खेला हो गया...बंगाल में आखिरकार दीदी की विदाई हो गई है। ममता बनर्जी का 15 सालों का राज खत्म हुआ और बीजेपी पहली बार अपने संस्थापकों में से एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ज़मीन बंगाल पर भगवा लहराती दिख रही है। लाल झंडों से टीएमसी के सफेद और ब्लू झंडों से होता हुआ बीजेपी के भगवे झंडे तक बंगाल की जनता ने अपना फैसला कर लिया है। इसके साथ ही भारत की राजनीति का एक अज़ीम किरदार ममता बनर्जी शायद अपने सियासी सफर के अंत की तरफ बढ़ गई हैं। हालांकि ममता बनर्जी स्ट्रीट फाइटर रही हैं। स्ट्रीट फाइटर की खूबी यही होती है कि वो वापसी करना जानता है। यूं तो ममता बनर्जी का लगभग 50 सालों का सियासी करियर भी अपने आप में एक कमाल की कहानी है। ममता बनर्जी का स्टाइल भी सबसे अलग था। धाकड़ और जुझारू नेता की। जो किसी से डरती नहीं जो किसी के आगे कुछ भी बोलने से हिचकती नहीं।
पीएम नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी।
कभी केंद्रीय रेल मंत्री का पद छोड़ते हुए अपनी चप्पल लहराकर मंत्री पद की तुलना अपनी चप्पल से करने वाली ममता बनर्जी भारत की राजनीति का निर्विवाद रूप से एक बड़ा किरदार हैं। केंद्र में भी वो मंत्री रहीं भारत का बच्चा बच्चा उनको जानता है। लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति में दीदी यानी ममता बनर्जी एक फेनोमेना है। सफेद साड़ी जो उनकी पहचान रही है वैसे ही सादगी और बेबाकी। ममता बनर्जी ने वामपंथियों के खिलाफ राजनीति की तो उनके कपड़े ऐसे होते थे कि सर्वहारा की बात करने वाले वामपंथी भी उनके आगे पूंजीपती नज़र आते थे। ममता बनर्जी ने कभी महंगी गाड़ियां, संपत्ति या विलासिता पर ध्यान नहीं दिया। वो तो सड़कों की नेता रही हैं निडर और जुझारू। ममता बनर्जी राजनीति का वो ब्रांड हैं जिन्होंने तीन दशकों से ज्यादा तक कायम रहे वामपंथी किले को तोड़ा। ममता बनर्जी कभी जयप्रकाश नारायण का विरोध करते हुए उनकी कार की बोनेट पर चढ़ गई थीं। तब वो कांग्रेस की छात्र नेता थीं। ये 70 का दशक था। तब पहली बार बंगाल और देश ने ममता बनर्जी का नाम सुना था। ये एक स्ट्रीट फाइटर नेता की शुरुआत थी जिसे देश की राजनीति में कई कारनामे करने थे। लेकिन तब 17 साल की रहीं ममता बनर्जी अब 71 सालों की हो चुकी हैं लेकिन स्ट्रीट फाइटर नेता की यहीं छवि आज तक कायम है। कभी वो व्हील चेयर पर चुनाव लड़ती हैं। कभी चुनाव आयोग तो कभी केंद्रीय एजेंसियों को धमकाती हैं। कभी वो स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर चली जाती हैं और घंटों बैठी रहती हैं तो कभी चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वकील बनकर पैरवी करती हैं। ममता बनर्जी आज भले ही बंगाल में 15 सालों बाद सत्ता से बाहर जाती दिख रही हों लेकिन वापसी करना उनको आता है ये इतिहास बताता है।
BJP और ममता की दोस्ती कैसे टूटी?
