Prahaar Movie Review: राजकुमार राव स्टारर प्रहार कसाब मामले की वो बारीकियां पर्दे पर लाती है, जो टीवी डिबेट्स और राजनीतिक लड़ाई में कभी दिखाई नहीं दीं और ये समझाने की कोशिश करती है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्यों है?
Prahaar Movie Review: कसाब को बैठाकर बिरयानी क्यों खिलाई? राजकुमार ने दिया जवाब
Prahaar Movie Review: कसाब का नाम सुनते ही हम सबके दिमाग में एक लाइन जरूर आती है, "उस वक्त की भारतीय सरकार ने उसे जेल में बैठाकर बिरयानी खिलाई...।" क्या वाकई उस वक्त की भारतीय सरकार ने कसाब जैसे खूंखार आतंकवादी को जेल में दामाद की तरह रखा था और उसे रोज बिरयानी परोसी गई? या फिर ये लाइन राजनीतिक थी और भारतीय सरकार कसाब के जरिए कुछ बड़ा करना चाहती थी, जिस कारण उसने कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही कसाब को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया? और वो कौन सा देश का सिपाही था, जिसने दिन-रात एक करके कसाब को फांसी की सजा दिलवायी थी? इन सारे सवालों के जवाब आपको राजकुमार राव, वामिका गब्बी और ललित प्रभाकर की नई फिल्म 'प्रहार द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम' में मिलेंगे, जो आज थिएटर्स में रिलीज हो चुकी है।
आपने अक्सर ये तो सुना है कि "जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड..." लेकिन क्या आपने ये सुना है "जस्टिस हरीड इज जस्टिस बरीड।" डायरेक्टर अविनाश अरुण की फिल्म प्रहार शुरुआती सीन्स से ही ये स्टैब्लिश कर देती है कि वो इसी सोच के साथ आगे बढ़ेगी और धीरे-धीरे परत-दर-परत 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई को दिखाती जाएगी और बताएगी कि ये कानूनी लड़ाई सिर्फ कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाने की नहीं थी बल्कि इंटरनेशनल स्तर पर भारत की साख बनाए रखने और पाकिस्तान का असली चेहरा दुनिया के सामने लाने की भी थी। अविनाश अरुण इस लड़ाई को इंगेजिंग और एंटरटेनिंग तरीके से दिखाने में कामयाब भी रहे हैं। उन्होंने 2 घंटे 20 मिनट की इस फिल्म को केवल उज्जवल निकम के आसपास नहीं बनाए रखा है बल्कि वो इसके दौरान कानून की उस दुनिया में लेकर जाते हैं, जहां ह्यूमन इमोशन्स पर नहीं बल्कि ईमानदारी और फैक्ट्स पर बात होती है। TimesNow NavBharat पर ये भी पढ़ें: Jailer 2 Review: रजनीकांत की दमदार वापसी, कॉमेडी और एक्शन के बीच कमजोर पड़ी कहानी
फिल्म प्रहार में राजकुमार राव ने गुस्सैल और ईमानदार वकील उज्जवल निकम का रोल प्ले किया है, जो कसाब को फांसी तख्ते पर पहुंचाने से पहले पाकिस्तान का वो घिनौना चेहरा दुनिया के सामने लाना चाहता है। उसे ये पता है कि ऐसा किए बिना कसाब को फांसी की सजा दिलवाना बेईमानी होगी। राजकुमार राव इस काम में सफल भी रहे हैं और उन्होंने ना केवल उज्जवल निकम की बॉडी लैंगुवेज बल्कि उनके हाव-भाव और बोलने के तरीके को भी अच्छे ढंग से पकड़ा है। वामिका ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्जवल निकम की पत्नी का रोल प्ले किया है, जो उनके पेशे की मजबूरी को समझती है और निजी जीवन में संयम बनाकर रखती है ताकि उसके पति का मन काम से ना बंटे। वामिका ने सिंपल और अंडरस्टैंडिंग महिला के रूप में अच्छा काम किया है, जो पति की नामौजूदगी में परिवार को अकेले संभालने का दम रखती है लेकिन कभी इसको जताती नहीं है।
प्रहार में ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब का किरदार प्ले किया है, जो मल्टी लेयर्ड है। एक पाकिस्तानी मुजाहिद जो भारत में तबाही मचाने और शहीद हो जाने के लिए आया था, जब वो पकड़ा जाता है और उस पर केस शुरू होता है तो वो धीरे-धीरे उस झूठ से वाकिफ होता है जो उसके आकाओं ने उससे बोले हैं। इसके बाद उसका दिमाग उसके साथ खेलता है आखिर में जज के सामने खड़े होकर वो मांग रखता है कि उसे इस दुनिया की सजा, यहीं काटकर जानी है। वो खुदा की जहन्नुम की सजा को ठुकरा देता है और भारतीय अदालत में ना केवल पाकिस्तानी का असली चेहरा उजागर करता है बल्कि अपना भी गुनाह कुबूल करता है। फिल्म में सिकंदर खेर ने वकील अब्बास काजमी का किरदार निभाया है, जो भारत की तरफ से कसाब का केस लड़ता है। भले ही शुरुआत में उनका किरदार हमें खिनौना लगे लेकिन आखिर तक हमें समझ आता है कि देशभक्ति हमेशा देश के पाले में खड़े होकर ही नहीं निभाई जा सकती है, कभी-कभी देश के लिए लड़ने के लिए देशवासियों की नजरों में बुरा भी बनना पड़ता है।
अगर फिल्म प्रहार की कमियों की बात करें तो ये उज्जवल निकम की एक वकील के तौर पर वो लड़ाइयां ढंग से पेश नहीं करती है, जिनकी वजह से वो द उज्जल निकम बने हैं। उसकी जगह ये उज्जवल निकम की निजी जिंदगी को ज्यादा पेश करने की कोशिश करती है, जिसकी उतनी जरूरत नहीं थी। खास करके पिता-बेटे के बीच का कॉन्फ्लिक्ट, जो कहानी को कुछ खास मदद नहीं करता है। इसके साथ-साथ प्रहार का सेकेंड हाफ काफी लम्बा सा फील होता है। उसे 10 मिनट छोटा किया जा सकता था, जिससे ये काफी इंगेजिंग हो सकती थी। इसके साथ-साथ डायरेक्टर अविनाश ने कोर्टरूम ड्रामा को काफी ऊपर-ऊपर से छुआ है, जब आप फिल्म में घुस चुके होते हैं तो ये आपको कोर्ट रूम से बाहर ले आती है, जहां मजा थोड़ा किरकिरा होता है। इसके साथ-साथ फिल्म 26/11 मुंबई हमलों की कोई नई तस्वीर नहीं दिखाती है, जो थोड़ा निराश करता है। कई सीन आपको रिपीट से लग सकते हैं।
अब आते हैं आखिरी फैसले पर कि क्या राजकुमार राव और ललित प्रभाकर की प्रहार देखने लायक है या नहीं? तो आप इसे जरूर देख सकते हैं। फिल्म प्रहार आपको राजनीतिक और टीवी डिबेट के गुस्से के पार लेकर जाती है और बताती है कि देश के सेंटीमेंट के साथ-साथ देश की कानूनी प्रक्रिया और उसकी साख भी जरूरी होती है, जिसके लिए भारत धरती के कई वीर रोज लड़ते हैं। इनके नाम शायद हमें पता ना हों लेकिन इनके त्याग और सोच की वजह से ही हम वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी कहलाते हैं। हम अपनी ओर से इस फिल्म को 3 स्टार देते हैं।