Strait of Malakka: ईरान-अमेरिका के बीच भले ही युद्धविराम लागू हो, लेकिन तनाव बरकरार है। इस्लामाबाद में शांति वार्ता नाकाम होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और आक्रमक हो उठे हैं। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी कर दी है। साथ ही ऐलान किया है कि इस जलक्षेत्र से ईरान से जुड़ा कोई भी जहा नहीं गुजरेगा। ट्रंप के इस कदम ने हालात को और पेचीदा बना दिया है। ट्रंप होर्मुज पर अपने इरादे पहले ही जाहिर कर चुके हैं। वह इस जलमार्ग पर जहाजों से टोल वसूलकर मोटी कमाई करना चाहते हैं। लेकिन, क्या ट्रंप यही पर रुकेंगे, होर्मुज के बाद उनकी नजर मलक्का पर भी पड़ सकती है। देर-सबेर ऐसा होना हैरत की बात नहीं होगी। भारत के लिहाज से देखा जाए तो न सिर्फ होर्मुज बल्कि मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) भी भारत के लिए बेहद अहम है। यह भारत के लिए क्यों इतना अहम है और इसका देश पर क्या असर पड़ सकता है, जानते हैं।
दुनिया की निगाहें मलक्क पर टिकीं
होर्मुज को पूरी तरह ब्लॉकेड करने के बाद पूरी दुनिया की निगाहें मलक्क पर टिकी हैं। अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज की नाकेबंद कर दी है और किसी भी जहाज को गुजरने नहीं देने का संकल्प जताया है। लेकिन ट्रंप का रिकॉर्ड बताता है कि वह इससे ही संतुष्ट हो जाने वाले शख्स नहीं हैं, उनकी नजर स्ट्रेट ऑफ मलक्का पर भी हो सकती है। भारत के लिए ये जलमार्ग बेहद जरूरी है जहां से बड़े पैमाने पर देश के लिए तेल-गैस व अन्य सामान की सप्लाई होती है।
सोमवार को अमेरिका और इंडोनेशिया ने एक बड़े डिफेंस समझौते पर मुहर लगाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके तहत अमेरिका को इंडोनेशिया के हवाई क्षेत्र में भरपूर उड़ान का मौका मिलेगा। इस तरह की सुविधा अमेरिका को मलक्का पर नजर रखने की असीम शक्ति प्रदान करेगी। मलेशिया और सिंगापुर के साथ इंडोनेशिया मलक्का का 40 फीसदी ग्लोबल ट्रेड फ्लो कंट्रोल करते हैं। यह दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्गों में से एक है। जिस दौर और हालात में ये समझौता हुआ, उस पर भौंहें तन गई हैं।
क्या मलक्का पर भी ट्रंप की नजरें?
सवाल उठ रहा है कि क्या अब ट्रंप होर्मुज की तर्ज पर मलक्का पर भी नजरें गढ़ाए हुए हैं। कारण- जहां होर्मुज रूट से तेल-गैस की सप्लाई होती है, मलक्का में हर तरह की माल ढुलाई होती है, तेल से लेकर कार, सेमिकंडक्टर और ग्रोसरी तक। ट्रंप इससे अच्छी तरह से वाकिफ हैं। होर्मुज पर ईरान के कब्जे ने दिखा दिया है कि संकट के समय किसी खास रूट को कब्जे में लेकर वर्ल्ड इकोनॉमी को कैसे बंधक बनाया जा सकता है। हालांकि, अमेरिका मलक्का पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं है, यह संकरा जलमार्ग फिलिप चैनल पर महज 3 किमी चौड़ा है और इसका बहुत अधिक सैन्य व रणनीतिक महत्व है। दिलचस्प है कि यह होर्मुज से भी 9 गुना संकरा जलमार्ग है।
Hormuz Crisis
मलक्का क्यों है अहम?
मलक्का पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंद महासागर से जुड़ता है जहां कुल 30 फीसदी तेल व्यापार होता है, जानी होर्मुज से भी ज्यादा। इसी रूट से चीन और जापान तेल और एलएनजी प्राप्त करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक चीन का 80 फीसदी तेल आयात मलक्का से ही होता है। इसीलिए इसे मलक्का डिलेमा भी कहा जाता है और इसे ये नाम 2003 में पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने दिया था। यहा कॉरिडोर चीन की औद्योगिक अर्थव्यवस्था और उसके मेड इन चाइन उत्पादों के लिए भी अपरिहार्य है। संक्षेप में कहें तो चीन के लिए होर्मुज के मुकाबले मलक्का कहीं अधिक अहम और उसकी दुखती रग है। चीन भी चुपचाप नहीं बैठा है। हाल ही में चीन ने प्रशांत और हिंद महासागर में ओसीन मैपिंग और निगरानी अभ्यास किया है। इसे मलक्का को लेकर चीन की भविष्य की रणनीति के तौर पर देखा गया।
भारत के लिए कितना जरूरी मलक्का?
भारत का करीब 55 फीसदी समुद्री व्यापार मलक्का और सिंगापुर के जरिए ही होता है और इसे SOMS क्षेत्र भी कहा जाता है। चीन के लिए चिंता की बात ये है कि इसका एक सिरा अंडमान और निकोबार द्वीप के करीब है। पोर्ट ब्लेयर से मलक्का पहुंचने में महज 24 घंटे ही लगते हैं। खास बात है कि भारत के कैंपबेल वे में मौजूद INS Baaz मलक्का की गतिविधि पर नजर रखने की सहूलियत देता है। सीधें कहें तो यह ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का केंद्र बिंदु है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री परिवहन मार्गों में से एक के मुहाने पर भारत की रणनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करेगा।
हालांकि गलाथिया खाड़ी में टर्मिनल सहित यह परियोजना भारत को ईरान जैसी मजबूती तो नहीं देगी, लेकिन मलक्का में उसे एक प्रमुख समुद्री ताकत बना देगी। पिछले साल, सिंगापुर ने भी पहली बार औपचारिक रूप से मलक्का जलडमरूमध्य गश्ती दल (एमएसपी) में शामिल होने की भारत की रुचि की स्वीकार किया है, ताकि इस अहम जलमार्ग को सुरक्षा प्रदान की जा सके। इससे ट्रंप की भविष्य की किसी भी योजना में भारत की भूमिका अहम हो जाती है।
