए कि लड़की ‘संस्कारी’ क्यों नहीं थी, तो हमें एक पल रुककर सोचना चाहिए। आखिर किसी लड़की का ब्वॉयफ्रेंड के साथ सार्वजनिक स्थान पर होना अपराध कब से हो गया? क्या किसी छोटे शहर की लड़की को अकेले चलने, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ यात्रा करने या अपनी जिंदगी के फैसले लेने के लिए समाज की अनुमति लेनी होगी?
अगर किसी महिला की स्वतंत्रता समाज के किसी हिस्से को असहज करती है, तो समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं रह जाती। सवाल उस मानसिकता का भी है, जो महिलाओं की आजादी को उनके चरित्र, परिवार की इज्जत और ‘संस्कार’ से जोड़कर देखने लगती है।
कानून अपराध रोक सकता है, सोच नहीं
कानून अपराध के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। दोषियों को सजा दिलाई जा सकती है और पीड़ित को न्याय दिया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के भीतर मौजूद स्त्री-विरोधी सोच को कानून अकेले रातोंरात नहीं बदल सकता।
लोकतंत्र में समाज सिर्फ कानून से नहीं चलता। सामाजिक स्वीकृति, नागरिक व्यवहार और राजनीतिक जवाबदेही भी उसकी दिशा तय करते हैं। जब किसी गलत व्यवहार को समाज का एक हिस्सा सामान्य मानने लगे या पीड़ित को ही उसके लिए जिम्मेदार ठहराने लगे, तब समस्या सिर्फ पुलिस या प्रशासन तक सीमित नहीं रहती।
समस्या किसी एक राज्य, शहर, जाति या क्षेत्र की नहीं है। समस्या उस सोच की है जिसमें महिला की आजादी को उसकी ‘हद’ से जोड़कर देखा जाता है। लड़की अकेले बाइक क्यों चला रही थी? वह लड़के के साथ क्यों घूम रही थी? उसके माता-पिता ने उसे क्या संस्कार दिए हैं? इन सवालों को ध्यान से देखिए। इनमें एक बात समान है। हर बार कटघरे में लड़की खड़ी होती है। उसके कपड़े, उसके दोस्त, उसका रिश्ता, उसकी बाइक और उसका अकेले बाहर निकलना। हर चीज जांच के दायरे में आ जाती है।
लेकिन कथित तौर पर गलत व्यवहार करने वाले पुरुष से यह सवाल बहुत कम पूछा जाता है कि उसने किसी महिला की स्वतंत्रता में दखल देने का अधिकार खुद को किसने दिया?
आजादी और सुरक्षा की लड़ाई
एक ऐसे समाज में जहां बेटे को अक्सर यह बताया जाता है कि वह क्या कर सकता है और बेटी को यह बताया जाता है कि उसे क्या नहीं करना चाहिए, वहां बराबरी सिर्फ किताबों और भाषणों तक सीमित रह जाती है। एक लड़की का बाइक चलाना, अकेले घूमना, दोस्तों के साथ यात्रा करना या किसी पुरुष मित्र के साथ सार्वजनिक जगह पर जाना उसे हिंसा, उत्पीड़न या अपमान का पात्र नहीं बनाता।
महिलाओं को अधिकार को लेकर आज भी समाज में बहस जारी।
कहानी एक राज्य की नहीं
गुरुग्राम हो या जमुई, दिल्ली हो या ओडिशा। अगर महिलाओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, तो हमें जगह के नाम से ज्यादा सोच पर बहस करनी चाहिए। यह बिहार बनाम बाकी भारत की कहानी नहीं है। यह उस पितृसत्तात्मक और स्त्री-विरोधी सोच की कहानी है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
समाधान क्या है?
शायद इसका कोई एक आसान जवाब नहीं है। कानून जरूरी है। पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही जरूरी है। तेज और निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। लेकिन इसके साथ घर, स्कूल और समाज में लड़कों को यह समझाना भी जरूरी है कि महिला की स्वतंत्रता कोई अपराध नहीं है और किसी महिला की ‘ना’ का सम्मान करना जरूरी है।किसी लड़की के कपड़े, उसके दोस्तों, उसके रिश्तों, उसकी बाइक या उसके अकेले बाहर निकलने को उसके खिलाफ हिंसा का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
समस्या उस सोच में है, जो महिला को पहले एक इंसान के रूप में देखने के बजाय उसे परिवार की ‘इज्जत’ का प्रतीक मान लेती है और फिर उसी इज्जत की रखवाली के नाम पर उसकी आजादी पर पहरा लगाने लगती है। शायद यही वह सोच है, जिस पर बिहार, दिल्ली, गुरुग्राम या किसी एक जगह की नहीं, पूरे समाज की बहस होनी चाहिए।
