UP Election News: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च में होंगे। चुनाव का समय नजदीक आता देख राजनीतिक दल अपनी तैयारी में जुट गए हैं। सामाजिक एवं जातिगत समीकरण साधने के लिए चुनावी बिसात बिछाई जा रही है और मोहरे सेट किए जा रहे हैं। चुनावी मोर्चे पर रंग की भी धमक होने लगी है। समाजवादी पार्टी ने अपनी छात्र इकाई समाजवादी छात्र सभा के लिए नया ड्रेस कोड अपनाने का फैसला किया है। इस नए ड्रेस कोड के तहत इसके सदस्य अब नीले रंग की टी-शर्ट और लाल टोपी पहनेंगे। अब तक सपा की इस छात्र इकाई के लिए कोई औपचारिक ड्रेस कोड लागू नहीं था। हालांकि, सदस्य कभी-कभी लाल टोपी पहने नजर आ जाते थे। इस नए ड्रेस को आगामी चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीति में नीले रंग की पहचान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जुड़ी है। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इस रंग की राजनीति के जरिए अखिलेश यादव दलित वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करना चाहते हैं।
दरअसल, इस रंग की राजनीति के संकेत सपा ने अगस्त महीने में दे दिए थे। बीते 31 अगस्त को जब सपा के जिला और शहर अध्यक्षों की एक बैठक हुई, तो अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और कई वरिष्ठ नेता परंपरागत लाल-हरे गमछे की जगह नीले रंग का स्कार्फ पहने नजर आए जिस पर पार्टी का साइकिल चुनाव-चिन्ह लाल रंग में बना था। उस वक्त पार्टी पदाधिकारियों ने इसका कोई साफ जवाब नहीं दिया था कि इसका मतलब क्या है।
नीला रंग और दलित राजनीति का समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीले रंग का एक बहुत गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। ये रंग लंबे समय से दलित राजनीति और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से जुड़ा रहा है। बहुजन समाज पार्टी जो राज्य में परंपरागत रूप से दलित राजनीति का प्रतिनिधित्व करती रही है, अपने झंडे और चुनाव प्रचार में नीले रंग का प्रमुखता से इस्तेमाल करती रही है। दूसरी ओर सपा की पहचान हमेशा लाल और हरे रंग से रही है। खुद अखिलेश यादव ने इसकी वजह बताई। उन्होंने पत्रकारों से कहा-नीला रंग संविधान, आजादी और लोकतंत्र का रंग है। ये बहुजन समुदाय और बाबासाहेब से जुड़ा रहा है। ये एक विचारधारा का रंग है। नई पीढ़ी की सोचने की एक नई शैली है, इसलिए हमने एक नया रंग चुना है। पार्टी के नेता आगे कहते हैं कि नीला रंग 'खुले विशाल आकाश' का प्रतीक है, जिसके नीचे हर कोई बराबर है, जाति के भेदभाव से मुक्त।
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कपड़ों का स्वरूप भी बदल रहा
सपा पार्टी पदाधिकारियों के मुताबिक दलित युवाओं के बीच अपनी बैठ बनाने की यह पार्टी की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। दलित समुदाय सपा के पीडीए फॉर्मूले पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का एक अहम हिस्सा है। और सिर्फ रंग का चुनाव नहीं बदला, कपड़ों का पूरा स्वरूप बदल रहा है। परंपरागत कुर्ता-पायजामा और गांधी टोपी की जगह अब टी-शर्ट और जींस, या मिलते-जुलते रंग की शर्ट-पैंट का चलन आ रहा है। और इसे सीधे जेन जी से जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सार्वजनिक कार्यक्रमों में टी-शर्ट पहनने की शैली को हाल के वर्षों में काफी चर्चा मिली है और सपा का यह कदम उसी सोच से मिलता-जुलता माना जा रहा है।
राजनीति में रंगों की अपनी है राजनीति
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक समाजवादी छात्र सभा के महासचिव अवनीश यादव ने कहा, 'लाल रंग क्रांति का प्रतीक है, नीला नई ऊर्जा लाता है। ये छात्रों के बीच बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को फैलाने में मदद करेगा। नीला और लाल, दोनों हमारे पीडीए फॉर्मूले में फिट बैठते हैं। वहीं, लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर कविराज का कहना है कि हर रंग की राजनीति में अपनी अहमियत है। भगवा भाजपा से जुड़ा है, लाल वामपंथ से, और नीला आंबेडकरवादी राजनीति से। उनके मुताबिक सपा नेता परंपरागत रूप से लाल टोपी पहनते आए हैं, और अब नीले और लाल के इस संयोजन को भी एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
