Donald Trump calls PM Modi : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर उनसे करीब 40 मिनट बातचीत की। बताया गया कि उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला एवं सुरक्षित रखने सहित पश्चिम एशिया के हालातों पर चर्चा की। इस्लामाबाद वार्ता नाकाम होने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान के बंदरगाहों की यूएस द्वारा नाकेबंदी किए जाने के बाद दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच यह बातचीत हुई है। ऐसे में इस बातचीत को काफी अहम माना जा रहा है। एक्स्पर्ट का मानना है कि ईरान युद्ध में बुरी तरह फंस चुके ट्रंप को भारत जैसे मजबूत देश का समर्थन चाहते हैं। क्योंकि ईरान युद्ध पर उन्हें नाटो एवं यूरोपीय देशों का साथ नहीं मिल पाया है।
होर्मुज खुलवाना ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसे खुलवाने की उनकी अब तक की सारी कोशिशें नाकाम हो गई हैं। ईरान उनकी सुन नहीं रहा। बातचीत अधर में लटकी हुई है। इस्लामाबाद वार्ता नाकाम होने के बाद दूसरे चरण की बातचीत की उम्मीद की जा रही है लेकिन यह कब और कहां शुरू होगी, इसके बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना नियंत्रण और प्रबंधन चाहता है जो कि ट्रंप को फिलहाल मंजूर नहीं है। इसके जवाब में ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी है। यानी अमेरिकी नौसेना अरब सागर में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुहाने पर खड़ी रहेगी। वह अरब सागर से जहाजों को होर्मुज में ईरानी बंदरगाहों की तरफ जाने की इजाजत नहीं देगी। ट्रंप ने ईरान को जैसे को तैसा जैसा जवाब दिया है, यानी कि हमारा जहाज नहीं गुजरेगा तो तुम्हारा भी जहाज को यहां से निकलने नहीं देंगे। जाहिर है कि ऐसा कर ट्रंप, ईरान पर दबाव बनाना और उसे आर्थिक रूप से चोट पहुंचाना चाहते हैं।
ईरान युद्ध पर अलग-थलग पड़ गए हैं ट्रंप
ईरान के खिलाफ इस ताजा कार्रवाई पर ट्रंप अलग-थलग पड़ गए हैं। खासकर नाटो और यूरोपीय देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले से खुद को अलग कर लिया है। ब्रिटेन ने कहा है कि वह इस युद्ध का हिस्सा नहीं है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सैन्य दखल या नाकेबंदी का समर्थन नहीं करता है। ब्रिटेन का यह रुख ट्रंप के लिए बहुत बड़ा झटका है। फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली जैसे यूरोप के महत्वपूर्ण देश जो कि नाटो का हिस्सा हैं, इन्होंने ईरान के खिलाफ ट्रंप की सैन्य कार्रवाई से दूरी बना ली है। अभी कोई भी देश ट्रंप के साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा है। ईरान के मसले पर वह अलग-थलग पड़ गए हैं। हाल के दशकों में यूएस के समक्ष इस तरह का दिक्कत पेश नहीं आई है। दुनिया भर में अमेरिका ने जहां भी सैन्य अभियान चलाया, वहां यूरोप और नाटो के देश उसके साथ पीछे-पीछे गए और मिशन में अपना योगदान दिया।
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ट्रंप ने चीन की के 'पूंछ' पर पैर रख दिया है
ईरान के बंदरगाहों का नाकेबंदी किए जाने पर चीन की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम चीन को बिल्कुल पसंद नहीं आया है। ईरान पर हमले के दौरान चीन एक तरह से चुप रहा, उसने कूटनीति एवं बातचीत के जरिए समस्या का हल निकालने पर जोर दिया लेकिन जब ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी करने का जैसे ही एलान किया तो उसकी नाराजगी सामने आ गई। ट्रंप ने एक तरह से चीन की 'पूंछ' दबा दी है और वह हरकत में आ गया है। ईरान के तेल एवं गैस का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। जाहिर है कि ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी होने पर सबसे ज्यादा असर चीन पर ही होगा। अपनी उत्पादन फैक्ट्रियां एवं घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन को बहुत ज्यादा मात्रा में तेल एवं गैस की जरूरत होती है। ऐसे में ईरानी बंदरगाहों से ईंधन नहीं निकलने पर उसे तेल एवं गैस मिलना बंद हो जाएगा और इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
नाकेबंदी पर चीन ने दी कड़ी प्रतिक्रिया
अमेरिका की इस नाकेबंदी पर कड़ी प्रतिक्रया देते हुए चीन ने इसे 'गैर-जिम्मेदारीपूर्ण कदम एवं खतरनाक' बताया। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस कदम से हालात और खराब होंगे और पहले ही खटाई में पड़ चुकी सीजफायर वार्ता पर इसका बुरा असर पड़ेगा। यही नहीं, नाकेबंदी से होर्मुज से गुजरने वाले जहाज खतरे में पड़ेंगे। बता दें कि यूएस की यह नाकेबंदी सोमवार से लागू हो गई है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि अस्थायी युद्धविराम समझौते के लागू रहने के बावजूद, अमेरिका ने सैन्य तैनाती बढ़ा दी और लक्षित नाकाबंदी का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि इससे टकराव, तनाव बढ़ेगा, पहले से ही नाजुक युद्धविराम कमजोर होगा और होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवागमन और भी खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने कहा, 'यह एक खतरनाक और गैरजिम्मेदाराना कदम है। चीन का मानना है कि केवल पूर्ण युद्धविराम ही स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बुनियादी परिस्थितियां पैदा कर सकता है।’
PM Modi
ट्रंप को इसलिए है भारत से उम्मीद
उन्होंने कहा, 'संबंधित पक्षों को अस्थायी युद्धविराम का पालन करना चाहिए और राजनीतिक और कूटनीतिक माध्यमों से विवादों को सुलझाने पर जोर देना चाहिए। चीन शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा, सभी पक्षों को बातचीत की मेज पर लाएगा और पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता की शीघ्र वापसी के लिए प्रयासरत रहेगा।’चीन ने ईरान को सैन्य सहायता देने से भी इनकार किया और आगाह किया कि अगर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तेहरान की मदद करने के आरोप पर चीन के खिलाफ शुल्क बढ़ाते हैं तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध को लेकर ट्रंप भयंकर दबाव में हैं। वैश्विक मोर्चे पर उन्हें कहीं से समर्थन नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में भारत से चाहेंगे कि वह कोई रास्ता निकालने की पहल करे क्योंकि इस युद्ध में भारत तटस्थ रहा है। ईरान के साथ भारत के अच्छे रिश्ते हैं और विदेश मंत्री जयशंकर की ईरान के विदेश मंत्री से कई बार बात हुई है। ट्रंप को लगता है कि सीजफायर की जो शर्तों हैं, उसे मनवाने में भारत मदद कर सकता है। उन्हें यह भी पता है कि भारत यदि कोई बात ईरान से कहेगा तो वह उसे हल्के में नहीं लेगा।