कमाल की बात है कि जो बीजेपी इस वक्त ममता की सबसे बड़ी सियासी दुश्मन हैं कभी ये दोनों साथ ही थे। 1998 में कांग्रेस से मतभेद हुए तो अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नींव रखी। उस वक्त उनका एक ही मकसद था पश्चिम बंगाल में 34 साल से काबिज वाममोर्चा के शासन को उखाड़ फेंकना, लेकिन इस बड़े मकसद को पूरा करने के लिए उन्हें एक ऐसे साथी की तलाश थी, जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और ताकत दे सके। यहां पर हुआ बीजेपी और टीएमसी का गठबंधन। उस वक्त यह गठबंधन दोनों के लिए फायदे का सौदा था, ममता को बेहद मजबूत और विरोधियों के लिए कई बार दमनकारी वामपंथियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय साथी चाहिए था जो बीजेपी के तौर पर उन्हें मिल गया,तो वहीं भाजपा को उस बंगाल में पैर जमाने का मौका मिला,जहां से उसके संस्थापक सदस्यों में से एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी आते हैं। उस बंगाल में जहां उसका जनाधार न के बराबर था। ममता और बीजेपी की यह दोस्ती बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने वाली थी और जल्द ही यह गठबंधन रंग लाया। बंगाल में 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी-बीजेपी ने मिलकर शानदार प्रदर्शन किया।आज जो बीजेपी बंगाल में अपने दम पर सत्ता हासिल करती दिख रही है उसे बंगाल में अपना पहला विधायक ममता की बदौलत मिला था। 1999 में टीएमसी के समर्थन से भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी पहली सीट हासिल की। और इसके बाद ममता बनर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री बनीं।लेकिन ये दोस्ती ज्यादा दिन चलने वाली नहीं थी। 2001 में जब तहलका मैगज़ीन के स्टिंग ऑपरेशन के बाद जब भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण का नाम रिश्वत के मामले में आया,तो ममता ने इसे अपनी ईमानदारी साबित करने का मौका माना। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी चप्पल हवा में लहराते हुए कहा कि पद उनके लिए इन चप्पलों से भी छोटा है। यह कहते हुए वह एनडीए से अलग हो गईं।
रास्ते अलग होने के बावजूद, ममता बनर्जी के सबसे बड़े आंदोलनों में भाजपा ने उनका साथ दिया. कारखाने के लिए सिंगूर में जमीन अधिग्रहण और नंदीग्राम में रासायनिक हब को लेकर छिड़े जन-आंदोलनों में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह उस समय ममता बनर्जी के साथ खड़े आए। दोनों ने पुरजोर तरीके से वामपंथियों की नीतियों का विरोध किया। हालांकि,इसका पूरा सियासी श्रेय ममता की झोली में चला गया। सिंगूर-नंदीग्राम की लहर पर सवार होकर ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर 2011 का विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को धूल चटा दी। वहीं, इस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। इस चुनाव में बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसके बाद 2021 में हुए विधानसभा चुनाव बीजेपी और टीएमसी के संबंधों के सबसे खराब दौर का परिणाम साबित हुआ। बीजेपी 77 सीटें जीती लेकिन उसने मुख्य विपक्ष का तमगा हासिल कर लिया। ये बीजेपी के लिए बड़ी कामयाबी थी। और 2026 में आखिरकार बीजेपी अपने संस्थापक सदस्यों में से एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सरज़मीन पर सरकार बनाने का सपना पूरा कर पाई है।
लेकिन यहां से केंद्रीय राजनीति में ममता बनर्जी की वापसी हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर देश की राजनीति में वो सबसे बड़े विपक्षी चेहरे के तौर पर गिनी जाएंगी।हिंसा और झड़प की घटनाएं ना हों तो पश्चिम बंगाल में तगड़ी सियासी लड़ाई देखने को मिली। ममता बनर्जी इस उम्र में जैसे अकेले किला लड़ाती रहीं, अकेले दम पर बीजेपी को चुनौती देती रहीं ऐसे में परिणाम चाहे जो भी आए हों ये तो कहना ही पड़ेगा वेल प्लेड दीदी. ममता बनर्जी सिर्फ बंगाल ही नहीं बल्कि विपक्ष की भी बड़ी नेता रही हैं। लेकिन बंगाल से उनकी विदाई जेपी के दौर से शुरू हुए एक शानदार राजनीतिक करियर का शायद क्लाइमेक्स है या शायद द एंड। यू नेवर नो राजनीति में किसी को खारिज करना गलती है और ममता बनर्जी को खारिज करना तो बेवकूफी।