दलित वोट बैंक पर सिर्फ सपा की नजर नहीं
इसी बीच अखिलेश यादव ने भाजपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा वाले रंगों से डरते हैं, भगवान से नहीं और आरोप लगाया कि उन्होंने प्रभु राम के मंदिर का चंदा चुराया और अब राम वन गमन पथ को लूट लिया है, और भाजपा नकारात्मक अभियान चला रही है। उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक पर सिर्फ सपा की नजर नहीं है। बसपा अब भी बड़ी संख्या में दलितों की परंपरागत राजनीतिक घर मानी जाती है, और चंद्रशेखर आजाद एक उभरता हुआ दलित राजनीतिक विकल्प बनकर सामने आए हैं। प्रोफेसर कविराज खुद मानते हैं कि पूरे समुदाय को अपने पाले में लाना आसान नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक दलों को ऐसी कोशिशें करते रहना ही पड़ता है।
बसपा के मूल वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश
यानी सपा का ये कदम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। ये सीधे तौर पर बसपा के मूल वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश है, ठीक उस वक्त जब बसपा खुद अपने अंदरूनी उत्तराधिकार संकट से जूझ रही है। अखिलेश ने छात्र राजनीति के भविष्य पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अगर सपा सत्ता में आई तो एक समिति बनाई जाएगी, और कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड और यूरोपीय संघ के विश्वविद्यालयों से संभावित सहयोग की कोशिश होगी। कुल मिलाकर 2027 की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, प्रतीकों और पहचान की भी लड़ाई बनती जा रही है। और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां जाति और प्रतीक राजनीति की भाषा है, एक टी-शर्ट का रंग भी वोट बैंक की रणनीति का हिस्सा बन जाता है।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने हमला बोला
सपा के नीले रंग वाले ड्रेस कोड को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने हमला बोला। X पर अपने एक पोस्ट में मायावती ने 11 सितंबर को कहा कि 'सपा, कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा बीएसपी का शुरू से ही चला आ रहा नीला रंग अब यह इनके गले का गमछा व कपड़े पहनने से तथा स्टेज आदि में भी नीला कपड़ा इस्तेमाल करने से इनकी सर्वसमाज में से ख़ासकर ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़े व अन्य उपेक्षित वर्गों के प्रति वर्षों से चली आ रही इनकी जातिवादी, संकीर्ण, सामन्तवादी एवं पूंजीवादी सोच नहीं बदल सकती है तथा ना ही ये लोग दिल से अम्बेडकरवादी होने एवं कहलाने वाले हैं। इसीलिए 'बहुजन समाज’ के वास्तविक हित व कल्याण के प्रति पहले वे अपना दिल व दिमाग तो पाक-साफ करें।'
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प्रतीकों एवं रंगों से भी लड़े जाएंगे चुनाव
मायावती ने आगे कहा कि 'वैसे भी ये लोग इन वर्गों के मामले में आए दिन गिरगिट की तरह ही रंग बदलते रहते हैं अर्थात् ये कहते कुछ हैं और करते उसके ठीक विपरीत हैं। खासकर इनके सपा के PDA के मामले में तो इनकी सोच, चाल, चरित्र व चेहरा आदि हमेशा दोगला व बईमान ही रहा है, जिसके अनेकों उदाहरण हैं, ये सभी जानते हैं। इसलिए इन वर्गों की एकमात्र हितैषी व अम्बेडकरवादी पार्टी केवल बीएसपी ही है, जो सर्वविदित है।' जाहिर है कि यूपी चुनाव में विरोधियों पर निशाना केवल शब्दों से ही नहीं बल्कि प्रतीकों एवं रंगों से भी साधे जाएंगे। रंगों की राजनीति से अपनी चुनावी रंगत निखारने की सपा की यह पहल कितना कारगर साबित होती है, यह देखने वाली बात होगी।
यूपी में करीब 20 प्रतिशत दलित आबादी
उत्तर प्रदेश में दलित (अनुसूचित जाति) आबादी करीब 20.7% है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में लगभग 4.14 करोड़ लोग SC समुदाय से थे। राजनीतिक तौर पर यह वोट बैंक बेहद महत्वपूर्ण है। दलित समुदाय में जाटव/चमार, पासी, कोरी, धोबी और वाल्मीकि जैसी प्रमुख जातियां शामिल हैं। हालांकि, दलित वोट पूरी तरह एकजुट नहीं है और अलग-अलग चुनावों में अलग दलों की ओर इसका रुझान बदलता रहा है। इसलिए 20-21% आबादी को सीधे 20-21% वोट शेयर मानना सही नहीं होगा।
